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मंगलवार, 6 अगस्त 2019

1481...एक घड़ा खटिया से दूर...

सादर अभिवादन। 
कल 5 अगस्त को 
कविवर डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' की जयंती थी। आदरणीय सुमन जी का सादर स्मरण 
करते हुए प्रस्तुत है उनकी एक रचना का अंश-
'कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया 
कुछ बोझ अपना बँट गया 
अच्छा हुआ, तुम मिल गई 
कुछ रास्ता ही कट गया 
क्या राह में परिचय कहूँ, 
राही हमारा नाम है, 

चलना हमारा काम है।'
आइये अब आपको आज की 
पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-    

 

मैं तुम्हारी बेरुखी,
तुम्हारी बेमुरव्वती,
तुम्हारी बेदिली 
सूखी बेजान डालियों को था
तुम्हारी जड़ों तक पहुँचने 
एक निरर्थक कवायद कर रही हूँ !



घास उगी वन  उपव
गीले सूखे चहल पहल कुछ तेज हु
हरा बिछौना कोमल तन की सेज हु
दृश्य है कितना मन-भाव
घास उगी .



मेरी फ़ोटो 

मुस्कुराहट
छलकी अनायास 
सूर्य आभा के साथ
निर्विघ्न खुले
मन की देहरी के
सांकल चढ़े द्वार



 

एक घड़ा खटिया से दूर
दवाइयां अंगीठी में ऊंचाई पर 
चश्मा भी इधर ही कहीं होगा 
ये सब मेरी पहुँच से दूर 
लेकिन मेरे लिए छोड़े।



गाँव  ग़ुमराह  हुए  हमारे ,  
रौनक  लगे  शहर  की प्यारी
खेतों  के  अश्रु  झर  रहे , 
सैर मार्किट में उगति  फ़सलें सारी,
तोड़  इस  का  बतलाओ  साधो !
गर्दिश  में  जनता  सारी |


हम-क़दम के तेरासीवें (83 ) अंक का विषय है -
शर्त 
इस विषय पर आप अपनी रचनाएँ 
आगामी शनिवार 10 अगस्त 2019, सायं 3:30 बजे तक इसी ब्लॉग में बायीं ओर 
निर्धारित संपर्क फ़ॉर्म के ज़रिए भेजिए।    

इस विषय पर उदाहरण स्वरुप कविवर डॉ. धर्मवीर भारती जी की रचना 'ठंडा लोहा' का एक अंश प्रस्तुत है-   


 'मेरी स्वप्न भरी पलकों पर

मेरे गीत भरे होठों पर

मेरी दर्द भरी आत्मा पर

       स्वप्न नहीं अब

       गीत नहीं अब

      दर्द नहीं अब

एक पर्त ठंडे लोहे की

मैं जम कर लोहा बन जाऊँ

हार मान लूँ

यही शर्त ठंडे लोहे की' 


सौजन्य :कविता कोश'

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे आगामी गुरूवार की प्रस्तुति में। 

रवीन्द्र सिंह यादव 
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