स्नेहिल अभिवादन
नज़र पर आप हमारे प्रिय रचनाओं ने इतना कुछ
रच दिया है कि जैसे अब और कुछ कहना शेष नहीं।
★
मेरी नज़र, उसकी नज़र, सबकी नज़र
नज़र बेरहम, नज़र हमदम, बावस्ता-ए- नज़र
★★★
सबसे पहले एक ग़ज़ल पढ़ लीजिए।
★
नज़र पर आप हमारे प्रिय रचनाओं ने इतना कुछ
रच दिया है कि जैसे अब और कुछ कहना शेष नहीं।
★
मेरी नज़र, उसकी नज़र, सबकी नज़र
नज़र बेरहम, नज़र हमदम, बावस्ता-ए- नज़र
★★★
सबसे पहले एक ग़ज़ल पढ़ लीजिए।
★
अपनी ही रवानी में बहता नज़र आता है
ये शहर बुलंदी से दरिया नज़र आता है
ये शहर बुलंदी से दरिया नज़र आता है
देता है कोई अपने दामन की हवा उस को
शो'ला सा मिरे दिल में जलता नज़र आता है
शो'ला सा मिरे दिल में जलता नज़र आता है
उस हाथ का तोहफ़ा था इक दाग़ मिरे दिल पर
वो दाग़ भी अब लेकिन जाता नज़र आता है
वो दाग़ भी अब लेकिन जाता नज़र आता है
आँखों के मुक़ाबिल है कैसा ये अजब मंज़र
सहरा तो नहीं लेकिन सहरा नज़र आता है
सहरा तो नहीं लेकिन सहरा नज़र आता है
इक शक्ल सी बनती है हर शब मिरी नींदों में
इक फूल सा ख़्वाबों में खिलता नज़र आता है
इक फूल सा ख़्वाबों में खिलता नज़र आता है
आँखों ने नहीं देखी उस जिस्म की रानाई
ये चार तरफ़ जिस का साया नज़र आता है
ये चार तरफ़ जिस का साया नज़र आता है
दरिया को किनारे से क्या देखते रहते हो
अंदर से कभी देखो कैसा नज़र आता है
अंदर से कभी देखो कैसा नज़र आता है
फिर ज़ौ में 'नदीम' अपनी कुछ कम है सितारा वो
ये रात का आईना धुँदला नज़र आता है
ये रात का आईना धुँदला नज़र आता है
©इनाम नदीम
★★★
हमक़दम के विषय "नज़र" पर
हमारे प्रतिभासंपन्न रचनाकारों की
लेखनी से निसृत
अद्भुत रचनाओं का आनंद लीजिए।
हमक़दम के विषय "नज़र" पर
हमारे प्रतिभासंपन्न रचनाकारों की
लेखनी से निसृत
अद्भुत रचनाओं का आनंद लीजिए।
★★★
तेरी प्यार वाली नज़र पड़ी
तो ये सारा आलम बदल गया,
तूने मुस्कुराकर क्या कहा,
मेरा गुरूर सारा पिघल गया...
तेरी प्यार वाली नज़र....
तो ये सारा आलम बदल गया,
तूने मुस्कुराकर क्या कहा,
मेरा गुरूर सारा पिघल गया...
तेरी प्यार वाली नज़र....
★★★★★★
किसीसे तुम प्यार करती हो
किसीसे मैं भी
किसीसे मैं भी
दर्द हम समझते हैं
बखूबी
एक-दूसरे का
पर हम एक दूसरे से प्यार नही करते
बखूबी
एक-दूसरे का
पर हम एक दूसरे से प्यार नही करते
★★★★★
एक बार जो वो गुलबदन गुज़रा था यां से,
उसकी खुशबु कबसे मेरे मकान पे है ,
उसकी खुशबु कबसे मेरे मकान पे है ,
आज फ़िर वो सज सवर के घर से निकला हैं ,
आज फ़िर मेरा सब्र इम्तेहान पे है ,
★★★★★★आज फ़िर मेरा सब्र इम्तेहान पे है ,
नजरों ने बड़े-बड़े काम किए हैं,
कहीं मिले दिल कहीं कत्लेआम किए हैं।
नजर-नजर की बात बड़ी बात कह गई,
जुबां न कह सकी जज़्बात कह गई।
झुकी-झुकी नजर हया बन गई,
तिरछी हुई नजर तो अदा बन गई।
★★★★★★
है नजर अपनी अपनी
जैसा सोचते है वही दिखाई देता है
जो देखना चाहते हैं अपने नजरिये से
करते हैं टिप्पणी अपने ही अंदाज में
कभी सोच कर देखना
एक ही इवारत पर
अलग अलग टिप्पणीं होती हैं कैसे ?
