बदलाव प्रकृति का नियम है। बिना बदलाव के जागृति संभव नहीं। समय ही तय करता है बदलाव सकारात्मक है कि नकारात्मक।
साहित्य जगत में भी बदलाव की सुगबुगाहट महसूस की जा सकती है। देश की समसामयिक समस्याओं पर अपनी पैनी नज़र रखने वाले हमारे बुद्धिजीवी रचनाकार गंभीर सृजनशीलता में जुटे है।
सृजनशीलता कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकती,
फर्क पड़ता है हमारे दृष्टिकोण से।
मतदाता का पक्ष होता है,
वो किसी व्यक्ति को अपना मत देता है।
लेकिन लेखक को निष्पक्ष होकर
विषय पर ही लिखना चाहिए,
व्यक्ति पर नहीं....
सादर अभिवादन....
आदरणीय भाई कुलदीप जी का संदेशा सुबह से ही आ गया
समय है...प्रस्तुति बन जाएगी समय से पहले...
आज एक नयापन...अगले सप्ताह का विषय पहले
यानि की प्रस्तुति नीचे से शुरु.....
आदरणीय भाई कुलदीप जी का संदेशा सुबह से ही आ गया
समय है...प्रस्तुति बन जाएगी समय से पहले...
आज एक नयापन...अगले सप्ताह का विषय पहले
यानि की प्रस्तुति नीचे से शुरु.....
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हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का सैंतीसवाँ क़दम
इस सप्ताह का विषय है
'तृष्णा'
...उदाहरण...
निर्णय-अनिर्णय के दोराहे पर डोलता जीवन,
क्या कुछ पा लूँ, किसी और के बदले में,
क्यूँ खो दूँ कुछ भी, उन अनिश्चितता के बदले में,
भ्रम की इस किश्ती में बस डोलता है जीवन।
-पुरुषोत्तम सिन्हा
फिल्म नयादिन नई रात
संजीवकुमार-जया भादुड़ी
उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है
एक खास बात और आप इस शब्द पर फिल्मी गीत भी दे सकते हैं
अंतिम तिथिः शनिवार 22 सितम्बर 2018
प्रकाशन तिथि 24 सितम्बर 2018 को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें
-*-*-*-*-*-
अब आपको ले चलते हैं रचनाओं की ओर....
"कब तक”.......मीना भारद्वाज
नैन हमारे तकते राहें ,जाने तुम आओगे कब तक ।
जाओ तुम से बात करें क्यों , साथ हमारा दोगे कब तक ।।
ना फरमानी फितरत पर हम , बोलो क्योंकर गौर करेंगे ।
तुम ही कह दो जो कहना है , हम से और लड़ोगे कब तक ।।
संध्या वंदन...नूपुर

सांझ की लौटती धूप
धीरे-धीरे आती है,
सोच में डूबी हौले-हौले
भोले बच्चों जैसी
फूल-पत्तियों को..
सरल सलोने स्वप्नों को
दुलारती है ।
हल्की-सी बयार से
पीठ थपथपाती है ।
बह जाते हैं नीर....पुरुषोत्तम सिन्हा

असह्य हुई, जब भी पीड़,
बंध तोड़ दे, जब मन का धीर,
नैनों से बह जाते हैं नीर,
बिन बोले, सब कुछ कह जाते हैं नीर...
मौसम बदलने लगा.....नीना पॉल

मिले हादसे मुझको हर मोड़ पर
सम्भलने से पहले फिसलने लगा
तेरी याद में खो गया इस क़दर
उम्मीदों का इक दीप जलने लगा
मिलने से पहले जुदाइयों का ग़म
पल-पल दिलों में ही पलने लगा
फिज़ूल टाईम्स.......डॉ. राजीव जोशी
मेरी आँखों ने ऐसे मंजर देखे हैं
भीख माँगते छोटे कोमल कर देखे हैं।
खून पसीने से तन उनके तर देखे हैं।
हवादार बिन दीवारों के घर देखे हैं
पिता सुधा स्रोत....कुसुम कोठरी
देकर मुझ को छांव घनेरी
कहां गये तुम हे तरुवर
अब छांव कहां से पाऊं
देकर मुझको शीतल नीर
कहां गये हे नीर सरोवर
अब अमृत कहां से पाऊं ।
शीर्षक कथा
उलूक उवाच....डॉ. सुशील जोशी

लिखने लिखाने के
विषयों पर क्या
कहा जा सकता है
कुछ भी कभी भी
खाली दिमाग को
फ्यूज होते बल्ब के
जैसे चमका सकता है
कभी घर की एक
बात उठ सकती हैं
कभी पड़ोसी का
पड़ोसी से पंगा
एक मसालेदार
मीनू बना सकता है
इज़ाज़त दें
दिग्विजय
अंतिम तिथिः शनिवार 22 सितम्बर 2018
प्रकाशन तिथि 24 सितम्बर 2018 को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें
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अब आपको ले चलते हैं रचनाओं की ओर....
"कब तक”.......मीना भारद्वाज
नैन हमारे तकते राहें ,जाने तुम आओगे कब तक ।
जाओ तुम से बात करें क्यों , साथ हमारा दोगे कब तक ।।
ना फरमानी फितरत पर हम , बोलो क्योंकर गौर करेंगे ।
तुम ही कह दो जो कहना है , हम से और लड़ोगे कब तक ।।
संध्या वंदन...नूपुर

सांझ की लौटती धूप
धीरे-धीरे आती है,
सोच में डूबी हौले-हौले
भोले बच्चों जैसी
फूल-पत्तियों को..
सरल सलोने स्वप्नों को
दुलारती है ।
हल्की-सी बयार से
पीठ थपथपाती है ।
बह जाते हैं नीर....पुरुषोत्तम सिन्हा

असह्य हुई, जब भी पीड़,
बंध तोड़ दे, जब मन का धीर,
नैनों से बह जाते हैं नीर,
बिन बोले, सब कुछ कह जाते हैं नीर...
मौसम बदलने लगा.....नीना पॉल

मिले हादसे मुझको हर मोड़ पर
सम्भलने से पहले फिसलने लगा
तेरी याद में खो गया इस क़दर
उम्मीदों का इक दीप जलने लगा
मिलने से पहले जुदाइयों का ग़म
पल-पल दिलों में ही पलने लगा
फिज़ूल टाईम्स.......डॉ. राजीव जोशी
मेरी आँखों ने ऐसे मंजर देखे हैं
भीख माँगते छोटे कोमल कर देखे हैं।
खून पसीने से तन उनके तर देखे हैं।
हवादार बिन दीवारों के घर देखे हैं
पिता सुधा स्रोत....कुसुम कोठरी
देकर मुझ को छांव घनेरी
कहां गये तुम हे तरुवर
अब छांव कहां से पाऊं
देकर मुझको शीतल नीर
कहां गये हे नीर सरोवर
अब अमृत कहां से पाऊं ।
शीर्षक कथा
उलूक उवाच....डॉ. सुशील जोशी

लिखने लिखाने के
विषयों पर क्या
कहा जा सकता है
कुछ भी कभी भी
खाली दिमाग को
फ्यूज होते बल्ब के
जैसे चमका सकता है
कभी घर की एक
बात उठ सकती हैं
कभी पड़ोसी का
पड़ोसी से पंगा
एक मसालेदार
मीनू बना सकता है
इज़ाज़त दें
दिग्विजय


