शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल
अभिवादन।
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दूसरों को आईना दिखाने की होड़ में,
देख पाते नहीं हम सूरत कभी अपनी।
स्वर्ग बन जाती कब की अपनी धरती,
जो होती एक-सी हमारी कथनी-करनी।
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मेरे शहर की भोर में
होती नहीं आजकल
सोंधी सुगंध रोटी की,
न ही दाल-भात में सनी दुपहरी
और न ही गोल रोटी की तरह
चाँद को निहारती सुखभरी नींद,
चौक-चौराहों पर,बाज़ार-दोराहों पर
उदास और मायूस ...
ऊपर से बेखौफ़ और
भीतर ही भीतर सहमी आँखें
वस्तुओं के दाम ऊँचे स्वर में
तोलती-मोलती,
सबकी नज़रें बचाकर
बार-बार ज़ेब की रेज़गारी टोहती
चुनती-बीछती मिलती हैं
चुटकीभर जरूरतें
और आपके शहर में....?
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आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
बेवफ़ा हूँ मैं, ये सारी दुनिया कहती है
दिया न गया, कोई मुनासिब जवाब मुझसे ।
अँधेरे को समझना होगा नसीब अपना
नाराज़ है 'विर्क', प्यार का आफ़ताब मुझसे ।
इस ब्रह्माण्ड में
सब कुछ
परिवर्तित होता है
विलीन नहीं
कानफोड़ू जयकारों से
न चाहकर भी भरमाते हुए
सच में ! कल भाग गई थी कविता
आज लौटी है
विद्रुप सन्नाटों के बीच
न जाने क्या खोज रही है .
श्राद्ध क्या है ?
श्रद्धा से किया गया कर्म को श्राद्ध कहते हैं |
जिस काम में श्रद्धा नहीं है वह श्राद्ध नहीं है |
परिवार में किसी की मृत्यु होने पर उनकी
आत्मा की शांति के लिए लोग श्रद्धा पूर्वक
भगवान से दिवंगत आत्मा की
शांति के लिए प्रार्थना करते हैं |
अबोध मन को समझाना न झुँझलाना तुम
आश्वासन की पटरी पर अंधा बन न लेटा करे।
तरक़्क़ी की महक फैलाती दौड़ती है लौहपथगामिनी !
उत्साह के झोंके की रफ़्तार को यों न बाँधा करे।
हो सके तो सजल ज़िन्दगी का
आभास छोड़ जाना, मुझे
ज्ञात है रस्मे दुनिया
का फ़रेब, कुछ
मरहमी
स्पर्श
अनायास छोड़ जाना, ग़लत ही
सही कोई ठिकाना, मेरे
पास छोड़ जाना।
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आज बस इतना ही
कल का अंक पढ़ना न भूले
कल आ रही हैं विभा दीदी अपनी
चमत्कारिक प्रस्तुति के साथ
-श्वेता





