निवेदन।


फ़ॉलोअर

1941 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
1941 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

1941..द्रोण तो बेचारे बुरे हो गए। जबकि उन्होंने पांडवो का धर्मयुद्ध में ध्यान रखा है

भागम-भाग प्रस्तुति
सादर नमस्कार
किया तो है लिंक संयोजन
अभी 04.10 हुए है सुबह के
शायद 15 मिनट में आप इसे पढ़ेंगे
....
देखें रचनाएँ



द्रोण को यह सब पहले ही दिख रहा था। इसलिए द्रोण ने दक्षिणा स्वरूप एक वचन मांग लिया। वचन मांगा की एकलव्य आगामी धर्मयुद्ध में भाग न ले। बस यह सुनकर एकलव्य को झटका लगा। उसने कहा कि "गुरुदेव, आपने तो ऐसा वचन मांग लिया जैसे किसीने मेरा अंगूठा मांगा हो"।




गुलाम बन के रहोगे तो कुछ नहीं होगा
निज़ाम से जो डरोगे तो कुछ नहीं होगा
 
तमाम शहर के जुगनू हैं कैद में उनकी  
चराग़ छीन भी लोगे तो कुछ नहीं होगा




प्रेम उन हवाओं से छनता रहा,
जो तुम्हारे शहर से लौटी थीं,
तुम्हारे स्पर्श से महका रजनीगंधा
आज मेरे इत्र में आ मिला,



जीत जाने के लिए, 
कुछ नया पाने के
लिए, इक अजीब सी अनबुझ
प्यास रहती है, हर एक
मक़ाम पर, 



हिंदी के बदनाम जगत में , 
यारों  मैं भी लिखता हूँ !

अपने घर में ध्यान दिलाने, 
कड़वी बातें लिखता हूँ !
....
बस
रचनाएं पढ़िए
सादर




Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...