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सोमवार, 9 दिसंबर 2019

1606..हम-क़दम का 98 वाँ अंक......हालात

सोमवारीय विशेषांक 
में आप सभी का 
स्नेहिल अभिवादन।
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हालात
शब्द से समसामयिक तत्कालिक घटनाओं की ओर ध्यान आकृष्ट होता है।
देश की अर्थव्यवस्था हो या विभिन्न राज्यों में होने वाली स्त्रियों के साथ बर्बरता की पराकाष्ठा, कानून-व्यवस्था की धज्जियाँँ और भी बहुत।
कुल मिलाकर असंतोषजनक हालात।जिसे बदलने.के लिए आवश्यकता है आम जनता की सक्रिय सहभागिता और जागरूकता की।
हर बात के लिए पुलिस प्रशासन या
 सरकार पर हमारी जरुरत से ज्यादा निर्भरता ने
हमें पंगु बना दिया है। 
★ 

आने वाला कल क्या होगा?
बीते पल में हमें हासिल क्या?
जो बदल नहीं हम सकते है
सवालात पर विचलित होना क्यूँ?
हालात पर व्यर्थ का रोना क्यूँ?


यही हालात इब्तिदा से रहे 
लोग हम से ख़फ़ा ख़फ़ा से रहे 

इन चराग़ों में तेल ही कम था 
क्यूँ गिला हम को फिर हवा से रहे 
ज़ावेद अख़्तर

आइये आज के हमक़दम की विशिष्ट रचनाएँ पढ़ते हैं।
हालात जैसे शब्द पर लेखनी चलाना आसान नहीं था आप सभी की प्रतिभा,रचनात्मकता से सब संभव है।
आप सभी के सहयोग से हमक़दम का खूबसूरत सफ़र ज़ारी है।
आप सभी प्रबुद्ध क़लमकारों को सादर प्रणाम एवं आभार।


आइये आज की रचनाओं का आनंद लेते हैं-



आदरणीय सुबोध सर

पुस्तकालयों के फर्नीचर हैं कुछ जर्जर
सरकारी अस्पतालों की स्थिति है बद से बदतर
सरकारी स्कूलों के "डे-मील" खा रहे हैं "बन्दर"
बस शहर के मंदिरों-मस्जिदों के फर्श चकाचक
और इनके कँगूरे-मीनारों के हालात ठीक हैं ...

आदरणीया
साधना वैद जी

हालात जो बदले मयार ए ग़म बदल गया
आयी बहार खिजाँ का मौसम बदल गया !
मन को सुकून आया और ऐतबार हो चला
पल भर में ग़म ओ दर्द का जज़्बा बदल गया !
लोगों के रंज ओ ग़म का फ़साना हुआ ख़तम
हर आम जन और ख़ास का चेहरा बदल गया  !
बदले सभी के फैसले शिकवे गिले मिटे
मन का मलाल पल में खुशी में बदल गया !   

आदरणीया
आशलता जी

हुई दूरियां उनसे
अधिक प्रिय गैर लगने लगे 
अब अपने हुए पराए |
बहुत सोचा विचारा 
 पर कारण तक पहुँच न पाया
 समझ ना पाया ऐसा हुआ क्या ?
क्या  किशोरावस्था हावी हुई ?
स्वभाव में उग्रता आई
 अपनों की सलाह रास न आई



आदरणीया अभिलाषा चौहान जी

जलती बेटी आग में ,कैसे ये हालात।
नरभक्षी मानव बना,करे घात पर घात।
करे घात पर घात,हवस का बना पुजारी।
करता मीठी बात,बना तलवार दुधारी।
कहे अपना खुद को,मुंह से लार टपकती।
बहू हो या बेटी,देखी आग में जलती।



आदरणीया
सुजाता प्रिया जी
हालात के आगे नारियाँ मजबूर हो गयी
दूध की लाज न रखे, बने न राखी  रखवाले।
हाड़-मांस के पुतले तुम पत्थर के दिलवाले।
माँ-बहनों की इज्जत भी चकनाचूर हो गई।
लूट जाना जिनकी आवरू दस्तूर हो गई।


आदरणीया अनुराधा जी
छली-सी खड़ी

हे माधव
हे गोविन्द हे त्रिपुरारी
बचा न सको
तो मिटा दो तुम नारी
न रहेगी जननी
न बढ़ेगी सृष्टि
बिगड़ेंगे हालात
बंजर धरा
काँटो भरी होगी।।



आदरणीया कुसुम जी
वजह क्या थी

हवाओं  की पुरजोर कोशिश
उसे उडा ले चले संग अपने
कहीं खाक में मिला दे
पर वो जुडा था पेड के स्नेह से
डटा रहता हर सितम सह कर
पर यकायक वो वहां से
टूट कर उड चला हवाओं के संग
वजह क्या थी ?

आदरणीया
शुभा मेहता
हालात
कुछ तमाशबीन जुटे हैं
और कुछ चिल्लाए 
  लुटती अस्मतों को तो
कोई बचा ना पाए 
बन रहा  आज का मानव 
कितना हिंसक

आदरणीया 
मीना शर्मा जी

फटा कलेजा धरती माँ का,
दुष्कर हैं हालात !
बादल,क्यों करते हो 
इतना पक्षपात ?
ओ जल वितरण के ठेकेदार !
तुम पर भी छाया भ्रष्टाचार?

★★★★★

आज का हमक़दम कैसा लगा?
आपकी प्रतिक्रियाएँ मनोबल बढ़ा जाती है।

हमक़दम का अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।

#श्वेता

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