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बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

1321..मैत्री का मूल्य न पहचाना..


।।उषा स्वस्ति।।
हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।
              -रामधारी सिंह (दिनकर)

देश के मौजूदा हालात को दृष्टिगत करती रचना के साथ आज लिंकों पर नजर डालें..✍

🔆🔆




कहने को तो खेल है,
पर सबके मायने हैं !
कितकित  ... एक पैर पर छोटे से दायरे को
कूद कूदकर पार करना,
कहीं क्षणिक विराम के लिए
दोनों पाँव रखना,
फिर बढ़ना  ... ज़िन्दगी ही है !

🔆🔆




मेरा होश उड़ाने की तेरी आदत सी हो गयी है,
मेरा दिल धड़काने की तेरी आदत सी हो गयी है

🔆🔆


आदरणीया आशा सक्सेना जी की रचना..


 नहीं जानते थे
पर माँ का स्पर्श पहचानते थे
वही उन्हें सुकून देता था
 दुनिया की सारी दौलत
बाहों में समेत लेता था
वय  बढ़ी मिले मित्र  बहुतेरे  
उनसे बढ़ा लगाव अधिक..

🔆🔆



उसका करार भी खो गया..
अनुबंध था उत्कर्ष का
सम्बन्ध था दुःख-हर्ष का
व्यापार था खुदगर्ज का
उसका करार भी खो गया.
दिया अनंत सम्मान था
पहचान था अभिमान था
🔆🔆

आदरणीय श्याम बिहारी श्यामल जी रचना के साथ आज यहीं तक. .


जो पसंद नहीं कभी क़ुबूल नहीं,
ऐसा भी कोई अड़ता है क्या
अपना रास्ता खुद ही रोके रहा,
ऐसे भी कोई लड़ता है क्या ..
🔆🔆
हम-क़दम का नया विषय
🔆🔆

।।इति शम।।

धन्यवाद
पम्मी सिंह'तृप्ति'..✍


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