दिसम्बर
साल का आखरी महीना
याद कहाँ रहेगा नये साल की प्रतीक्षा में
क्या करूँ मैं जाते पल पर मातम
या
आते पल का स्वागत
“ज़िन्दगी राह गुजर है गुजर ही जायेगी”जाने कब आखरी राह आ जायेगा
ज़िन्दगी में
थम जाये साँसे कही ठहर ना जाये वही
राहो के हर मौसम को जीलो तुम
हर पल को अपना बना लो
जाने कौन सा पल आखरी पल का साक्षी
ज़िन्दगी राह गुजर है गुजर ही जायेगी
खुश है जमाना आज पहली तारीख है

विवशता
हाथों में तो मेंहदी का रंग
चढ़ भी न पाया है
चारों तरफ है जश्न का माहौल
मीठी खीर, सेवइयां, दावतें
पर मेरे दिल के आंगन में तो
विवशता
तटस्थ होना इतना मुश्किल कहाँ...
जब संध्या की अंतिम लाली,
नीलांबर पर बिछ जाएगी,
नभ पर छितरे घनदल के संग,
जब सांध्य रागिनी गाएगी,
मन से कुछ कुछ सुन तो लूँगा,
पर साथ नहीं गा पाऊँगा।
“पागल हो गया है क्या..? ये बहुत है,मैं छोटे लोगों के ज्यादा मुँह नहीं लगता, भाग यहाँ से।”
इंसान की कीमत उस कुत्ते से भी कम थी। उसके स्वाभिमान ने उसे भीख मांगने से इंकार कर दिया। वह विवश हो सौ का नोट मुट्ठी में बांधकर नए रोजगार की तलाश में चल पड़ा। गाँव में रुपए भेजने थे। इतने कम से कैसे होगा! यही सोच अपनी विवशता पर रो पड़ा…।
इंसान की कीमत उस कुत्ते से भी कम थी। उसके स्वाभिमान ने उसे भीख मांगने से इंकार कर दिया। वह विवश हो सौ का नोट मुट्ठी में बांधकर नए रोजगार की तलाश में चल पड़ा। गाँव में रुपए भेजने थे। इतने कम से कैसे होगा! यही सोच अपनी विवशता पर रो पड़ा…।
विवशता
हाथों में तो मेंहदी का रंग
चढ़ भी न पाया है
चारों तरफ है जश्न का माहौल
मीठी खीर, सेवइयां, दावतें
पर मेरे दिल के आंगन में तो
विवशता

><
फिर मिलेंगे...
अब बारी है हम-क़दम की...
अंक सैंतालिसवाँ...
विषयः
आवाज़
प्रेषण की अंतिम तिथि शनिवार 1-12-2018
तथा
प्रकाशन तिथि सोमवार 3-12-2018
प्रेषण की अंतिम तिथि शनिवार 1-12-2018
तथा
प्रकाशन तिथि सोमवार 3-12-2018
आवाज़ दे रहा था आज
बहुत दूर दूर से...
जैसे
कोई पहाड़ियों से
सदियों पुरानी घुटन भरी
आवाज़ आ रही है
और
मैं उसे सुनते हुए दौड़ लगाता
ऐसा लग रहा है कोई अपना सा
जो मुझे चाहते हुए छूट गया था
आज
फिर उसी आवाज़ ने मुझे खींच लिया
नहीं जानता कि क्या रिश्ता रहा होगा
मेरे और उनके बीच कुछ तो था या है
अब
कदम चल पड़े ही है तो उससे मिलना
भरसक कोशिशें रहेंगी मेरी उसे खोजने
उनकी आवाज़ ही है जो मेरी दिशा तय करें
लगता है
अब दिन दूर नहीं है सदियों पुराने
रिश्ते से फिर जुड़ जाऊं मैं और फिर
नया रिश्ता पुन: स्थापित होगा
न बिछड़ने के लिए ।
-पंकज त्रिवेदी
बहुत दूर दूर से...
जैसे
कोई पहाड़ियों से
सदियों पुरानी घुटन भरी
आवाज़ आ रही है
और
मैं उसे सुनते हुए दौड़ लगाता
ऐसा लग रहा है कोई अपना सा
जो मुझे चाहते हुए छूट गया था
आज
फिर उसी आवाज़ ने मुझे खींच लिया
नहीं जानता कि क्या रिश्ता रहा होगा
मेरे और उनके बीच कुछ तो था या है
अब
कदम चल पड़े ही है तो उससे मिलना
भरसक कोशिशें रहेंगी मेरी उसे खोजने
उनकी आवाज़ ही है जो मेरी दिशा तय करें
लगता है
अब दिन दूर नहीं है सदियों पुराने
रिश्ते से फिर जुड़ जाऊं मैं और फिर
नया रिश्ता पुन: स्थापित होगा
न बिछड़ने के लिए ।
-पंकज त्रिवेदी