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शनिवार, 7 अगस्त 2021

3113... स्वतन्त्रता दिवस का अमृतोत्सव




बहुत कम लोग जानते हैं कि वो बहुत कम जानते हैं।~हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

-क्या कहूँ! हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी को मुझसे भेंट नहीं हो सकी...

 हाज़िर हूँ...! उपस्थिति दर्ज हो....

कुछ नशा तिरंगे की आन का है,

कुछ नशा मात्रभूमि की शान का है,

हम लहरायेंगे चारो दिशाओं में यह तिरंगा 

कुछ नशा हिन्दुस्तान के मान का है..

गुमनाम शहीद

बावनी इमली शहीद स्थल उत्तरप्रदेश के फतेहपुर जिले के बिन्दकी उपखण्ड में खजुआ कस्बे के निकट पारादान में स्थित है. यह स्थान ठाकुर जोधा सिंह अटैया और उनके साथियों की कुर्बानी के लिए काफी प्रसिद्द है . ठाकुर जोधा सिंह बिंदकी के अटैया रसूलपुर अब पधारा गांव के निवासी थे.

गुमनाम शहीद

इतिहासकार सुरिंदर कोछड़ और गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान परमजीत सिंह सरकारिया ने बताया, कि पहले तो इन अस्थियों के साथ मिली मिट्टी को गोइंदवाल साहिब या ब्यास दरिया में बहाया जाएगा। इसके बाद इन अस्थियों को साफ कर इनका डीएनए टेस्ट कराने के बाद रिती रिवाजों से इनका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा।

शहीद

हमें कुछ ख़ास आदरणीय देशभक्तों को महान कहने की सरकारी कयावद से ज्यादा दिक्कत नहीं..दिक्कत है तो इस बात से कि कब इस मुल्क में उन बाकि बिसरा दिए गए शहीदों को उनका असली सम्मान, असली इज्ज़त और वो मुकाम मिलेगा जिसके वो हकदार उन ख़ास लोगों से तो ज्यादा हक़दार नहीं तो फिर कम भी नहीं थे ….

देशभक्ति

ना सरकार मेरी है

ना रौब मेरा है

ना बड़ा सा नाम मेरा है

मुझे तो एक छोटी सी बात पर गर्व है,

मैं "हिंदुस्तान" का हूँ और "हिंदुस्तान" मेरा है।

देशभक्ति

झुक जाता है हर सिर इनके सम्मान में,

जब ये सिर उठाकर, कदम मिलाकर चलते है.....!! जय हिन्द !!

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पुन: भेंट होगी...
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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

1313....मानव ने बम बन घात किया, ये सोच के दिल घबराता है।


जय मां हाटेशवरी.....
जो वीर  हर पल सरहदों पर......
हमारी सुरक्षा में तैनात रहते हैं.......
जो एक-एक वीर......
सैंकड़ों दुशमनों को मारने की क्षमता रखता हैं.....
पुलवामा में इन वीरों के साथ जो घटा......
वो इन की सुरक्षा में एक बड़ी चूक ही कही जाएगी.....
  इस से सारा देश शोकाकुल है......
इन वीर-शहीदों को मेरी ओर से.....
भावभीनी श्रद्धांजली व कोटि-कोटि नमन......


कैसी आतंकी चली हवा, ये सोच के दिल घबराता है।
घर में ही ख़ूनी खेल हुआ, ये सोच के दिल घबराता है।

मां से मिलने आया बेटा, लेकिन शहीद के चोले में,
ख़ामोश तिरंगे में लिपटा, ये सोच के दिल घबराता है।



फौजी बूटों की आवाज़ सुनते ही दो दिन में यह
लोग जेहाद , अलगाववाद और बहत्तर हूरों 
का ख्वाब भूल कर देश प्रेम सीख जाएंगे। 
सारी अकड़ फुर्र हो जाएगी।जैसे खालिस्तानियों
की हो गई। इंदिरा गांधी जैसा यह कड़ा फैसला 
लेना काश कि नरेंद्र मोदी भी आज सीख जाते। 
इंदिरा गांधी ने तो जब ज़रूरत पड़ी थी , 
अमृतसर के स्वर्ण  मंदिर में सेना भेज कर कड़ी 
सैनिक कार्रवाई भी की थी। कश्मीर सहित देश 
की उन सभी मस्जिदों , मजारों और मदरसों में , 
जो जेहादी पैदा कर रही हैं , नमाज की आड़ 
में हिंसा का पाठ पढ़ा रही हैं , वहां पुलिस नहीं , 
सीधे सेना भेजनी चाहिए । नो कोर्ट , नो सुनवाई , 
मौके पर फाइनल करवाई । 
निदा फाजली लिख ही गए हैं :
उठ-उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए
दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया।



सरहद के वीर जवान
क्या कहना उन वीर जवानो का
सरहद पर जो सारी उम्र लड़े
कुछ अपने ही देश को खा गए
उस सैनिक की वीरगति का विषय लिए"

