मैं ना बहुत कंजूस हूँ
दर्द बाँटना नहीं आता
दर्द बाँट लेना आता है
सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
बस, तभी से उसका नाम न केवल
कंजूस -मक्खीचूस पड़ गया,
बल्कि बेहद कंजूस को इसी नाम से
पुकारे जाने का रिवाज़ ही चल पडा।


भ्रमर परागों पर बैठेगें
धरी रहेगी रखवाली
खुश्बू ख़ुद उड़ने को आतुर
क्या कर लेगा जी माली
हम तो खुशी बांटने आये
खुशी बांटकर जायेंगे
चलो बजा दो सारे मिलकर
एक बार खुलकर ताली।

आसमान से आवाज़ आयी कि हे राजा तुम्हारी राजधानी के
बीचो बीच जो पुराना सूखा कुंआ है अगर अमावस्या की रात को
राज्य के प्रत्येक घर से एक – एक बाल्टी दूध उस कुएं में डाला जाये तो
अगली ही सुबह ये महामारी समाप्त हो जायेगी
और लोगों का मरना बन्द हो जायेगा।
आपके पास पैसा है…
तो लोग पूछते है… कैसा हैं?
छोड़ो इन मतलबी लोगो को,
इनका स्वभाव ही ऐसा हैं…
><
कहीं पढ़ने को मिला
स्वार्थी से अच्छा सारथि है
फिर मिलेंगे...
अब बात तिहत्तरवें विषय की
विषय
विषय
प्रदूषण
उदाहरण
कोई किसीकी बात नहीं सुनता
अपने ही अंतर के शोर से जैसे
सबके कान सुन्न हो गए हैं !
प्रदूषण की मटियाली आँधी में
न चाँद दिखता है ना सूरज
ना कोई ध्रुव तारा
इसी अंक से
साधना दीदी की रचना
प्रेषण तिथि - 01 जून 2019 (शाम 5 बजे तक)
प्रकाशन तिथि - 03 जून 2019
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