सादर अभिवादन
आज हम भाई रवीन्द्र जी की जगह
कोई बात नहीं
मै हूँ न
आज हम भाई रवीन्द्र जी की जगह
कोई बात नहीं
मै हूँ न
मैं वो सवाल हूँ ,
जिसका कोई जवाब नहीं…
तू गर मुझमे हो !
जिंदगी का कोई ख्वाब नहीं…..
चलिए चलें रचनाओं की ओर..
चलिए चलें रचनाओं की ओर..
सांध्य सुंदरी बन के अप्सरा
भू लोक पर आई
देख धरा का रूप सलोना
मन ही मन सकुचाई
हरित रंग की ओढ़े चूनर
सतरंगी फूलों के झूमर
मादक सी पछुआ बयार से
धान फसल हरषाई

हिरण्य झुमका हेमांगी का
मंजुल शुभ रत्न जड़ा है।
रात रूपसी रूप देखकर
जड़ होके समय खड़ा है।
है निसर्ग सौंदर्य बांटता
ज्ञान बांटता ज्यों ज्ञानी।।

जिन्दगी इस हद तक
घिसटती जाएगी
फिर से गाड़ी पटरी पर
लौट न पाएगी |
हुआ है जीवन एक ऐसा बोझा
जिसे सर पर भी उठा नहीं पाते
किसी मशीन का ही
सहारा लेना पड़ता है

होठों ने चाहा था कह देना
मन की हर पीड़ा
कि फिर न रहे कोई दर्द,
सिर झुका रहा देर तक
इस आस में कि रख दोगे तुम हाथ
और दोगे सांत्वना
दोगे साहस जीवन जीने का,
सब मिल करते रहे प्रतीक्षा
पर तुम नहीं आए
तुम नहीं आए।

और एक तू बेशरम है
सब कुछ देखते सुनते हुऎ
अभी तक दलाली के पाठ को नहीं सीख पाता है
तेरे सामने सामने कोई तेरा घर नीलाम कर ले जाता है
'उलूक'
जब तू अपना घर ही नहीं बेच पाता है
तो कैसे तू
पूरे देश को नीलाम करने की तमन्ना के
सपने पाल कर
अपने को भरमाता है ।
....
आज बस
कल की कल
सादर
आज बस
कल की कल
सादर