सादर अभिवादन
रविवार का दिन
शनिवार थका देने वाला दिन था
और कल का दिन भी थका देगा
शनिवार थका देने वाला दिन था
और कल का दिन भी थका देगा
बहरहाल...चलना तो है ही
चाहे जितना भी थके हों...
चाहे जितना भी थके हों...
आज फुरसत से पढ़िए...
शायद बस तुम्हे ही नहीं पता
पर ये खबर पूरे शहर में आम हो चुकी है।
हम तुम्हारे इश्क़ में
सरेआम हो चुके हैं।
बस अब इंतज़ार यही है
कि कब पलट के देखोगे मुझे
उस नज़र से !
सज़दे में तेरे हम
सुबह और शाम बैठें हैं।

मानव जीवन में मन और मस्तिष्क का विचित्र द्वंद्व दिखता है। स्मृति जो मस्तिष्क की प्रमुख बौद्धिक क्षमताओं में से एक है, मन उसे कुरेदते रहता है। यादों के घरौंदे को जब भी मन टटोलने लगता है ,अतीत की हर बात ताजी हो जाती है। जो हमें सुख- दुख की अनुभूति करवाती है। हम कहीं भी रहें , यादें हमारी साया बन साथ होती हैं । जीवन में जब कोई संग रहता है । पास या दूर रहता है । विश्वास रहता है कि वह अपना है। मन प्रसन्न रहता है । ऐसे क्षणों में ये यादें मुस्कुराती हैं । इस उम्मीद संग यूँ हसीन ख़्वाब बन जाती हैं -

तू मुझे इतने प्यार से मत देख
तेरी पलकों के नर्म साये में
धूप भी चांदनी सी लगती है
और मुझे कितनी दूर जाना है
रेत है गर्म, पाँव के छाले
यूँ दमकते हैं जैसे अंगारे
धुंधली आंखें भी
पहचान लेती हैं
भदरंग चेहरे
सुना है
इन चेहरों में
मेरा चेहरा भी दिखता है--

मैं मुक्त हूँ, तुम मुक्त हो ..
निकल आओ
इस जन्म-मृत्यु के चक्र से
लगा लो डुबकी प्रयाग में
कर लो संगम स्नान
ले जाओ मेरी यादें
हड्डियों की तरह, राख की तरह
कर दो प्रवाहित
हरिद्वार में

तुम बिन बहार का मौसम उदास है।
आकर तो देखो ये आलम उदास है।।
खिलने से पहले ही मसले हैं गुंचे
मंज़र ये देखकर शबनम उदास है।।
चलते-चलते
उलूक के पुराने पन्ने से
हमारे मन की बात
समय
सभी को
मौका देता है
लेकिन
सबके
बस में नहीं
होता है
उसे भुनाना
अपने लिये
अकेले
साथ लेकर
किसी ना
किसी का
सहारा
कूदते फाँदते
हवा हवा में
हवा जैसे ही
हो जाते हैं
अब बस..
यशोदा
चलते-चलते
उलूक के पुराने पन्ने से
हमारे मन की बात
समय
सभी को
मौका देता है
लेकिन
सबके
बस में नहीं
होता है
उसे भुनाना
अपने लिये
अकेले
साथ लेकर
किसी ना
किसी का
सहारा
कूदते फाँदते
हवा हवा में
हवा जैसे ही
हो जाते हैं
अब बस..
यशोदा

