सोमवारीय विशेषांक में
आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन
------
अलाव हमक़दम का पहला विषय था-
चलिये कुछ स्मृतियों को ताज़ा करते हैं कुछ नयी संजोते हैं-
अलाव
★
सर्वप्रथम दो
दो कालजयी रचना पढ़ते हैंं-
माघ : कोहरे में अंगार की सुलगन
अलाव के ताव के घेरे के पार
सियार की आँखों में जलन
सन्नाटे में जब-तब चिनगी की चटकन
सब मुझे याद है : मैं थकता हूँ
पर चुकती नहीं मेरे भीतर की भटकन !
अज्ञेय
-------///------
रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने
अलाव तापा
मैंने माज़ी से कई ख़ुश्क सी शाख़ें काटीं
तुमने भी गुज़रे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखी नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोले
अपनी इन आँखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकीं
तुमने पलकों पे नमी सूख गई थी सो गिरा दी
रात भर जो मिला उगते बदन पर हमको
काट के डाल दिया जलते अलाव में उसे
रात भर फूंकों से हर लौ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाये रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने
गुलज़ार
★★★★★
आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन
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अलाव हमक़दम का पहला विषय था-
चलिये कुछ स्मृतियों को ताज़ा करते हैं कुछ नयी संजोते हैं-
अलाव
सर्दी के मौसम में तापने के लिए किसी स्थान विशेष पर जलाई गयी आग।
परंपरागत रूप से हम अलाव को ग्रामीण जीवन का अंग मानते आये हैं जहाँ ग्रामीण सुबह-शाम जलते-सुलगते अलाव के पास एकत्र होते हैं और वहाँ विभिन्न प्रकार की चर्चाओं में समय गुज़ारते हैं।अनेक शंकाओं का समाधान, प्रश्नों का हल,चुहलबाज़ी, ताज़ा समाचार
आदि सब अलाव पर मिलते हैं लोगों को। आग जलाने के लिए अनुपयोगी लकड़ी,कंडे, फूस, फ़सल का खरपतवार आदि इस्तेमाल किये जाते हैं। किन्तु अब अख़बारों में भी यह शब्द हमारा ध्यान खींचता है जब शीत ऋतु की प्रचंडता होने पर नगरीय निकाय बेसहारा लोगों के लिए अलाव का प्रबंध करते हैं। अब तो शहरी जीवन में
आदि सब अलाव पर मिलते हैं लोगों को। आग जलाने के लिए अनुपयोगी लकड़ी,कंडे, फूस, फ़सल का खरपतवार आदि इस्तेमाल किये जाते हैं। किन्तु अब अख़बारों में भी यह शब्द हमारा ध्यान खींचता है जब शीत ऋतु की प्रचंडता होने पर नगरीय निकाय बेसहारा लोगों के लिए अलाव का प्रबंध करते हैं। अब तो शहरी जीवन में
भी अत्याधुनिक अलाव अस्तित्व में हैं।
#रवींद्र सिंह यादव
★★★★★★
जीवन एक अलाव से कम नहीं
धीमी-धीमी सुगबुगाहट की
हल्की मीठी आँच
मासूम बचपने-सा सुकून देती है
फिर तेजी से दहकती है आग
पूरी जवानी के जोश-सा
फिर धीरे-धीरे मद्धिम पड़ जाती
है आँच
बढ़ते बुढ़ापे की तरह
और अंत में बुझ जाता है अलाव
बच जाती है राख़ मुट्टीभर
अनंत सागर में प्रवाहित होने को।
#श्वेता
धीमी-धीमी सुगबुगाहट की
हल्की मीठी आँच
मासूम बचपने-सा सुकून देती है
फिर तेजी से दहकती है आग
पूरी जवानी के जोश-सा
फिर धीरे-धीरे मद्धिम पड़ जाती
है आँच
बढ़ते बुढ़ापे की तरह
और अंत में बुझ जाता है अलाव
बच जाती है राख़ मुट्टीभर
अनंत सागर में प्रवाहित होने को।
#श्वेता
सर्वप्रथम दो
दो कालजयी रचना पढ़ते हैंं-
माघ : कोहरे में अंगार की सुलगन
अलाव के ताव के घेरे के पार
सियार की आँखों में जलन
सन्नाटे में जब-तब चिनगी की चटकन
सब मुझे याद है : मैं थकता हूँ
पर चुकती नहीं मेरे भीतर की भटकन !
अज्ञेय
-------///------
रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने
अलाव तापा
मैंने माज़ी से कई ख़ुश्क सी शाख़ें काटीं
तुमने भी गुज़रे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखी नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोले
अपनी इन आँखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकीं
तुमने पलकों पे नमी सूख गई थी सो गिरा दी
रात भर जो मिला उगते बदन पर हमको
काट के डाल दिया जलते अलाव में उसे
रात भर फूंकों से हर लौ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाये रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने
गुलज़ार
★★★★★
आदरणीय साधना वैद
ठण्ड की रात
भारी अलाव पर
छाया कोहरा !
सीली लकड़ी
बुझता सा अलाव
जला नसीब !
★★★★★★
सर्दी की रात
ठिठका सा कोहरा
ठिठुरा गात !
मंदा अलाव
कँपकँपाता तन
झीने से वस्त्र !
तान के सोया
कोहरे की चादर
पागल चाँद !
