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शुक्रवार, 29 जून 2018

1078.......पेड़ों का मौन रुदन सुनो

पेड़ों का मौन रुदन सुनो
अनसुना करो न तुम साथी
हरियाली खो जायेगी
तो गीत भी होंगे गुम साथी
#श्वेता
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देश की राजधानी दिल्ली स्थित सरोजनी नगर मेंआवासीय 
परिसर निर्माण के लिए 17,000 पेड़ काटने की योजना है। स्थानीय 
लोगों के विरोध के बाद 4 जुलाई तक अदालत ने पेड़ काटने की 
प्रक्रिया पर रोक लगा दी है।
चिंता का विषय यह है कि राजधानी पहले ही प्रदूषण के आपात 
स्थिति से ग्रसित है, ज़हरीली हो चुकी हवा का मानक स्तर बेहद 
गंभीर है ऐसे में हज़ारों पेड़ोंं का कटना कितना घातक हो सकता है 
आप ख़ुद ही निर्णय कीजिए।

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सादर नमस्कार

आइये आज की रचनाओं के संसार में-

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आदरणीय विश्वमोहन जी  की कलम से-
My photo
पारण
नीरसता की झुर्रियों और
विरसता के घोसलों से
भरे चेहरों से अब कामनाओं
के सेहरे उजड़ने लगे हैं.
थकावट की सिलवटों से सिले
मुख सूख रहे हैं और
तुमको मुझसे उबास आने लगी ?

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आदरणीया शैल सिंह की कलम से
समंदर पर कविता

तेरी गहराईयों में इतनी मूक ख़ामोशी क्यों

तेरे उत्ताल तरंगों से जी है बहलता सभी का 

तूं तो खुद के प्यास की तलब बुझा पाता नहीं

पर शेर,ग़ज़ल,कविता तुझीसे संवरता सभी का।

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आदरणीया मीना भारद्वाज जी की लेखनी से
मुक्तक
मेरी फ़ोटो

जीने का शऊर आ गया तेरे बिन
तूने भी सीख लिया जीना  मेरे बिन
जरूरी है आनी दुनियादारी भी
मुश्किल है जिन्दगी काटनी इस के बिन

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आदरणीया कुसुम जी की लेखनी से


मधुर मधुर वीणा बजती

ज्यों आत्मा तक रस भरती

सारंगी की पंचम  लहरी

आके हिया के पास ठहरी
सितार के सातों तार बजे
ज्यों स्वर लहरी अविराम चले।

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आदरणीय अमित निश्छल जी की कलम से
अमर जवान

अराति सैन्य श्रेणी को नित, काट रहूँ मैं सबसे आगे;

सहस सिरों को काट अघी के, बढ़ूँ अनवरत निर्भय मागे।

है वीर भुजा में लहू नहीं, हमने अंगारे पाले हैं;

निश्चिंत रहो तुम चमन-वतन, ये शोले शूरों वाले हैं।
नाम छोटा, काम भी छोटा, सेवक बन दिन रात भुलाऊँ;
दुश्मन भी गर माफी माँगे, उठकर उसको गले लगाऊँ।
शिलालेख अपना भी हो तो, उसपर नाम शहीद लिखाऊँ

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आदरणीया रेणु जी की लेखनी से

 मोको कहाँ ढूंढे  से बंदे मैं तो तेरे पास में -
ना तीर्थ में ना मूर्त में ना एकांत निवास में -

ना मंदिर में ना मस्जिद में  ना काबे कैलाश में | |

ना मैं जप में ना मैं  तप में  ना  व्रत उपवास में |
ना मैं क्रिया -क्रम में रहता - ना ही योग सन्यास में | | 
न ही  प्राण  में  -ना पिंड में - ना ब्रह्मांड  आकाश में |
ना मैं  त्रिकुटी  भवर में , सब स्वांसों के साँस में | | 
खोजी होए  तुरत मिल जाऊं - एक पल की तलाश में -
 कहे कबीर सुनो भाई साधो  - मैं तो हूँ विश्वास में !!!!!
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हूं मैं एक अबूझ पहेली....अभिलाषा चौहान 
भीड़ से घिरी लेकिन 
बिल्कुल अकेली हूं मैं 
हां, एक अबूझ पहेली हूं मैं 
कहने को सब अपने मेरे 
रहे सदा मुझको हैं घेरे 
पर समझे कोई न मन मेरा 
खामोशियो ने मुझको घेरा 
ढूंढूं मैं अपना स्थान... 
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और चलते-चलते 
आदरणीया पम्मी जी की लेखनी से
प्रेमचंद जी ने समाज और राजनीति के आपसी संबंधों के 
बारे में कहा “जिस भाषा के साहित्य का साहित्य अच्छा होगा, 
उसका समाज भी अच्छा होगा। समाज के अच्छे होने पर स्वभावतः राजनीति भी अच्छी होगी। यह तीनों साथ - साथ चलने वाली 
चीजें हैं । इन तीनों का उद्देश्य ही जो  एक है। यथार्थ में समाज, साहित्य और राजनीति का मिलन बिन्दु है।“

छपते-छपते
कबीर दौड़ रहा है, 
सूर को सावधान रहने के लिये कहने के लिये ढूँढ रहा है, 
तुलसी अदालत में फंसा हुआ है.




***
इस सप्ताह के हमक़दम के विषय
की जानकारी के लिए

आज के लिए बस इतना ही
कल आ रही हैं आदरणीया विभा दी।
अगले शुक्रवार फिर मिलेंगे नयी रचनाओं के साथ
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