चमत्कार
आज सीधी सादी प्रस्तुति
कोई विषय नहीं
सद्य प्रकाशित रचनाओं के साथ
ब्लॉग लेखन का नया फार्मेट
सेटिंग और अलाइनमेंट मे विविधता दिखेगी
बहुत कुछ नया सम्मिलित किया है
विश्व की सारी भाषाएं, की-बोर्ड ले-आउट के साथ
इस नए संस्करण में लेखकों को आराम होगा
पर हम चर्चाकारों को थोड़ी सी सावधानी रखनी होगी
चक्रवात उठे या तूफान डर के जीना क्या
हमें संघर्षों की आदत है संघर्षों की बात कर।
तिमिर आच्छादित हो भले ही गगन में
अवसान इसका भी होगा इंतज़ार की बात कर।

चाँद को तकती रही मैं तो रात भर।
बदली की हिफाजत रह गयी अधूरी।।
गरज उठे जो बादल जमीं के लिये।
मौसम की हिदायत रह गयी अधूरी।।
मैथिलीशरण गुप्त
तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?
सब द्वारों पर भीड़ मची है,
कैसे भीतर जाऊं मैं?

बारिश अब जा चुकी है सीमान्त
पार, किसी के जाने के बाद
ही उसकी कमी महसूस
होती है,चाहे पलकों
में हों या हवाओं
में उड़ती
हुई
अदृश्य बूंदें, कुछ न कुछ नमी - -

उसके बाद सारा संसार.
क्या समझा है कभी कि प्यार है क्या?
क्या जाना है कभी कि प्यार कहते किसे हैं?
क्या प्यार का नाम स्त्री-पुरुष से जुड़ा हुआ ही है?
क्यों प्यार का सन्दर्भ
दो विषमलिंगियों के विवाह से लगाया जाता है?

'उलूक'
बहुत से अच्छे भले लोग
जो हमेशा हमारे लोटा हो जाने पर आँख दिखा रहे थे
इन लुढ़कते हुऎ लोटों के बीच में कब लोटे हो जा रहे थे
उनकी सोच भी लोटा सोच है करके
जबकि कहीं नहीं दिखाना चाह रहे थे