।। प्रातः वंदन ।।
दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे
उदासियों में भी चेहरा खिला खिला ही लगे
- बशीर बद्र
करोना पर जिंदगी की जीत का संघर्ष हर घर से ही जारी है..इसी संकल्प के साथ आज के
लिंकों में शामिल रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें..✍
लिंकों में शामिल रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें..✍
आ० आकिब जावेद जी
आ० अनिता जी
आ० शशि गुप्ता जी
आ० विश्वमोहन जी
आ० डॉ वर्षा सिंह जी
⚜️⚜️⚜️
ग़ज़ल में ग़मों के तराने लिखे
कई दर्द अपने पुराने लिखे
मुझे प्यार में तूने धोखा दिया
हरिक ज़ख़्म तेरे पुराने लिखे
⚜️⚜️⚜️
शब्द खो गए इस पीड़ा में,
ठहरे हैं जन जो डूबे थे
जग की मनमोहक क्रीड़ा में !
थमी जिंदगी सी लगती है
दुःख है, दुःख का कारण भी है
जूझ रहा है विश्व समूचा
करोना का निवारण भी है
⚜️⚜️⚜️
*******************


स्वास्थ्य संबंधित कारणों से भोजन बनाने की इच्छा नहीं हुई। बत्ती बुझा मैं कमरे में लेटा हुआ था कि तभी नौ बजते ही घंटा-घड़ियाल, शंखनाद, थाली और पटाख़ों की आवाज़ आने लगी। जिसे सुन मैंने जैसे ही कमरे की खिड़की खोली तो देखा कि दीपावली की तरह ही आसपास के घरों के बारजे पर असंख्य दीपक झिलमिला रहे थे।
⚜️⚜️⚜️
रामचरितमानस के बालकांड के छठे विश्राम में महाकवि तुलसी ने राम अवतार की पृष्ट-भूमि को गढ़ा है। भगवान शिव माँ पार्वती को राम कथा सुना रहे हैं। पृथ्वी पर घोर अनाचार फैला है। धरती माता इन पाप कर्मों के बोझ से पीड़ित हैं। वह मन ही मन विलाप कर रही हैं। समुद्र और पहाड़ों का बोझ भी इस पाप की गठरी के समक्ष कुछ नहीं है। समाज का आचरण कलूषता की समस्त सीमाओं को लाँघ गया है। जब मनुष्य किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता के जिन सोपानों के सहारे उसके वैभव की पराकाष्ठा पर पहुँचकर वांछित चरित्र की मर्यादा को लाँघता है, तो वह फिर उन्ही सोपानों को पद मर्दित करता पतन की गहराईयों में नीचे उतरना शुरू कर देता है। इस पद मर्दन में वे तमाम मूल्य, वे तमाम आदर्श, वे तमाम प्रतिमान
⚜️⚜️⚜️
तालाबंदी के आलम में, लगते भोले-भाले दिन।
ग़ैरज़रूरी आपाधापी, कहीं दुबक कर बैठ गई,
लम्हा-लम्हा कछुए जैसे सरके ढीले-ढाले दिन।
बस्ते एक तरफ रख्खे हैं, ऑनस्क्रीन पढ़ाई है,
।। इति शम ।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ‘ तृप्ति ’..✍