शहीद होते हमारे देश के जवान
नेता सेंकते हैं अपनी रोटियां
गृहमंत्री कर देते हैं निंदा
प्रधानसेवक कर देते हैं ट्वीट
टीवी एंकर स्टूडियों में करते हैं लड़ाई

चलते रहते वीर जवान॥
नाम रखेगे देश का अपने
लड़ते लड़ते मर जायेगे॥
ये वीर जवानो की टोली है,,
जाते जाते कुछ दे जायेगे॥
भारत देश के रहने वाले
इनको तुम प्रणाम करो॥
जान निछवर कर गए है॥
इनको लल्ला सलाम करो॥

अनेक बड़े मुस्लिम लेखकों, विचारकों, ने भी आग्रह किया 
है कि इस्लामी किताबों, मदरसों की शिक्षा, 
आदि की कड़ी समीक्षा करें। तभी आतंकवाद 
को समझना, और उपाय सोचना संभव है। जैसे, 
नगीब महफूज, इब्न वराक, वफा सुलतान, 
तसलीमा नसरीन, अय्यान हिरसी अली, 
अनवर शेख, तारिक फतह, आदि। यहाँ तक कि 
बच-बच के रहने वाले सलमान रुश्दी ने भी पूछा है: ‘जिस 
मजहबी विश्वास में मुसलमानों की इतनी श्रद्धा है, उस में ऐसा 
क्या है जो सब जगह इतनी बड़ी संख्या में हिंसक 
प्रवृत्तियों को पैदा कर रही है?’
और लंदन से लेकर श्रीनगर, ढाका, गोधरा, 
बाली तक, कई दशकों से जितने आतंकी 
कांड हुए, सब इस्लामी विश्वास से चालित रहे हैं। अधिकांश ने 
इस्लाम का नाम ले-लेकर अपनी करनी को फख्र से दुहराया है। 
अतः इस पर विचार न करना साफ भगोड़ापन है। कानून और 
न्याय-दर्शन की दृष्टि से भी यह अनुचित है। 
कोई भी सभ्य न्याय-प्रणाली किसी हत्यारे के अपने बयान को 
महत्व देती है। उस की जाँच भी होती है। 
पर उसे उपेक्षित नहीं किया जाता। क्योंकि उस से 
हत्या की प्रेरणा, मोटिव का पता चलता है। जब
असंख्य जिहादी, बार-बार अपने काम का कारण कुरान का 
आदेश बता रहे हों, तब इस से नजर 
चुराना आतंकवाद को प्रकारान्तर बढ़ावा देना 
ही हुआ। इस से नए-नए जिहादी बनने कैसे रुकेंगे? 
आखिर, दुनिया भर में मुसलमान आत्मघाती मानव-बम 
में कैसे बदलते रहते हैं, किस प्रेरणा से?


अब जिहादियों  और  मुसलमानों  के ऐसे  इरादों   के बारे में  
जानकारी होने पर भी  हिन्दू  सिर्फ  उत्सव  मनाने  ,  
जयंतियाँ  मनाने  , मंदिरों   में क्विंटलों सोना चांदी   चढाने  
को  ही  धर्म  मान लेते  हैं  , और सामने  शत्रु साफ  दिखाई देने पर 
उसी तरह  आँखें   बंद  कर लेते हैं  ,जैसे  कबूतर  बिल्ली को देख कर
आँखें  बंद करके  मान लेता है  कि सामने  बिल्ली  नहीं  है  . 
हिन्दू यदि  यही  कबूतरी  नीति  पर चलेंगे  तो  न तो  देश  बचेगा  
और न  हिन्दू धर्म ही रहेगा. हिन्दुओं   को इतिहास  से सबक  
लेने की  जरुरत  है  , याद रखिये जब  मेहमूद गजनवी  सोमनाथ 
पर हमले की तैयारी  कर रहता तो हिन्दू राजा यज्ञ  अनुष्ठान  कर रहे थे,और सोच रहे थे कि  भगवान शिव अपने तीसरे  नेत्र से म्लेच्छों  
को भस्म  कर देंगे  , हिन्दुओं   को समझना 
होगा  कि कोई  देवी  देवता उनको नहीं  बचा सकेगा
जबतक वह  खुद देश के और हिन्दुओं  के दुश्मन  जिहादियों  
को ईंट का जवाब पत्थर  से नहीं  देते  .

हम-क़दम अब बारी है अगले विषय की
उनसठवाँ विषय

क़रार 
उदाहरण
तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं
यानी ऐसा है जैसे फुरक़त हो 

है मेरी आरज़ू के मेरे सिवा

तुम्हें सब शायरों से वहशत हो

किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ


तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो 

रचनाकार जॉन ऐलिया


अंतिम तिथिः 23 फरवरी 2019
प्रकाशन तिथिः 25 फरवरी 2019


धन्यवाद।

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