सबसे पहले ये गीत सुनिए
सुन मितवा..मितवा
तुझको क्या डर है रे
सुन मितवा..मितवा
तुझको क्या डर है रे
है विकल हृदय की चाह मेरी
तुम देख लो दृष्टि भर मुझको
भ्रम हो तो फिर हो क्यूँ धुक-धुक?
बींधे दृग वृष्टि कर मुझको
तुम देह नहीं सुरभित मन हो
जग बंधन को जो माने न
मृग मन का चंचल समझे न
तू समुझा जा मितवा मेरे
-श्वेता सिन्हा
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मितवा यानि वह साथी, सखा,मित्र,बंधु और प्रियतम की
तरह हमारा संबल बने।
हमक़दम के विषय पर हमारे रचनाकारों ने सदैव की भाँति
बेहद उम्दा रचनाएँ लिखीं है।
आइये आप भी इन रचनाओं का आस्वादन करिए।
आदरणीय आमित निश्छल की प्रयोगात्मक रचना
राधा रानी...
फिर बोलो मितवा मेरे, क्या बात हुई कह, ना
नींद-नींद में बैर हुई, या गैर हुई रैना
कान्हा.....
बंसी बजी नींद की गहरी, सोये थे नैना
सपनों में हम दोनों ही जागे सारी रैना
★★★★★
आदरणीया मीना शर्मा जी की हृदयस्पर्शी कृति
मितवा मेरे, मनमीत बने
तुम मनवीणा के गीत बने
निर्जन में कोकिल कूजन सा
वीराने का संगीत बने !
पदचाप तुम्हारी सुनती हूँ,
अब भी मेरे उर आँगन में !!!
क्यों बाँधा ऐसे बंधन में ?
★★★★★
नहीं आओगे तो
तुम खत लिख दो
इंतजार खत्म हो
बस अब तो
जिंदगी तुम बिन
वीरान है मितवा
कब आओगे तुम
खत लिख दो मितवा
★★★★★
मै तार बनूं
तुम मेरा जीवन
मै संगीत बनूं
तू मेरी मितवा
मै तेरा मीत बनूं
प्यार से जहां में तेरे
मै अपनी प्रीत भरूं
★★★★★
★★★★★
आदरणीय पंकज प्रियम जी की रचना
मितवा मुझे तो जाना होगा
दिल को तो समझाना होगा
वतन का साथ निभाने को
मुझे सरहद पे जाना होगा।
मितवा....।
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मैं थाम तुम्हारा हाथ
छोड़ कर सबका साथ
चली आई ओ मितवा
निभाना प्रीत की रीत
सदा बन मेरे मनमीत
मैं गाऊं प्रेम के गीत
★★★
ओ मितवा
चलो चलते हैं
जीते हैं कुछ पल
जिंदगी के
सुनते हैं मन की आवाज
छेड़ प्रेम का साज
मिले सपनों को परवाज
जी ले अपना आज
★★★
मितवा मेरे
प्रकृति से यही तो सीखा है मैंने
हर मौसम अपना पूरा जलवा दिखा
एक दिन उतार पर
अवश्यमेव आता ही है
और अंतत: परास्त हो कहीं
पार्श्व में विलीन हो जाता है
अगले बरस एक बार फिर
उसी जोश खरोश के साथ
लौट कर आने के लिए !
★★★★★
हे मितवा मनमीत मेरे
हर गीत तुम्हारे नाम लिखूंगी
शब्दों में जो बंध ना पाये
ऐसे कुछ अरमान लिखूंगी
प्रीत के पथ के हम दो राही
तेरा नेह बनाकर स्याही
अपने अनुरागी जीवन में
तुझको अपनी जान लिखूंगी
★★★★★
मैं धरती
तुम आकाश
कैसे हो दूरी पार
कैसे मिलन हो पाए |
हम दौनों नदिया के किनारे
चलते हैं साथ साथ
पर कभी मिल नहीं पाते
★★★★
आदरणीया पूजा पूजा जी की सुंदर रचना
पथरीले रास्ते खुशबुओं से भर गए
रीते नैनों के दामन सपनों से संवर गए
होठों पर मुस्कुराहटें खिलखिलाने लगीं
हँसी भी अब थोड़ा चुलबुलाने लगी
ना जाने कब तुम जहाँ हो गए
जिस पल तुम मीत से मितवा हुए
हम खुद ही खुद से अगवा हो गए
★★★★★
आदरणीया कुसुम जी की रचना
मितवा
ना जाने कब आये मोरे मितवा
ना खबरिया , संदेशा ना खतवा
भरी भरी बहे नदिया बहु जोर
हियरा हमार कांपे चले न जोर
★★★★★
आदरणीया कुसुम जी की रचना
मितवा
ना जाने कब आये मोरे मितवा
ना खबरिया , संदेशा ना खतवा
भरी भरी बहे नदिया बहु जोर
हियरा हमार कांपे चले न जोर
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और चलते-चलते पढ़िये
आदरणीया रेणु जी की बेहद भावपूर्ण रचना
अनुराग के बंधन में सिमटी मैं
यूँ ही पल पल जीना चाहूं
सपनों की डगर पे साथी
संग तुम्हारे चलना चाहूं
तुम्हारे प्यार से हुए है जगमग -
ये नैनों के दीप मेरे !!
नाम तुम्हारे हर शब्द मेरा
तुम्हे समर्पित सब गीत मेरे !!!!!!!!!
★★★
रेणु जी की पसंद का बेहद सुंदर गीत सुनिये
सुन मेरे बन्धु रे !सुन मेरे मितवा !
सुन मेरे साथी रे !!!!!
होता तू पीपल- मैं होती अमरलता तेरी -
तेरे गले माला बनके पडी मुस्काती रे !!
सुन मेरे साथी रे !!!!!
जिया कहे तू सागर मैं होती तेरी नदिया
लहर बहर करती- अपने पिया से मिल जाती रे
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आपके द्वारा सृजित यह अंक आपको कैसा लगा कृपया
अपनी बहूमूल्य प्रतिक्रिया के द्वारा अवगत करवाये
आपके बहुमूल्य सहयोग से हमक़दम का यह सफ़र जारी है
आप सभी का हार्दिक आभार।
अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।
अगले सोमवार को फिर उपस्थित रहूँगी आपकी रचनाओं के साथ












