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रविवार, 20 सितंबर 2020

1892..माँ तुझे सलाम

 सादर नमन
भाई कुलदीप जी को मातृशोक 
माँ हाटेशवरी ने उन्हें अपने पास बुला लिया


माताश्री नहीं रही
इस दारुण दुःख की घड़ी में हम सब
भाई कुलदीप जी के साथ हैं
अश्रुपूरित श्रद्धाञ्जली
आज का अंक 
माताश्री को समर्पित

माँ, सुन रही हो न ......

बिलकुल उलटा!

फिर भी तुम

लौट गयी 

उसी के पास !

कितनी 

भोली हो तुम!

माँ, सुन रही हो न......

माँ............!!!


"माँ" ...

दूर देश जा बैठी हो माँ!

यादों मे अब तो तुम्हारा

अक्स भी धुंधला पड़ गया है

सावन की तीज के झूले

अक्सर तुम्हारी याद दिलाते हैं



माँ मुझसे मिलने आती है ...

दुआओं के खजाने लुटाती है,

काँपते हाथों से

मेरा सिर सहलाती है,

मूक निगाहों से भी

कितना कुछ कह जाती है...

माँ मुझसे मिलने आती है....



मेरा वो रूठ जाना यूँ ही माँ -..

तुम जो रोज कहा करती थी --

धरती और माँ एक हैं दोनों ,

अपने लिए नहीं जीती हैं -

अन्नपूर्णा और नेक हैं दोनों ;

माँ बनकर मैंने जाना है -

औरो की खातिर जीना कैसा है ,

जीवन - अमृत पीने की खातिर -

मन के आंसूं पीना कैसा है -,



माँ...कभी धूप कभी छांव ...

माँ..

तुम हो साहस की सौगात,

 चिरजीवन का साया बनी हर बार 

तुम्हारे अंतस में छिपी हूँ मैं,

 बन करुणा का कोमल किरदार।



माँ ! तुम सचमुच देवी हो गई......

प्रेरणा हो तुम,प्रभु का वर हो।

किन पुण्यों कि फल हो माँ !?

जीवन अलंकृत करने वाली,

शक्ति एक अटल हो माँ !   ।


आदरणीय हो,पूज्यनीय हो।

तुम सरस्वती ,लक्ष्मी हो माँ !

मेरे मन-मन्दिर में बसने वाली

तुम सचमुच देवी हो माँ !! 

और अंत में माताश्री को शत-शत नमन
सादर


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