यही तो फर्क है लोगों के नजरिये में
यह चुभती-सी नजर
भेदती हैं तन को
करती छलनी मन को
कुछ टटोलती-सी
हर नारी के देह को
मिली नज़र
बजी जल तरंग
धड़का दिल
नज़रों ने की
मासूम शरारत
हुए गाफिल
झुकी नज़र
हिजाब की ओट में
शर्माई गोरी
लो फिसल ही गई नजर संभलते संभलते
कह गया आफताब फिर ढलते ढलते ।
कह गया आफताब फिर ढलते ढलते ।
चार कदम ना चल सके हयात ए सफर में
मिले थे कभी जो सरे राह चलते चलते।
मिले थे कभी जो सरे राह चलते चलते।
★★★★★
नजरों में कैसी समायी ये दुनिया
पलकें उठा कर बिजली गिराती
उमड़ते अरमानों को है जलाती
निगाहों में यादें बसाती ये दुनिया
इंसानों को ठगती ,हैवानों को भाती
अपनी सी लगती ,मगर गैर होती
वैसे तो, नज़रों का तमाशा भी मन की तरह ही
बड़ा विचित्र होता है। मुझे तो लगता है कि
तन, मन और मस्तिष्क तीनों के पास
अपनी - अपनी दृष्टि होती है। वो कहते हैं न
मन की आँखों से देखों , विवेक की दृष्टि से
देखों, भावनाओं में मत बहते रहो ,
स्नेह से देखो नफरत से मत देखो। स्पर्श के
पश्चात दृष्टि से ही शिशु अपनों को पहचानता है।
मृत्यु के पश्चात सबसे पहले
मृत व्यक्ति के नेत्रों की पलकों को ही बंद
किया जाता है। अतः जब तक जिंदगी है,
अपनी नजरों को साफ रखें।
हैं न, इस दुनिया में शायद ही कोई ऐसा हो
जिसे पहली नज़र का प्यार ना हुआ हो,
प्यार दिल करता है पर कहते है-
" सारा कुसूर नज़रो का हैं. "सही भी है ,
इस जीवन का सारा खेल नज़र और नज़रिये
का ही तो होता हैं , किसी को पथ्थर में
भगवान नज़र आते हैं किसी को भगवान
भी पथ्थर के नज़र आते हैं..
का ही तो होता हैं , किसी को पथ्थर में
भगवान नज़र आते हैं किसी को भगवान
भी पथ्थर के नज़र आते हैं..
नज़र जिंदगी की, नजरिया बन गई ,
कहीं चढ़ी परवान, कहीं धूल में मिला गई |
उठी नजरें, दिल में वफ़ा के फूल खिला गई ,
झुकी हुई नजरें , बेरुखी का सबब बन गई |
★★★★★
और चलते-चलते एक गीत
यशोदा दी की पसंद का
एक-एक क़दम बढ़ता हमक़दम
आप सभी के सहयोग से
मुकम्मल हो रहा है।
आज सभी का तहेदिल से
बेहद शुक्रिया।
आज का यह अंक आप सभी को कैसा लगा
आपकी बहुमूल्य की
सदैव प्रतीक्षा रहती है।
हमक़दम के नये विषय के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूलें।
आज के लिए आज्ञा दें-
श्वेता सिन्हा
कहीं चढ़ी परवान, कहीं धूल में मिला गई |
उठी नजरें, दिल में वफ़ा के फूल खिला गई ,
झुकी हुई नजरें , बेरुखी का सबब बन गई |
★★★★★
और चलते-चलते एक गीत
यशोदा दी की पसंद का
एक-एक क़दम बढ़ता हमक़दम
आप सभी के सहयोग से
मुकम्मल हो रहा है।
आज सभी का तहेदिल से
बेहद शुक्रिया।
आज का यह अंक आप सभी को कैसा लगा
आपकी बहुमूल्य की
सदैव प्रतीक्षा रहती है।
हमक़दम के नये विषय के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूलें।
आज के लिए आज्ञा दें-
श्वेता सिन्हा












