सादर अभिवादन।
मन भर हुलास
आया मधुमास
कूकी कोकिला
कूजे पंछी
बसंत
छाया
है।
लो
आया
बसंत
ऋतुराज
फूले पलाश
मादक बयार
है बसंत बहार।
-रवीन्द्र
मन भर हुलास
आया मधुमास
कूकी कोकिला
कूजे पंछी
बसंत
छाया
है।
लो
आया
बसंत
ऋतुराज
फूले पलाश
मादक बयार
है बसंत बहार।
-रवीन्द्र

मरता क्या न करता? झक मार कर महंगे इंजेक्शन लगवाने में अपनी जेब कटवानी पड़ी. अब बच्चों के निर्देशों और हिदायतों की बारी थी. उनके प्रतिष्ठित पेटू पापा को राजस्थानी पकवानों से सख्त परहेज़ रखना था.हाँ, उनकी मम्मी बीकानेरी रसगुल्ले और जोधपुर की मावा की कचौड़ियाँ बेखटके खा सकती थीं. हमारे लिए एक आदेश यह भी था कि हमको बेटियों की नाज़ुक मम्मी को कहीं भी 11 नंबर की बस से यात्रा नहीं करानी थी और उन्हें हर जगह टैक्सी लेकर घुमाना था.

नजर,नजऱ की गुफ़्तगू स्वासों का बढ़ना
अच्छा लगता है!
मधुमास,में कोयल की कूक ह्रदय को
अच्छा लगता है!
किशोरी का मासूम स्वप्न.....कुसुम कोठारी


मां चांद मत देना चाहे
चांदनी का गोटा लगा देना
मां छोटा सा घूंघट डाल
मुझे भी साजन घर जाना।
तसव्वुर उनका याद कर
आँख कुछ पुरनम हुई
उनके खयालो मेंं हम हैं या
हमारे अलावा कोई नही ॥
गरीबी का दर्द.....अनुराधा चौहान

जर्जर काया लिए
अभाव में तरसते
झेलते ज़िंदगी का दर्द
रोजी-रोटी को तलाशते
सांझ को निढाल हो
फिर भूख को ओढ़कर
करवटें बदलते हुए

जर्जर काया लिए
अभाव में तरसते
झेलते ज़िंदगी का दर्द
रोजी-रोटी को तलाशते
सांझ को निढाल हो
फिर भूख को ओढ़कर
करवटें बदलते हुए

सच तो यह है
इन ग़रीबों को ही
जीने का शऊर नहीं,
मुफ्त की बिज़ली,पानी,ऋण माफ़ी,
गैस कनेक्शन,आवास योजना जैसी
शाही सुविधाओं की कल्पनाओं को
भोगने का लूर नहीं

मेरी जान !
सरसों का जोबन देखो
और आम पर बौर
कितना रोमांचित कर रहे हैं
नजरो को हमारे

आँखों में चुभ जाते हैं ख़्वाबों के टुकड़े
नींदों में बेचैनी सी हरदम दिखती है
आसमान कितना रोया है तुम क्या जानों
तुमको तो फूलों पे बस शबनम दिखती है