स्नेहिल नमस्कार
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चिट्ठाजगत के सम्मानीय चिट्ठाकारों के लिए संदेश-
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आप हम सभी चिट्ठाकार अपने लेखन के शौक को पूरा करने के लिए इस जगत से जुड़े हैं।
इंटरनेट क्रांति के इस त्वरित प्रतिक्रिया के युग में
चिट्ठाजगत में लिखे जाने वाले साहित्य पर बेहद धीमी
प्रतिक्रिया और पाठकों की नीरसता से एक उदासी सी छायी रहती है।
यहाँ उत्कृष्ट साहित्यिक सृजन और साहित्यिक मर्मज्ञ होने के बावजूद
स्थापित चिट्ठाकारों के वर्चस्व को छोड़ दिया जाय तो
बाकी कविताएँ,लेख या अन्य रचनाएँ दो-चार अदद प्रतिक्रियाओं के लिए मुँह बाये रहती है और फिर लेखक निराश होकर
फेसबुक,इंस्टाग्राम, ट्वीटर जैसे सोशल मंचों की ओर मुड़ने लगते जिसमें लिखकर पोस्ट करते ही
तुरंत लाईक और प्रतिक्रियाएँ आती है और जिससे उत्साहित लेखक नये-नये सृजन करते हैं वहींं सक्रिय हो जाते हैं।
आप ही सोचिये
अब ऐसे में किसी चिट्ठाकार के किसी पेज पर कोई पाठक प्रतिक्रिया लिखे और उसपर लिखा आये कि
"प्रतिक्रिया स्वीकृति के बाद दिखेगी"
मन झुंझलाहट से भर जाता है।
ऐसा भी क्या लिख देंगे हम? पाठक दुबारा वहाँ कमेंट लिखने मजबूरीवश जायेगा।
चिट्ठाजगत में लेखक और पाठक एक दूसरे का जितना सम्मान करते है वो अन्य सोशल मंचों पर दुर्लभ है। शालीन और सम्मानजनक प्रतिक्रिया देने वाले हमारे चिट्ठाजगत में "कमेंट अप्रूवल " लगाने का औचित्य समझ नहीं आता।
हाँ,हर जगह अच्छे बुरे विचार के लोग होते है अगर आपको किसी की प्रतिक्रिया नहीं पसंद आ रही तो
आप उसे मिटा सकते हैं या मुँहतोड़ विरोध लिख सकते हैं।
प्रतिक्रिया में कंजूस हमारे चिट्ठाजगत में
"कमेंट एप्रूवल"
का ऑप्शन लगाने के पहले सोचिये ज़रा।
★
अब आइये पढ़ते हैं आज की रचनाएँ-
आदरणीया रजनी मल्होत्रा(नैय्यर) जी
स्त्री कितनी आज़ाद
आदरणीय सुबोध सिन्हा जी
दो संस्मरण
सुबह तक क्या कई दिनों तक उस चुड़ैल की चर्चा ब्लॉक और आस पास के गाँव में होती रही।
ये बात भी पापा को एक सप्ताह बाद पता चल ही गई, मैंने ही बतलाया था अपनी आदतानुसार और ...
मन भर या उस से भी ज्यादा डाँट सुनने को मिली।
तो ....ये थी अन्धविश्वास (?) से जुड़ी मेरे बचपन की जी हुई खुराफ़ाती दो घटनाएँ ....
काश !!! धारा-370 की तरह ये "अंधविश्वास" का भी अंत हो पाता अपने समाज से
तो हमारी खुशियाँ सौ गुणी हो जाती।
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चिट्ठाजगत के सम्मानीय चिट्ठाकारों के लिए संदेश-
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आप हम सभी चिट्ठाकार अपने लेखन के शौक को पूरा करने के लिए इस जगत से जुड़े हैं।
इंटरनेट क्रांति के इस त्वरित प्रतिक्रिया के युग में
चिट्ठाजगत में लिखे जाने वाले साहित्य पर बेहद धीमी
प्रतिक्रिया और पाठकों की नीरसता से एक उदासी सी छायी रहती है।
यहाँ उत्कृष्ट साहित्यिक सृजन और साहित्यिक मर्मज्ञ होने के बावजूद
स्थापित चिट्ठाकारों के वर्चस्व को छोड़ दिया जाय तो
बाकी कविताएँ,लेख या अन्य रचनाएँ दो-चार अदद प्रतिक्रियाओं के लिए मुँह बाये रहती है और फिर लेखक निराश होकर
फेसबुक,इंस्टाग्राम, ट्वीटर जैसे सोशल मंचों की ओर मुड़ने लगते जिसमें लिखकर पोस्ट करते ही
तुरंत लाईक और प्रतिक्रियाएँ आती है और जिससे उत्साहित लेखक नये-नये सृजन करते हैं वहींं सक्रिय हो जाते हैं।
आप ही सोचिये
अब ऐसे में किसी चिट्ठाकार के किसी पेज पर कोई पाठक प्रतिक्रिया लिखे और उसपर लिखा आये कि
"प्रतिक्रिया स्वीकृति के बाद दिखेगी"
मन झुंझलाहट से भर जाता है।
ऐसा भी क्या लिख देंगे हम? पाठक दुबारा वहाँ कमेंट लिखने मजबूरीवश जायेगा।
चिट्ठाजगत में लेखक और पाठक एक दूसरे का जितना सम्मान करते है वो अन्य सोशल मंचों पर दुर्लभ है। शालीन और सम्मानजनक प्रतिक्रिया देने वाले हमारे चिट्ठाजगत में "कमेंट अप्रूवल " लगाने का औचित्य समझ नहीं आता।
हाँ,हर जगह अच्छे बुरे विचार के लोग होते है अगर आपको किसी की प्रतिक्रिया नहीं पसंद आ रही तो
आप उसे मिटा सकते हैं या मुँहतोड़ विरोध लिख सकते हैं।
प्रतिक्रिया में कंजूस हमारे चिट्ठाजगत में
"कमेंट एप्रूवल"
का ऑप्शन लगाने के पहले सोचिये ज़रा।
★
अब आइये पढ़ते हैं आज की रचनाएँ-
आदरणीया रजनी मल्होत्रा(नैय्यर) जी
स्त्री कितनी आज़ाद
सांसों का स्पंदन
भी फीका और बेस्वाद,
धड़कता है
पर अपना
ही इख़्तियार नही उनपर…
चलते हैं पग
पर रास्ते और मंजिल भी
मेरे द्वारा तय नहीं,
★★★★★आदरणीय सुबोध सिन्हा जी
दो संस्मरण
सुबह तक क्या कई दिनों तक उस चुड़ैल की चर्चा ब्लॉक और आस पास के गाँव में होती रही।
ये बात भी पापा को एक सप्ताह बाद पता चल ही गई, मैंने ही बतलाया था अपनी आदतानुसार और ...
मन भर या उस से भी ज्यादा डाँट सुनने को मिली।
तो ....ये थी अन्धविश्वास (?) से जुड़ी मेरे बचपन की जी हुई खुराफ़ाती दो घटनाएँ ....
काश !!! धारा-370 की तरह ये "अंधविश्वास" का भी अंत हो पाता अपने समाज से
तो हमारी खुशियाँ सौ गुणी हो जाती।
★★★★
आदरणीय मुकेश सिन्हा जी
बारिश
बूँदें!
हर जगह
चमकती-खनकती
तस्वीर तुम्हारी!
पारदर्शी हो गयी हो क्या?
या
अपवर्तन के बाद
परावर्तित किरणोंं-सी
ढल जाती हो
तुम!!
★★★★★★
आदरणीय एम. वर्मा जी
सूरज से टकराया
दो पल के सुकून के लाले
खोले उसने सात ताले,
तिलिस्मी मंजर
मकडी के जाले,
गुंजायमान अट्टहास
कृत्रिम अनुबंध,
रिश्तो की अस्थिया
लोहबानी गंध,
★★★★★
आदरणीय सुधा देवरानी जी
भावनाओं के प्रसव की उपज है कविता
फिर कागज पे कलम से बुन लूँ
बन जाये कोई कविता
जो मन को लगे सुहानी
फुर उड़ चला ये नील गगन में
लौटा फिर इसी चमन में
पर ना साथ कुछ भी लाया
मैने फिर इसे भगाया
जा ! सागर बड़ा सुहाना
सुन्दर हो कोई मुहाना !
कहीं सीपी मचल रही हो...
★★★★★★★
आदरणीया अनीता सैनी जी
वक़्त का रिसता नासूर
पृथ्वी के परिक्रमण की तरह कहूँ
या परिभ्रमण की तरह उलझी
नारी चित्त में
असीम लालसा की ललक
धड़कनों में धड़कती रहती है |
क्या नारी स्वयंअपनी पीड़ा
का प्रचंड रुप गढ़ रही है ?
वर्तमान का बदलता परिवेश
क्या फिर इतिहास
दोहराएगा ?
★★★★★★★
और चलते-चलते
आदरणीय विश्वमोहन जी
सतीसर की सैर
पौराणिक,ऐतिहासिक और भूगर्भीय सभी तथ्य इस विषय पर एकमत हैं कि प्राचीन काल में यह समूचा प्रदेश जलमग्न था I नीलमत पुराण के अनुसार ‘का’ अर्थात जल के ‘समीर’अर्थात हवा के द्वारा ‘शिमिर’ अर्थात रिक्त किये जाने के कारण यह प्रदेश कश्मीर कहलायाI अन्य कारणों में इस नाम का साम्य ‘कश्यप-मेरु’ (कश्यप पर्वत), या ‘कश्यप-मीर’ (कश्यप झील) या ‘कश्यप-मार’ (कछूये की झील) से बिठाया जाता है I प्राकृत भाषा में ‘कास’जलमार्ग का द्योतक है I राजतरंगिणी में ऐसा प्रसंग उल्लिखित है कि इस जलमग्न प्रदेश में‘देवोद्भव’ नामक नाग जाति के असुर का निवास था I उसके अत्याचार से मुक्ति हेतु मरीची पुत्र कश्यप ने भगवान विष्णु की तपस्या की I विष्णु ने वाराह बनकर असुर का संहार कियाI तदोपरांत वाराह ने अपने घर्षण से पर्वत को काटकर सारा जल बहा दिया I उस पर्वत को‘वाराह-मुल’ के अपभ्रंश स्वरुप ‘बारामुला’ के नाम से जानते हैं I ऐतिहासिक विचारकों का संकेत इस ओर है कि सेमीटिक जन-जाति की ‘काश’ प्रजाति के लोगों का निवास होने के कारण यह प्रदेश कश्मीर कहलाया I भूगर्भीय शोधों पर आधारित वैज्ञानिक मत है कि करीब दस करोड़ वर्ष पहले यह शीत प्रदेश सैकड़ों फीट गहराई तक जलमग्न था I
★★★★★
आज का यह अंक आपको कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया
उत्साहवर्धन करती है।
हमक़दम का विषय है
शर्त
कल का अंक पढ़ना न भूलें कल आ रही हैं विभा दी
अपनी विशेष प्रस्तुति लेकर।
#श्वेता सिन्हा
★★★★★★
आदरणीय एम. वर्मा जी
सूरज से टकराया
दो पल के सुकून के लाले
खोले उसने सात ताले,
तिलिस्मी मंजर
मकडी के जाले,
गुंजायमान अट्टहास
कृत्रिम अनुबंध,
रिश्तो की अस्थिया
लोहबानी गंध,
★★★★★
आदरणीय सुधा देवरानी जी
भावनाओं के प्रसव की उपज है कविता
फिर कागज पे कलम से बुन लूँ
बन जाये कोई कविता
जो मन को लगे सुहानी
फुर उड़ चला ये नील गगन में
लौटा फिर इसी चमन में
पर ना साथ कुछ भी लाया
मैने फिर इसे भगाया
जा ! सागर बड़ा सुहाना
सुन्दर हो कोई मुहाना !
कहीं सीपी मचल रही हो...
★★★★★★★
आदरणीया अनीता सैनी जी
वक़्त का रिसता नासूर
पृथ्वी के परिक्रमण की तरह कहूँ
या परिभ्रमण की तरह उलझी
नारी चित्त में
असीम लालसा की ललक
धड़कनों में धड़कती रहती है |
क्या नारी स्वयंअपनी पीड़ा
का प्रचंड रुप गढ़ रही है ?
वर्तमान का बदलता परिवेश
क्या फिर इतिहास
दोहराएगा ?
★★★★★★★
और चलते-चलते
आदरणीय विश्वमोहन जी
सतीसर की सैर
पौराणिक,ऐतिहासिक और भूगर्भीय सभी तथ्य इस विषय पर एकमत हैं कि प्राचीन काल में यह समूचा प्रदेश जलमग्न था I नीलमत पुराण के अनुसार ‘का’ अर्थात जल के ‘समीर’अर्थात हवा के द्वारा ‘शिमिर’ अर्थात रिक्त किये जाने के कारण यह प्रदेश कश्मीर कहलायाI अन्य कारणों में इस नाम का साम्य ‘कश्यप-मेरु’ (कश्यप पर्वत), या ‘कश्यप-मीर’ (कश्यप झील) या ‘कश्यप-मार’ (कछूये की झील) से बिठाया जाता है I प्राकृत भाषा में ‘कास’जलमार्ग का द्योतक है I राजतरंगिणी में ऐसा प्रसंग उल्लिखित है कि इस जलमग्न प्रदेश में‘देवोद्भव’ नामक नाग जाति के असुर का निवास था I उसके अत्याचार से मुक्ति हेतु मरीची पुत्र कश्यप ने भगवान विष्णु की तपस्या की I विष्णु ने वाराह बनकर असुर का संहार कियाI तदोपरांत वाराह ने अपने घर्षण से पर्वत को काटकर सारा जल बहा दिया I उस पर्वत को‘वाराह-मुल’ के अपभ्रंश स्वरुप ‘बारामुला’ के नाम से जानते हैं I ऐतिहासिक विचारकों का संकेत इस ओर है कि सेमीटिक जन-जाति की ‘काश’ प्रजाति के लोगों का निवास होने के कारण यह प्रदेश कश्मीर कहलाया I भूगर्भीय शोधों पर आधारित वैज्ञानिक मत है कि करीब दस करोड़ वर्ष पहले यह शीत प्रदेश सैकड़ों फीट गहराई तक जलमग्न था I
★★★★★
आज का यह अंक आपको कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया
उत्साहवर्धन करती है।
हमक़दम का विषय है
शर्त
कल का अंक पढ़ना न भूलें कल आ रही हैं विभा दी
अपनी विशेष प्रस्तुति लेकर।
#श्वेता सिन्हा






