सीप एक समुद्री जीव होता है जिसका शरीर दो पार्श्व,
कठोर कपाटों से बंद रहता है
और जो मध्य पृष्ठ पर एक दूसरे से जुड़े रहते है।
समुद्री जीव "सीप" एकमात्र ऐसा प्राणी है जो अपने शरीर को कष्ट देने वाले हानिकारक तत्त्वों को मोती में बदल देता है।
जन्तु विज्ञान के वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सीप न हो तो
पृथ्वी पर स्वच्छ और मीठा पानी मिलना मुश्किल है।
सीप की ऐसी विशेषता होती है कि वह प्रकृति से एक बार आहार ग्रहण करने के बाद लगभग 96 ली. पानी कीटाणुमुक्त करके शुद्ध कर देता है। बचे हुये अपशिष्ट, कण या मृतकोशिकाओं को मोतियों में
बदलने का अद्भुत गुण बस सीप में ही है।
ऐसा माना जाता है कि स्वाति नक्षत्र में वर्षा की जो बूँद सीपी मे गिरती है वह कालान्तर में मोतियों का रुप ग्रहण करती है।
कठोर कपाटों से बंद रहता है
और जो मध्य पृष्ठ पर एक दूसरे से जुड़े रहते है।
समुद्री जीव "सीप" एकमात्र ऐसा प्राणी है जो अपने शरीर को कष्ट देने वाले हानिकारक तत्त्वों को मोती में बदल देता है।
जन्तु विज्ञान के वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सीप न हो तो
पृथ्वी पर स्वच्छ और मीठा पानी मिलना मुश्किल है।
सीप की ऐसी विशेषता होती है कि वह प्रकृति से एक बार आहार ग्रहण करने के बाद लगभग 96 ली. पानी कीटाणुमुक्त करके शुद्ध कर देता है। बचे हुये अपशिष्ट, कण या मृतकोशिकाओं को मोतियों में
बदलने का अद्भुत गुण बस सीप में ही है।
ऐसा माना जाता है कि स्वाति नक्षत्र में वर्षा की जो बूँद सीपी मे गिरती है वह कालान्तर में मोतियों का रुप ग्रहण करती है।
इस सप्ताह शायद हमारे प्रिय रचनाकारों की व्यस्तता अधिक रही होगी इसलिए हमारे रखे गये विषय "सीप"
पर रचनाएँ कम आईं हैं
उम्मीद करते है आने वाले सप्ताह के विषय पर आप सभी का प्रेम हमारे सोमवारीय विशेषांक को मिल पायेगा।
चलिए अब आपकी रचनाओं के सुंदर संसार में-
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आदरणीया आँचल पाण्डेय जी की रचना
मैं उतर गयी जल के भूतल पे
फ़िर वही कहीं से परियाँ आयी
साथ अपने एक एक सीप सब लायी
देखकर आँखें अचरज में थी
जलपरियों के मैं बीच खड़ी थीं
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आदरणीया अपर्णा जी
तुम्हारी सीप सी आंखें
और ये अश्क के मोती,
बाख़बर हैं इश्क़ की रवायत से...
तलब थी एक अनछुए पल की
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आदरणीया कुसुम दी की रचना
महावीर और बुद्ध की तरह
वो चली निरन्तर
वीतरागी सी
राह मे रोका एक सीप ने
उस के अंदर झिलमिलाता
एक मोती बोला
एकाकी हो कितनी म्लान हो,
कुछ देर और
बादलों के आलंबन मे रहती
मेरी तरह स्वाती नक्षत्र में
बरसती तो देखो
मोती बन जाती
बूंद ठिठकी
फिर लूं आलंबन सीप का !!
नही मुझे अपना अस्तित्व चाहिये
सिद्ध हो विलय हो जाऊं एक तेज में।
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आदरणीया साधना वैद जी
सीप ने भी कंकड़ को
हृदय से लगाया
उसके चारों ओर अपने
अंतर का दिव्य स्त्राव लपेट
उसे एक सामान्य कुरूप कंकड़ से
अनुपम अपरूप
बहुमूल्य मोती बनाया !
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आदरणीया आशा सक्सेना जी
सच्चे मोतियों को परखा
उनकी आव का अनुभव किया
उन्हें यथोचित स्थान दे कर
मनोबल मेरा बढ़ाया
शब्दों में संचित भावनाएं
दौनों के बीच सेतु बन गईं
अपने अनुभव बांटने के लिए
शब्दों की धरोहर मिल गई |
🔷💠🔷
आज का हम-क़दम का यह विचारों का विस्तृत आकाश लिए
मुस्कुराता हुआ अंक आपको कैसा लगा? जरुर बताइयेगा।
मुस्कुराता हुआ अंक आपको कैसा लगा? जरुर बताइयेगा।
नये विषय के लिए कल का अंक देखना न भूले जो
आदरणीय कुलदीप जी लेकर आयेंगे।
आदरणीय कुलदीप जी लेकर आयेंगे।
सादर नमस्कार



