स्नेहिल अभिवादन
आज हमारी यशोदा दी का जन्मदिवस है।
जन्मदिनमिदम् अयि प्रिय सखे
शंतनोतु हि सर्वदा मुदम् ।
प्रार्थयामहे भव शतायु
ईश्वर सदा त्वाम् च रक्षतु ।
पुण्य कर्मणा कीर्तिमार्ज
जीवनम् तव भवतु सार्थकम्
शंतनोतु हि सर्वदा मुदम् ।
प्रार्थयामहे भव शतायु
ईश्वर सदा त्वाम् च रक्षतु ।
पुण्य कर्मणा कीर्तिमार्ज
जीवनम् तव भवतु सार्थकम्
प्रिय सखि, यह जन्मदिन आपको शुभता
और प्रसन्नता सदैव के लिए प्रदान करे।

जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ
आपको मेरी प्यारी दी।
आपको मेरी प्यारी दी।
सदैव आरोग्य एवं सुख का आशीष मिलता रहे
प्रभु से यही प्रार्थना है।
प्रभु से यही प्रार्थना है।
सदा मुस्कुराते रहे दी।
★
याद,स्मृति हमारे व्यक्तित्व का प्रमुख हिस्सा है।
मन मस्तिष्क के शून्य को भरने वाले विचारों का
प्रवाह याद पर निर्भर है।
जीवन का प्रत्येक क्षण दूसरे पल में याद बन जाती है।
जीवन चक्र के साथ चलने वाली नियमित घटनाओं में जब कुछ
बातें ,दृश्य हमारे मन की संवेदना को छूते हैंं तो मन,मस्तिष्क उसे
भूल नहीं पाता है और वह एक सुखद,दुखद या और कोई
भावनात्मक स्मृति बन जाती है।
हमक़दम के इस विशेषांक में
हमारे प्रिय रचनाकारों की लेखनी से
निसृत यादों के खट्टे-मीठे
स्वाद का आनंद आप भी लीजिए।
याद,स्मृति हमारे व्यक्तित्व का प्रमुख हिस्सा है।
मन मस्तिष्क के शून्य को भरने वाले विचारों का
प्रवाह याद पर निर्भर है।
जीवन का प्रत्येक क्षण दूसरे पल में याद बन जाती है।
जीवन चक्र के साथ चलने वाली नियमित घटनाओं में जब कुछ
बातें ,दृश्य हमारे मन की संवेदना को छूते हैंं तो मन,मस्तिष्क उसे
भूल नहीं पाता है और वह एक सुखद,दुखद या और कोई
भावनात्मक स्मृति बन जाती है।
हमक़दम के इस विशेषांक में
हमारे प्रिय रचनाकारों की लेखनी से
निसृत यादों के खट्टे-मीठे
स्वाद का आनंद आप भी लीजिए।
★
आदरणीया रेणु जी
किस जन्म किया ये महापाप ?
शीतल होकर भी सहा चिर संताप ;
दूर सभी अपनों से रह -
ढोया सदियों ये कौन शाप ?
नित -नित घटता -बढ़ता रहता
नियति कैसी लिखवाई तूने ?
आदरणीय पुरुषोत्तम जी
घटाओं पे जब बिखरे है गुलाल,
हवाओं में लहराए है जब ये बाल,
फिजाओं के बहके है जब भी चाल,
तब सिंदूरी वो तेरे भाल, मुझे याद आए....
★★★★★★
शावक हिरण पक्षी मदमाए,
कचनार कली के मुखमंडल खिल आए,
बरबस अरण्य में तुम याद आए, याद तुम आए!
★★★★★
आदरणीया आशा सक्सेना
यहां आओ पास
बैठो हम उन
यादों में खो जाएं
वे गीत
गुनगुनाएं जो
कभी गाया
करते थे
★★★★★
एक झूठा दिलासा दिलाता हुआ
साँझ हैं
साँझ को
रात में
रात को
सुबह में
तब्दील हो जाना हैं
★★★★★
आदरणीया कुसुम कोठारी जी
सतरंगी धागों का रेशमी इंद्रधनुषी शामियाना
जिसके तले मस्ती में झुमता एक भोला बचपन ।
सपने थे सुहाने उस परी लोक की सैर के
वो जादुई रंगीन परियां जो डोलती इधर उधर।
मन उडता था आसमानों के पार कहीं दूर
एक झूठा सच, धरती आसमान है मिलते दूर ।
★★★★★
आदरणीया साधना वैद जी
जहाँ हवा के झोंकों में था परस तुम्हारा ,
हर साये में छिपा हुआ था अक्स तुम्हारा ,
पानी पर जब लिख डाले थे नाम तुम्हारे ,
चल मन ले चल मुझे झील के उसी किनारे !
