निवेदन।


फ़ॉलोअर

1697...हम-क़दम का एक सौ दसवां अंक.. अभिसार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
1697...हम-क़दम का एक सौ दसवां अंक.. अभिसार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 9 मार्च 2020

1697...हम-क़दम का एक सौ दसवां अंक.. अभिसार

स्नेहिल अभिवादन..
अभिसार...
'अभिसार' भारतीय साहित्यशास्त्र का एक मान्य पारिभाषिक शब्द है, जिसका अर्थ है- "नायिका का नायक के पास स्वयं जाना" अथवा "दूती या सखी के द्वारा नायक को अपने पास बुलाना"। अभिसार में प्रवृत्त होने वाली नायिका को 'अभिसारिका' कहते हैं। दशरूपक के अनुसार जो नायिका या तो स्वयं नायक के पास अभिसरण करे अथवा नायक को अपने पास बुलावे वह 'अभिसारिका' कहलाती है- 'कामार्ताभिसरेत्‌ कांतं सारयेद्वाभिसारिका'। कुछ आचार्य अभिसारण का कार्य वाकसज्जा का ही निजी विशिष्ट व्यापार मानकर इसे अभिसारिका का व्यापक लक्षण नहीं मानते, परंतु प्राचीन आचार्यों के मत के यह सर्वथा विरुद्ध है। भरत मुनि ने तो कांत के अभिसाररण को ही अभिसारिका का प्रधान लक्षण अंगीकर किया है। 'भावप्रकाश' का भी यही मत है। कवियों की दृष्टि में अभिसारिका ही समस्त नायिकाओं में अत्यंत मधुर, आकर्षक तथा प्रेमाभिव्यंजिका होती है।...और आगे की जानकारियाँ...

आज रविवार को महिला दिवस के चक्कर में
हम भूल ही गए कालजयी रचनाओं को

उदाहरणार्थ दी गई रचना

कविवर नरेश मेहता जी की रचना-

यह सोनजुही-सी चाँदनी
नव नीलम पंख कुहर खोंसे
मोरपंखिया चाँदनी।

नीले अकास में अमलतास
झर-झर गोरी छवि की कपास
किसलयित गेरुआ वन पलास
किसमिसी मेघ चीखा विलास
मन बरफ़ शिखर पर नयन प्रिया
किन्नर रम्भा चाँदनी।

मधु चन्दन चर्चित वक्ष देश
मुख दूज ढँके मावसी केश
दो हंस बसे कर नैन-वेश
अभिसार रंगी पलकें अशेष
मन ज्वालामुखी पर कामप्रिया
चँवर डुलाती चाँदनी।

गौरा अधरों पर लाल हुई
कल मुझको मिली गुलाल हुई
आलिंगन बँधी रसाल हुई
सूने वन में करताल हुई
मन नारिकेल पर गीत प्रिया

वन-पाँखी-सी चाँदनी।
रचनाकार श्री नरेश मेहता



नियमित रचनाएँ
आदरणीय आशा सक्सेना
पलक पसारे बैठी है
वह तेरे इन्तजार में
हर आहट पर उसे लगता है
कोई और नहीं है  तेरे सिवाय 
हलकी सी दस्तक भी
दिल के  दरवाजे पर जब होती 
वह बड़ी आशा से देखती है

आदरणीय साधना वैद
कुछ तो अनोखी बात है,
दूर क्षितिज पर पहुँची 
अभिसारिका वसुधा का 
 प्रियतम मयंक की बाहों में 
थर थर कम्पित गात है 
कारवाँ बनाने को खुद 
अपनी ही परछाइयों का  
सुकून भरा साथ है,

आदरणीय कुसुम कोठारी
ऐसा अभिसार चातकी का ..

तिमिरावगूंठित थी त्रियामा ,
आकाश के छोर अर्ध चंद्रमा।
अपनी निष्प्रभ आभा से उदास कहीं खोया,
नीले आकाश के विशाल प्रांगण में जा सोया।
तारों की झिलमिलाहट उसे चुभ गई ,
उसकी ये पीड़ा चातकी के हृदय में लग गई ।
चल पड़ी अभिसार को वो, पंख फैलाकर अपने,


आदरणीय मीना शर्मा
शब्दों में प्यार कहूँ कैसे 

प्रेम नहीं, शैय्या का सुमन,
वह पावन पुष्प देवघर का !
ना चंदा है ना सूरज है,
वह दीपक है मनमंदिर का !
है प्यार तो पूजा ईश्वर की,
उसको अभिसार कहूँ कैसे ?

सुजाता.
अभिसार के पल

ओट ले,

पेड़ों की

झुरमुट्टों की।
दबे पाँव मैं
तुम तक थी पहुँची।

जाने किन

स्वप्नों में थे तुम लीन।

शायद थी मैं
तेरे अहसासों में विलीन।



आदरणीय विश्वमोहन कुमार
पुरुष की तू चेतना ...
छवि अगणित,
कंदर्प का,
शतदल सरसिज,
सर्प-सा.

काढ़े कुंडली,
अधिकार का,
अभिशप्त मैं
अभिसार का.

मैं छद्म बुद्धि विलास वैभव
मनस तत्व, तू वेदना.
....
आज इतनी ही रचनाएँ
कल मिलेंगी 

सखी श्वेता..
 विषय के साथ
सादर


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...