।।प्रातः वंदन।।
हो प्रकृतस्थ : तनो मत
कटी-छँटी उस बाड़ सरीखी,
नमो, खुल खिलो, सहज मिलो
अंतःस्मित, अंत-संयत हरी घास-सी।
क्षण भर भुला सकें हम
नगर की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट
और न मानें उसे पलायन
और न सहसा चोर कह उठे मन में -
प्रकृतिवाद है स्खलन !
-अज्ञेय
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आज की लिंकों मेंं शामिल ब्लॉग के नाम क्रमानुसार पढे..✍
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कुछ बात करें !
शब्दों की मुस्कुराहट :)
सागर लहरें
राजीव उपाध्याय
विश्वमोहन उवाच
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ऐसा हुआ है कि एक साथ कई तरह की बातें दिमाग से तेज़ी से होकर गुज़र जाएं और तुम उनकी रफ़्तार का पीछा ही न कर सको ! हफ्तों पुरानी चादर पर आलस में लिपटा धप्प से पड़ा हुआ मेरा शरीर मेरे दिमाग से सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है। ..
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अक्सर हो जाती है
इकट्ठी
ढेर सारी व्यस्तताएँ
और आदमी
फस जाता है इन व्यस्तताओं
के जाल में ..
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भावों के कलम से पीर नीर की लिखती हूँ
तपता सूरज तप्त धरा की पीर लिखती हूँ!
काट रहे उन वृक्षों को तुम ,जो छाया देते हैं,
घिर घिर आते काले बादल लौट के जातें हैं
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मेरे घर का मेरा वो कोना
जो अब तुम्हारा हो चुका है
मुझमें तेरे होने की
वही कहानी कहता है
जो कभी माँ
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सरस सुधा-रस से।
श्रृंगार और अभिसार के,
मेरे वे तीन प्रेम-पथिक।
एक वह था जो तर्कों से परे,
निहारता मुझे अपलक।
छुप-छुपकर, अपने को भी छुपाये,
मेरे अंतस में, अपने चक्षु गड़ाए
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍




