सादर अभिवादन।
हर रोज़ देश पर चिंतन करते हैं हम,
संसद में जनप्रतिनिधियों का चरित्र देखते हैं हम,
जल-संकट हो या सैकड़ों बच्चों की अकाल मौत,
संसद में तो कुछ और ही गूँजता सुनते हैं हम।
-रवीन्द्र
आइये अब आपको साहित्य के रसास्वादन हेतु कुछ रचनाओं से परिचय करायें-

छूट जाउँगी
सकल इन बंधनों से,
राम तुम बन जाओगे
छूकर मुझे
और मुक्त हो जायेगी
एक शापित अहिल्या
छू लिया तुमने
उसे जो प्यार से
निज मृदुल कर से !

वीरागंणा गजब
पवन अश्व सवार थी।
दुश्मनों को धूल चटाती
हिम्मत की पतवार थी।

मोड़ ले, अपनी राहें!
भर ना तू,
उनकी चाहत में आहें!
क्यूँ उनको ही चाहे,
खुद को भटकाए,
अंजान दिशाएं,
क्यूँ खुद को ले जाए?
दरक रही धरती की मिट्टी, उजड़े सारे बाग।
त्राहि - त्राहि मचा रहा, छेड़ों अब नये राग।।
जल ही कल का जीवन है,कर लो इसका भान।
जो समय पर न चेते,खतरे में होगी अपनी जान।।
नृशंसता और बर्बरता का जमाना गया नही है
जरा सोचिए तो
कितनी सभ्यताएं हम लांघ चुके है
फिरभी सभ्य हुए है हम कितने !
आज जब वॄंदा काम करके घर जाने लगी तो अरुन्धती ने रोकते हुये कहा- वॄंदा आज तुम्हारे मधुर का रिजल्ट आ गया। बडी उत्सुकता से वॄंदा बोली मैडम जी मिल जायगा न मधुर को दाखिला। वॄंदा की आंखों में उभर आयी चमक को देखकर प्रिन्सिपल मैडम जो विघालय में एक तेज तर्राक, और हदयहीना महिला समझी जाती थी, यह साहस नही कर पा रही थी कि कैसे मै इस माँ और बच्चे की आशाओं के दिये को अपने निर्मम उत्तर से बुझा दूँ। तभी उस अनपढ वॄंदा को समझ आ गया कि उसके सपनों के पंख कट चुके है, बहुत धीरे से अपने बेटे के सर पर हाथ सहलाती हुयी बोली- मैडम जी क्या बहुत खराब परचा किया था मेरे बेटे ने।
हम-क़दम का नया विषय
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आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति के साथ।
रवीन्द्र सिंह यादव