कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ, तुम मिल गई
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ,
राही हमारा नाम है,
आइये अब आपको आज की
पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-
पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

मैं तुम्हारी बेरुखी,
तुम्हारी बेमुरव्वती,
तुम्हारी बेदिली की
सूखी बेजान डालियों को थाम
तुम्हारी जड़ों तक पहुँचने की
एक निरर्थक कवायद कर रही हूँ !

घास उगी वन औ उपवन
गीले सूखे चहल पहल कुछ तेज हुई
हरा बिछौना कोमल तन की सेज हुई
दृश्य है कितना मन-भावन
घास उगी .
मुस्कुराहट
छलकी अनायास
सूर्य आभा के साथ
निर्विघ्न खुले
मन की देहरी के
सांकल चढ़े द्वार

एक घड़ा खटिया से दूर
दवाइयां अंगीठी में ऊंचाई पर
चश्मा भी इधर ही कहीं होगा
ये सब मेरी पहुँच से दूर
लेकिन मेरे लिए छोड़े।

गाँव ग़ुमराह हुए हमारे ,
रौनक लगे शहर की प्यारी,
खेतों के अश्रु झर रहे ,
सैर मार्किट में उगति फ़सलें सारी,
तोड़ इस का बतलाओ साधो !
गर्दिश में जनता सारी |
मेरे गीत भरे होठों पर
मेरी दर्द भरी आत्मा पर
स्वप्न नहीं अब
गीत नहीं अब
दर्द नहीं अब
एक पर्त ठंडे लोहे की
मैं जम कर लोहा बन जाऊँ -
हार मान लूँ -
यही शर्त ठंडे लोहे की'
सौजन्य :कविता कोश'
आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे आगामी गुरूवार की प्रस्तुति में।
रवीन्द्र सिंह यादव