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बुधवार, 23 सितंबर 2020

1895...आकंठ आनंदित दसों दिशाएँ.

।। भोर वंदन ।।

प्राची में केशर ढुलके,

पूरे भूमंडल पर छा जाए !

आलोकित नव दिनकर

जगती का तिमिर-तुमुल झुलसा जाए !

आकंठ आनंदित दसों दिशाएँ,

सुख समृद्धि चहुँ ओर हो !

यह भोर सुहानी भोर हो..!!

राजेन्द्र स्वर्णकार

आकंठ आनंदित दसों दिशाएँ.. 

समतुल्य भावनाओं से वशीभूत हो 

चलिये अब ब्लॉग की दुनिया से ...✍️


उधेड़ बुन की पेशकश.. 

फ़ेसबुक की तरह

हँसता ही रहा हूँ मैं 

कभी इस 'पोज़' में 

कभी उस 'पोज़' में 

हँसता ही रहा हूँ मैं ..



आदरणीय डॉ. शरद सिंह जी ..

एक पत्थर

दरक जाती हैं भावनाएं

बिखर जाते हैं शब्द

कांच की तरह 

टूट कर,

जब 



लम्हों का सफ़र..अल्ज़ाइमर 

सड़क पर से गुज़रती हुई   

जाने मैं किधर खो गई    

घर-रास्ता-मंज़िल, सब अनचिन्हा-सा है   

मैं बदल गई हूँ, या फिर दुनिया बदल गई है!   

धीरे-धीरे सब विस्मृत हो रहा है   

मस्तिष्क साथ छोड़ रहा है ..



ख़ामोश दिल की सुगबुगाहट ..

मैं अँधेरा लिखता हूँ...

मेरी ज़िन्दगी है 

सफ़ेद सफ़हे में लिपटे 

मेरे कुछ बेतरतीब हर्फ़, 

और मृत्यु

मेरी वो किताब है

जो कभी नहीं लिक्खी गयी..



कोई पूछे कि ये ग़ज़ल क्या है ..डॉ. वर्षा सिंह

हुस्न माइल ब-सितम हो तो ग़ज़ल होती है 

इश्क़ बा-दीदा-ए-नम हो तो ग़ज़ल होती है 

फूल बरसाएँ कि वो हँस के गिराएँ बिजली 

कोई भी ख़ास करम हो तो ग़ज़ल होती है..



।। इति शम ।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️

 

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