बीज के आवरण को भेद कर जो नन्हा ,
नरम कोंपल निकलता है
उसे अंकुर कहते हैं।
नरम कोंपल निकलता है
उसे अंकुर कहते हैं।
बेहद कोमल भाव जागते है अंकुर शब्द के उच्चारण से। अंकुर जीवन
का प्रतीक है, एक आशा को पल्लवित करती है। ठूँठ, बंजर और
निराशा की कठोर धरती को फोड़ कर निकले अँखुए हृदय में सकारात्मकता का संचरण करते हैं।
का प्रतीक है, एक आशा को पल्लवित करती है। ठूँठ, बंजर और
निराशा की कठोर धरती को फोड़ कर निकले अँखुए हृदय में सकारात्मकता का संचरण करते हैं।
नारी के कोख के अंकुर से मानव का जन्म होता है।
धरा पर अंकुर फूटे तो प्रकृति का श्रृंगार होता है।
विचारों का अंकुर फूटे तो आविष्कार होता है।
अंकुर सृष्टि के निर्बाध संचालन का द्योतक है। जब तक अंकुर
फूटते रहेंगे धरा पर जीवन का कोलाहल हमसब सुनते रहेंगे।
फूटते रहेंगे धरा पर जीवन का कोलाहल हमसब सुनते रहेंगे।
अब चलिए आप सबों के विचारों के अंकुर से प्रस्फुटित आज के विषय
पर लिखी गयी रचनाओं की ओर।
पर लिखी गयी रचनाओं की ओर।
कुछ नयी और कुछ पुरानी रचनाओं के मिश्रण से बना आज का यह विशेषांक आप पाठकगण को समर्पित करते हैं......
सादर नमस्कार
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सच ही है धरा को चीर अंकुर
जब पाता उत्थान है
तभी मिलता मानव को
जीवन का वरदान
सींचता वारिध उस को
कितने प्यार से
पोषती वसुंधरा , करती
उसका श्रृंगार है
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भर लूं उन को बस मुठ्ठी मे
उन्हें छींट दूं आगंन मे
आंख के आंसू जब
बारिश बन कर बरसेंगे
नव खुशियों के अंकुर फूटेगें
प्यार की कलियाँ चटकेगी
रंग बिरंगे फूल खिलेंगे
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इक बीज के हृदयतल में
बसता है इक छोटा अंकुर
अलसाया सा....
सोता हुआ.....
उठो ,उठो ..
रवि नें आकर चुपके से कहा
उठो ,उठो ....
वर्षा की बूँदों नें
आवाज़ लगाई ....
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संग हंसने संग रोने के वादे,
एक दूसरे का सुख दुख बांटने का जज़्बा,
एक दूसरे के कदम से कदम मिला कर चलने के कसमे,
एक दूसरे के लिए खुद को भुला देना
एक दूसरे में ही खुद को पा जाना,
होंगे न जाने कितने अंतर्मन के सागर की लहरों के झकोरे,
न जाने कितने उठते दबते ज्वर
तब जाकर हृदय में पनपा होगा
अंकुर प्रेम का....
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यूँ हीं नहींप्रस्फुटित होता है बीज अंकुर बनकर,
रहना पड़ता है धुप्प अंधेरों में जमीन के अंदर।
नवसृजन करता,जीवन का वही आधार बनता
होता है अंकुरित वो स्वयं का अस्तित्व खो कर।
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गहरे बोए बीज प्रेम के
सींचा प्यार के जल से
मुस्कान की खाद डाली
इंतज़ार किया शिद्दत से
बहुत इंतज़ार के बाद
दिखे अंकुरित होते चार पांच
हुई अपार प्रसन्नता देख उन्हें
देखरेख और बढाई
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तो समझा
अब तक क्या जिया।
खुरदुरेपन में फूटे
नवीन अंकुर
निकल आईं शाखायें
अब मैं हरा भरा हूँ
हाँ एक ही जगह खड़ा हूँ,
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पर पत्थर बनना आसान न था!
बची रह ही गयी थी नमी कंही
और शायद मिट्टी भी........
उड़ आए बीज कंही से;
कि लाख कोशिशों के बावजूद
उग ही आये कुछ अंकुर
बातें करने लगे हवा से
नाता जोड़ लिया इस धरा से,
गगन से और इंसानों से.......
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जुड़े हुए होते हैं जिनसे
गहरे रिश्ते जीवन के
टूटी एक कड़ी कोई तो
रिश्तों से प्यार फिसल जाते हैं
स्वार्थ का बीज अंकुर होते ही
काली परछाई घिर आती
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मिट्टी से सोच
आकाश की कल्पना
वक़्त से लेकर
हवा, धूप और बरसात
उग आया है
शब्दों का अंकुर
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कोमल पँखुरिया खुल के
खिल कर स्पंदन करें नित्य
हर मन अंकुर शाश्वत सा हो
हर ओर दिखे आता बसंत !
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चंचल दामिनी दमके,
घन की स्वामिनी चमके,
धरती पर कोप करे,
रुष्ट हो डराए....
गरजत पुनि मेह-मेह
बरसत ज्यों नेह-नेह
अवनी की गोद भरी
अंकुर उग आए....
मत डालो खलल मेरी नींदों में
अभी ही तो मैंने सपनों के बीज बोए हैं
अभी ही तो ख्वाबों के अंकुर फूटे हैं
उम्मीदों की नर्म गीली मिट्टी पर
अभी ही तो हसरतों की कलियां गुनगुनाई हैं
तितलियाँ खुशियों को अभी उड़ने तो दो
रंगत उपवन की निखर जाने दो
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और चलते-चलते आदरणीय सुशील सर
के बारे में नहीं
सोचना होता है
अंकुर फूटने का
भी किसी को
इंतजार नहीं
होता है ना ही
जरूरत होती है
सोच लेने में
कोई हर्ज नहीं है
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आप के द्वारा सृजित हमक़दम का यह अंक आपको कैसा लगा कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के
द्वारा अवश्य अवगत करवाइयेगा।
हमक़दम का अगला विषय जानने के लिए
कल का अंक देखना न भूले।
अगले सोमवार फिर मिलेंगे नये विषय पर
आपके द्वारा सृजित रचनाओं के साथ।
आज के लिए बस इतना ही
-श्वेता सिन्हा














