सादर अभिवादन
गुरुवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।
#रवीन्द्र_सिंह_यादव

फ़िर आदमी ने ही कर दिया इन्कार
देने से सजा झूठ की
कुछ बचा हुआ होगा वहाँ शायद इंसान
देने से सजा झूठ की
कुछ बचा हुआ होगा वहाँ शायद इंसान
‘उलूक’ काट लिये दिन सैकड़ों
काल कोठरी में बेगुनाह ने
सजा कौन देगा यंत्रणा देने वाले गुनहगार को
कौन सा अल्ला या कौन सा भगवान ?


एक वृक्ष की डाल खिले थे
दो रंगी ये पुष्प कभी
आँखों से अंधे बनकर ये
भूल गए मर्यादा भी
शूल बने चुभते हैं हिय में
घृणा-द्वेष में प्रेम बहे
चौसर के पाँसों में उलझे
होकर फिर संग्राम रहे।।
वो कहता है मुझसे , सो कर खो देगा तू अमृत को
भर ले अपना प्याला जिसे , दुनिया ने ठुकराया है
चखना और चखना सब को
, ये प्याला होगा रौशनी का
साकी तेरा जब मैं हूँ हमदम ,तू काहे को घबराया है !!
कर्म साधना हो गई है क्षीण
सामर्थ्य हीन साधन विहीन
दिन मुश्किल के रातें मलीन
दूर कब होगा गम ये असीम