★★★★★★
कुछ लम्हे दिल में बस जाते
तो मिटाएं नहीं मिटते
यादों में उनके चित्र
सदा ज़िंदा ही हैं रहते
बचपन से लेकर जवानी
कुछ यादें नई पुरानी
कुछ धुंधले होते चित्र
कुछ तस्वीरें हैं सुहानी
सब कुछ बदल जाता है
वक़्त की तेज रफ्तार में
रिश्ते भी सूखे पात से
उड़ जाते बहार में
ज़िंदगी का बसंत
फिर लौटकर नहीं आता
ज़िंदगी का भी दामन
छूटता जाता है
ज़िंदगी का भी दामन
छूटता जाता है
★
चाँदनी लहराकर आँचल
उतर आई है ज़मीं परटाँक दिए कुदरत ने तारे
आसमां के चूनर में
चाँद बन बिंदियाँ
चमक उठा अंबर के माथे
★★★★★★
शुभा मेहता
कंकू भरे पैरों से तुम आई थी घर में
पायल की रुनझुन कितनी मनमोहक थी
और तुम्हारे नाजुक से पैर
मैं तो बस एकटक देखता ही रह गया ठगा -सा
कितनी खूबसूरत थी तुम .....!
★★★★★
आदरणीया सुधा देवरानी
कहाँ रह गया नन्हा शशि.......
झुक सुदूर तक झाँक रही ।
नन्हा शशि तो जिद्द कर बैठा.....
मैं आज नहीं घर जाऊँगा ।
याद आती है रवि भैया की......
मैं उनसे यहीं मिल पाऊँगा ।
★★★★★
आदरणीया अनिता सैनी
अनिता सैनी
पुकारती आँखें, कंगनें की झंकार छोड़ गया ,
यादों की गठरी , बिस्तर के सिरहाने छोड़ गया ,
क़दमों के निशां, तड़पती परछाई छोड़ गया,
अनगिनत यादें, आँगन की दहलीज़ पर छोड़ गया |
★★★★★★
आदरणीया अभिलाषा जी

कुछ टूटे दिल की फरियादें हैं।
न वे दिन हैं ,न वे रातें हैं,
अब बेमौसम बरसातें हैं।
जब वे दिन याद आते हैं,
आंखों से आंसू झर जाते हैं।
न हम रोते हैं,न हंसते हैं,
★★★★★
आदरणीया कामिनी जी
वैसे तो ये एक फिल्म का संवाद है परन्तु है सतप्रतिशत सही ,यादें सच मुच ऐसी ही तो होती है और अगर वो यादें बचपन की हो तो " क्या कहने "फिर तो आप उनमे डूबते ही चले जाते हो ,परत- दर -परत खुलती ही जाती हैं ,खुलती ही जाती ,कोई बस नहीं होता उन पर। उन यादों में भी सबसे प्यारी यादें स्कूल के दिनों की होती है। वो शरारते ,वो मस्तियाँ ,वो दोस्तों का साथ ,खेल कूद और वार्षिक उत्सव के दिन ,शिक्षकों के साथ थोड़ी थोड़ी चिढ़न और ढेर सारा सम्मान के साथ प्यार ,हाफ टाइम के बाद क्लास बंक करना और फिर अभिभावकों के पास शिकायत आना फिर उनसे डांट सुन दुबारा ना करने का वादा करना और फिर वही करना ,सब कुछ बड़ी सिद्दत से याद आने लगती हैं। सच बड़ा मज़ा आता था,क्या दौर था वो. ........
★★★★★
आदरणीय शशि जी
यादों की ऐसी पीड़ा भी विचित्र होती है। कोई सांत्वना काम नहीं देती है। भले ही वक्त ने जख्म को भर दिये हो।
फिर भी कभी- कभी खाली पड़ा यह लंचबॉक्स बचपन के उस टिफिन बाक्स की याद दिला देता है , जिसमें किसी माँ का स्नेह था, किसी मासूम का अरमान था और कितने ही मनपसंद व्यंजन थें उस बालक के , जिसे खोने के बाद टिफिन तो अनेक मिले ,परंतु किसमें स्नेह था और किसमें छल, नहीं समझ सका वह पथिक। जब भी कभी क्षुधा की अग्नि भड़की या मन ने ज़िद ही कर दिया कि आज तो यह चाहिए, उसे डांट पड़नी निश्चित है, क्यों कि विवेक उस पर अपना वर्चस्व चाहता है। भले ही जागते रहे वह सारी रात , मनाने फिर कोई नहीं आएगा उसकी इस पुकार पर-
★★★★★
आप सभी के द्वारा सृजित आज का यह अंक आपको कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं
की सदैव प्रतीक्षा रहती है।
हमक़दम के अगले विषय के बारे
में जानने के लिए
कल का अंक देखना न
भूले।
आज के लिए इतना ही।
-श्वेता सिन्हा
★★★★★
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की सदैव प्रतीक्षा रहती है।
हमक़दम के अगले विषय के बारे
में जानने के लिए
कल का अंक देखना न
भूले।
आज के लिए इतना ही।
-श्वेता सिन्हा