★★★★★
★★★★★
आदरणीय अनुराधा चौहान
घर-आँगन चौबारे में
अलाव के सामने
हाथों को सेंकते
लोगों की टोली बैठ जाती
सुबह की चाय की चुस्की के साथ
गपशप करते
बातों से सर्दी के अहसास
बांटने में लगे रहते
★★★★★★★
आदरणीय कुसुम कोठारी
अच्छा लगता है ना जाडे में अलाव सेकना,
खुले आसमान के नीचे बैठ सर्दियों से लडना,
हां कुछ देर गर्माहट का एहसास
तन मन को अच्छा ही लगता है,
★★★★★★★
आदरणीय शुभा मेहता
पूस की ठिठुरती रात में
बैठ जाते अलाव जलाकर
जिनका न कोई ,ठौर -ठिकाना
ना बिस्तर ,ना कंबल
आग सेकते..
कुछ कुत्ते -बिल्ली भी साथ में
ठंडी हवाएं ,ठरता अलाव
★★★★★★★
★★★★★★★
आदरणीय सुजाता प्रिय
अलाव के निकट ...
निकट बगीचे से मंगली चाची,
सुखी लकड़ियाँ बीनकर
लायी।शाम ढली तो
वह घर के आगे,
उसे जोड़कर
अलाव
जलायी।
अलाव देखकर लक्ष्मी दादी,
लाठी टेक लपकती आई।
★★★★★★
आदरणीय अनीता श्रीवास्तव
अलाव
देखो ये कैसी विडंबना है
कोई पहाड़ों पर घूमने जाये
कोई ठंड में जान गवाएं ।
अलाव,कंबल का करें इंतजाम
सब मिल गरीबों की
शीत भगाएं।
आओ शिशिर ऋतु को
मोहक बनायें।
★★★★★★
आदरणीया उर्मिला सिंह
अलाव जलता
अलाव जलता
माघ की सर्दी
फटा कंबल
पिछले साल की रजाई
जगह जगह से निकलती रुई
बच्चे कुछ घास-फूस
कुछ पतली लड़किया लाते
अलाव जलाते..
उसे घेर के बैठ जाते सभी
सुखी लकड़ियां जलती
बदन में जब गर्मी आती
तो भूख का अलाव
जलने लगता.......
★★★★★★
आदरणीयाअभिलाषा चौहान
जलने लगे अलाव
दुनिया में कोई ठांव
चाय की हैं चुस्कियां
चर्चाओं के दौर
ऐसे भी कुछ लोग हैं
जिन्हें कहीं नहीं ठौर
दिन में धूप पहनते
रात को ओढ़े अलाव
★★★★★
आदरणीया रेणुजी
हकीक़त नहीं फ़साने थे ,
सब अपनों को लिए थे साथ -
बस एक हमीं बेगाने थे ;
पर जाने क्यों वो झांकने लगते -
मेरे मन के उजले दर्पण में ?
★★★★★
आदरणीया मीना शर्मा
पिता के झुकते कंधे,
माँ की उम्मीदभरी आँखें
कैसे करे वो सामना ?
आज भी ना मिली नौकरी !
तमाम डिग्रियाँ,आग में झोंककर
लगाया उसने जोरदार कहकहा,
सिसकता रहा अलाव !!!
माँ की उम्मीदभरी आँखें
कैसे करे वो सामना ?
आज भी ना मिली नौकरी !
तमाम डिग्रियाँ,आग में झोंककर
लगाया उसने जोरदार कहकहा,
सिसकता रहा अलाव !!!
★★☆★★
आदरणीय सुशील सर
धीमे धीमे
अन्दर कहीं
सुलगती
हुई आग
बाहर की
आग से जैसे
जान पहचान
लगवाना
चाहती हैं
अन्दर कहीं
सुलगती
हुई आग
बाहर की
आग से जैसे
जान पहचान
लगवाना
चाहती हैं
आदरणीय सुबोध सिन्हा
लपलपाती लौ लिए चटकती चिता
या फिर ख़ुशी बटोरे आई होली के पहले
फ़ाल्गुनी पूर्णिमा की जलती होलिका
या फिर गाँव-शहर का हो रावणदहन
संग पहने आतिशबाज़ी का जामा
सेनाओं की उत्सवाग्नि हो या फिर ..
बलात्कार के बाद गला घोंटी हुई
या कराहती .. छटपटाती .. अधमरी-सी ज़िन्दा
सरे राह जलाई गई निरीह कोई बाला
या फिर ख़ुशी बटोरे आई होली के पहले
फ़ाल्गुनी पूर्णिमा की जलती होलिका
या फिर गाँव-शहर का हो रावणदहन
संग पहने आतिशबाज़ी का जामा
सेनाओं की उत्सवाग्नि हो या फिर ..
बलात्कार के बाद गला घोंटी हुई
या कराहती .. छटपटाती .. अधमरी-सी ज़िन्दा
सरे राह जलाई गई निरीह कोई बाला
★★★☆★★★
आज का हमक़दम आशा है आपको
पसंद आया होगा।
आपकी प्रतिक्रियायें
उत्साह बढ़ाती है।
हमक़दम का अगला विषय जानने के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूलें।
★
क्यूँ नहीं बुझते शोलों से
चिंनगारियों के
एक-एक कतरे को उठाकर
अंधेरे जीवन की डगर पर
चल पड़ते है,
छीनने अपने हिस्से का सूरज
जिसकी रोशनी से
उजाला भर जाये
कुहरे भरे जीवन में
और नरम धूप भरे
उनकी बर्फीली ठंडी रातों में...।
#श्वेता











