निवेदन।


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मंगलवार, 11 सितंबर 2018

1152....चला कबूतर का जोड़ा, कबूतर पकड़ना, कबूतर उड़ाना सिखाने,

सादर अभिवादन,
भाई कुलदीप आज शहर में नहीं हैं
तीज-त्योहार का समय है.....
वे भी अपनी बहनों को लिवाने गए हैं...
आज पढ़िए हमारी...या ये कहिए...मिली-जुली पसंद....

नव प्रवेश
निवेदिता दिनकर जी की कलम से प्रसवित....

यह जो 
तुम 
मुझे 
छंद बंद 
में बाँधते हो ... 
या रस, 
अलंकार में डूबोते हो 

डॉ. कौशलेन्द्रम की कलम से....
चिंतनशून्य हुए जब-जब तुम
तर्कशून्य हुए तब-तब तुम   
रीति उपेक्षित
सागर मंथन की  
नहीं वासुकी नहीं मंदराचल
चहुँ ओर व्याप्त तुमुल कोलाहल

हो रहा क्रंदन ही क्रंदन ।




ज़फ़र की कलम से

ज़िन्दगी आग हैं पानी डालते रहिये 
हर मोड़ पर दिल का सिक्का उछालते रहिये, 

दिखने लगी हैं नमी,हसींन आँखों में 
अल्लाह उसका  काजल सँभालते रहिये, 

पुरुषोत्तम सिन्हा जी की कलम से...

थमती ही नहीं, बूँदों से लदी ये घन,
बरसकर टटोलती है, रोज ही ये मेरा मन,
पूछती है कुछ भी, रोककर मुझे...

थमती ही नहीं, रिमझिम बारिश की बूँदें.....



नूपूर जी कहती है....

कुछ भी तो नहीं था,
तन के नाम पर। 
पर मन भर 
असीम आकाश था। 
जिसमें जीवट नाम का 
प्रखर सूर्य चमकता था। 

प्रीति सुराना जी की कलम से निकली पीड़ा..
हाँ! 
ओढ़े रखती हूँ 
दुख का दुशाला 
और बना रखा है 
पीड़ा का परकोटा 
अपने आसपास,... 



उलूक सर के पन्ने से....

सारे के सारे 
सोये कबूतरों को 
कबूतर पकड़ने वाले 
जाबाँज बाज बनायेगा 

लिखते लिखाते 
पढ़ते पढ़ाते 
किसी एक दिन 

‘उलूक’ भी 
संगत में 
कबूतरों की 
कबूतरबाजी 
थोड़ा बहुत तो 
सीख ही ले जायेगा 

एक अंतिम जवाबदारी
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का छत्तीसवाँ क़दम 
इस सप्ताह का विषय है
क्षितिज


उदाहरण..
आओ 
चलो हम भी
क्षितिज के उस पार चले

जहाँ 
सारे बन्धन तोड
धरती और गगन मिले

जहाँ 
पर हो
खुशी से भरे बादल

और 
न हो कोई
दुनियादारी की हलचल

बेफिक्र 
जिन्दगी जहाँ
खेले बचपन सी सुहानी

जहाँ 
पर नही हो
खोखली बाते जुबानी

खुले 
आकाश मे
पतन्ग की भान्ति

उडे 
और लाएँ 
एक नई क्रान्ति

जो मेहनत
को बनाएँ

सफलता की सीढी
आशा सच

उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है
अंतिम तिथिः शनिवार 15 सितम्बर 2018  
प्रकाशन तिथि 17 सितम्बर 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 

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