सादर अभिवादन।
वो
देखो
मीडिया
जिस हाथ
ख़ज़ाने की चाभी
उस पाले दे ताली।
आइये अब आपको आज की ख़ास रचनाओं की ओर ले चलें -
प्रोफ़ेसर गोपेश मोहन जसवाल

मैं अराजकतावादी नहीं हूँ और न ही लोकतंत्र की तुलना में तानाशाही का हिमायती हूँ लेकिन मैं यह मानता हूँ कि लोकतंत्र में शासक की नकेल कसने का अधिकार जनता का होना चाहिए और नीति निर्धारण में शासक की सनक से अधिक महत्व, उस विषय के विशेषज्ञों की राय को दिया जाना चाहिए.

आज भी यहाँ शीर्ष राजनैतिक व्यक्तित्व मसखरी
करते हुए तथ्यों से, आँकड़ों से खिलवाड़ करते हुए मतदाताओं को बेवकूफ बनाने में लगे रहते हैं. इक्कीसवीं सदी का मतदाता, जिसे जागरूक
कहकर पुकारा जाने लगा है, वह भी सहजता से इस मसखरी का शिकार बनता हुआ खुद ही हँसी का
पात्र बन रहा है. जहाँ स्वार्थ भरा एक कदम किसी
दल को आगे खड़ा कर देता है, कहीं एक वस्तु का लालच उस व्यक्ति को सबसे आगे ला देता है, जहाँ जिसे चोर बताते थका नहीं जाता है उसी के हाथों में अपना भविष्य सौंप दिया जाता है.
करते हुए तथ्यों से, आँकड़ों से खिलवाड़ करते हुए मतदाताओं को बेवकूफ बनाने में लगे रहते हैं. इक्कीसवीं सदी का मतदाता, जिसे जागरूक
कहकर पुकारा जाने लगा है, वह भी सहजता से इस मसखरी का शिकार बनता हुआ खुद ही हँसी का
पात्र बन रहा है. जहाँ स्वार्थ भरा एक कदम किसी
दल को आगे खड़ा कर देता है, कहीं एक वस्तु का लालच उस व्यक्ति को सबसे आगे ला देता है, जहाँ जिसे चोर बताते थका नहीं जाता है उसी के हाथों में अपना भविष्य सौंप दिया जाता है.

है मेरा अपना हौसला परवाज़ भी मेरी
मैं एक परिन्दा हूँ मगर पर कटा हुआ
मजबूरियों ने मेरी न छोड़ा मुझे कहीं
मत पूछना ये तुझसे मैं कैसे जुदा हुआ

मलिन हुई मेरी जलधारा,
सबने मुझसे किया किनारा।
मां कहते-कहते नहीं थकते,
मेरी दशा को कभी न तकते।
ऐसा न हो मैं थक जाऊं,
बहते-बहते मैं रूक जाऊं।

ख़्वाबों मेरे, मरो डूबकर
तुम तो धीरे-धीरे,
इस अपात्र को अब तक आख़िर
हर जीवित ठुकराया है।
चलते-चलते "उलूक टाइम्स" की सरल पहेली को सुलझाने का प्रयास कीजिये-

सफेद चूहों
को देखा है
खोदते हुऐ
एक मकान
की जड़ों को
कल तक
आज काले
उधर की तरफ
झाँक रहे हैं
हम-क़दम के उनचासवें अंक का विषय
यहाँ देखिए
यहाँ देखिए
आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार।
शुक्रवारीय प्रस्तुति - आदरणीया श्वेता सिन्हा जी
रवीन्द्र सिंह यादव