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सोमवार, 14 दिसंबर 2020

1977....बीत जाते हैं युग, वक्त बीतता नहीं,

सादर वन्दे 
एक चित्र से शुरु
भारत के अंदर भारत

असम के बोगाइगाँव दो नदियां
चम्पावती और ब्रम्हपुत्र का संगम
हू ब हू भारत के मानचित्र जैसा है


असर अब गहरा होगा ...कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


छुपा है परदों में कितने,जाने क्या राज़ गहरा होगा ।
अब्र के छटते ही बेनक़ाब  चांद का चेहरा होगा । 


साये दिखने लगे  चिनारों पे, जाने अब क्या होगा।
मुल्कों के तनाव से चनाब का पानी ठहरा होगा ।



क्यूं रूठे है सनम आप हमसे ....प्रीती श्रीवास्तव



क्यूं रूठे है सनम आप हमसे।

क्या वजह है बताइये तो जरा।।


दिल है मेरा कांच का सनम।

इस पर रहम खाइये तो जरा।।



विचलित न होना ...भारती दास



शब्द वाण से आहत होकर

व्याकुलता घबराहट भरकर

किन्चित चैन न खोना,

कवि मन यूं विचलित न होना....


पलों के यूकेलिप्टस ...पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा



हाँ, बीत जाते हैं जो, साथ होते नहीं,

पर वो पल, बीत पाते हैं कहाँ!

सजर ही आते हैं, कहीं, मन की धरा पर,

पलों के, विशाल यूकेलिप्टस!

लपेटे, सूखे से छाले,

फटे पुराने!

एक भी दुकां नहीं थोड़े से कर्जे के लिए ..जॉन एलिया



ऐश-ए-उम्मीद   ही   से   ख़तरा   है

दिल को  अब  दिल-ही  से ख़तरा  है


जिसके   आग़ोश   का   हूँ   दीवाना

उसके   आग़ोश   ही  से   ख़तरा  है

.....
आज सब ठीक हुआ
सादर






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