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बुधवार, 30 अक्टूबर 2019

1566..किस कदर खामोश हैं चलते हुए वे लोग..


।।भोर वंदन।।
ज्योति पर्व के बाद एक और ... 
कालजयी रचना 
आदरणीय केदारनाथ सिंह जी के शब्दों के साथ..✍


१.
"जाना, फिर जाना,
उस तट पर भी जा कर दिया जला आना,
पर पहले अपना यह आँगन कुछ कहता है,
उस उड़ते आँचल से गुड़हल की डाल
बार-बार उलझ जाती हैं,
एक दिया वहाँ भी जलाना;
जाना, फिर जाना..!!"
२ .
"शब्द सारे धूल हैं, व्याकरण सारे ढोंग,
किस कदर खामोश हैं चलते हुए वे लोग!


पियाली टूटी पड़ी है , गिर पड़ी है चाय ~

साइकिल की छाँह में सिमटी खड़ी है गाय!



पूछता है एक चेहरा दूसरे से मौन ~~

बचा हो साबूत- ऐसा कहाँ है वह कौन?"



🌼🌼






वक़्त की रफ्तार में ये क्या फसाने हो गए

खो गया बच्चों का बचपन वो सयाने हो गए।



बस किताबी ज्ञान में उलझा हुआ है बचपना

खेलना मिट्टी में कंचों से जमाने हो गए।

🌼🌼






पैरों के महावर से

माँग में भरे सिंदूरी रंग से

काले मोतियों में गूँथे अटूट बंधन से

रेशम की डोर से

बाबुल की चुनरी से
देह से या देहातीत
मन से या मष्तिष्क से
और
आत्मा की अनन्त गहराइयों से..

🌼🌼



. दिगंबर नासवा जी..
रात की काली स्याही ढल गई ...

दिन उगा सूरज की बत्ती जल गई

रात की काली स्याही ढल गई

सो रहे थे बेच कर घोड़े, बड़े

और छोटे थे उनींदे से खड़े
ज़ोर से टन-टन बजी कानों में जब 

🌼🌼

जाते - जाते एक और खूबसूरत रचना के साथ आज की प्रस्तुति यहीं तक..



"जाते हुए पक्षी पर

रुके हुए जल पर

घिरती हुई रात पर
दो मिनट का मौन



जो है उस पर

जो नहीं है उस पर

जो हो सकता था उस पर

दो मिनट का मौन"

केदारनाथ सिंह
🌼🌼

।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍


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