प्रणामाशीष
अब अभ्यस्त हो चली हूँ या यूँ कहिये
शुतुरमुर्ग से सीखने की कोशिश में हूँ
खतरे को भांपकर सिर को रेत में छिपा लेता है
'शुतुरमुर्गी चरित्र' मेरी सोशल डिस्टेंसी
अतीत की कड़वी यादों में.
मत जीने दो मुझे.......
अब जीने दो मुझे भी.....
मेरी अस्मिता के साथ
इतना तो कर सकते हो न..?
हालाँकि टी.वी. चैनलों पर
सीधा प्रसारण होता है
केवल ' विश्व-सुंदरियों ' की
' कैट-वाक ' का
पर उससे भी
कहीं ज़्यादा सुंदर होती है
कामगार औरतों की
थकी चाल...
स्वयं के पक्ष में
गज़ल
सच बोलने की कसम खाने से
दुश्मनी हो गई सारे जमाने से
मै अपनी माँ का सबक भूलूं कैसे
कि लगेगा पाप सच छुपाने से
पहले सीख लूँ एक सामाजिक भाषा

><><
पुन: मिलेंगे...
><><
सीधा प्रसारण होता है
केवल ' विश्व-सुंदरियों ' की
' कैट-वाक ' का
पर उससे भी
कहीं ज़्यादा सुंदर होती है
कामगार औरतों की
थकी चाल...
स्वयं के पक्ष में
एक सभ्यता मरती है
समाज डूबता है तो
उसके दर्द में एक कवि-
शब्दों में बंधे सुर-धुन-लय तक
व् कथित विद्वान्
कागज की धरती पर
रिसते हुए रीत जाता है
समाज डूबता है तो
उसके दर्द में एक कवि-
शब्दों में बंधे सुर-धुन-लय तक
व् कथित विद्वान्
कागज की धरती पर
रिसते हुए रीत जाता है
सच बोलने की कसम खाने से
दुश्मनी हो गई सारे जमाने से
मै अपनी माँ का सबक भूलूं कैसे
कि लगेगा पाप सच छुपाने से
पहले सीख लूँ एक सामाजिक भाषा

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पुन: मिलेंगे...
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विषय-क्रमांक –114
पलाश
उदाहरण
सुनो, फिर एक सुरमई भीगी-भीगी शाम,
अंतिम तिथिः 04 अप्रैल 2020
प्रकाशन तिथिः 06 अप्रैल 2020
उदाहरण
सुनो, तुम आज मेरा आंगन बन जाओ,
और मेरा सपना बनकर बिखर जाओ।
मैं...मैं मन के पलाश-सी खिल जाऊं,
अनुरक्त पंखुरी-सी झर-झर जाऊं।
सुनो, फिर एक सुरमई भीगी-भीगी शाम,
ओढ़कर चुनर चांदनी के नाम ।
मैं....तुम्हारी आंखों के दो मोती चुराऊं
और उसमें अपना चेहरा दर्ज कराऊं।
रचनाकार निशा माथुर
रचनाकार निशा माथुर
अंतिम तिथिः 04 अप्रैल 2020
प्रकाशन तिथिः 06 अप्रैल 2020