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गुरुवार, 3 सितंबर 2020

1875...शब्द-शब्द में अर्थ भरो...

सादर अभिवादन 

गुरुवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

भाषा का विस्तार करो, 
शब्दों का निर्माण करो, 
शब्द-शब्द में अर्थ भरो,
 निज भाषा पर गर्व करो।
#रवीन्द्र_सिंह_यादव  
    
आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें- 


 

फ़िर आदमी ने ही कर दिया इन्कार
देने से सजा झूठ की
कुछ बचा हुआ होगा वहाँ शायद इंसान 

उलूककाट लिये दिन सैकड़ों
काल कोठरी में बेगुनाह ने

सजा कौन देगा यंत्रणा देने वाले गुनहगार को
कौन सा अल्ला या कौन सा भगवान ?


 


 
एक वृक्ष की डाल खिले थे
दो रंगी ये पुष्प कभी
आँखों से अंधे बनकर ये
भूल गए मर्यादा भी
शूल बने चुभते हैं हिय में
घृणा-द्वेष में प्रेम बहे
चौसर के पाँसों में उलझे
होकर फिर संग्राम रहे।।
  

वो कहता  है  मुझसे  , सो  कर  खो  देगा  तू   अमृत  को

भर  ले  अपना  प्याला  जिसे ,   दुनिया  ने  ठुकराया  है

चखना  और  चखना सब को  , ये  प्याला  होगा  रौशनी  का

साकी  तेरा  जब  मैं  हूँ  हमदम ,तू  काहे को  घबराया  है !!


  
कर्म साधना हो गई है क्षीण
सामर्थ्य हीन साधन विहीन
दिन मुश्किल के रातें मलीन
दूर कब होगा गम ये असीम
*****

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति में। 

#रवीन्द्र_सिंह_यादव  

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