।प्रातः वंदन ।।
विश्व परिवार दिवस (१५मई ) की हार्दिक शुभकामनाएँ । वक्त की जरूरत के
मुताबिक हम भले ही एकल परिवार की ओर बढ़ रहे हैं रहे हैं पर संयुक्त परिवार के
खूबसूरती से इनकार नहीं किया जा सकता जहां पीढ़ियों के बीच सामंजस्य बनाने में
कई पड़ावों से गुजरना पड़ता है क्योंकि परिवार ही पूंजी है.. इसलिए चलो..
अब हम अपनी -अपनी हद लिखते हैं
रिश्तों को महफूज रखतें हैं
इन्हीं खूबसूरत विचारों के साथ अब हम लिंकों पर गौर फ़रमाते हैं..✍
आदरणीया रेणु व्यास जी की रचना..
कल रात एक सांवली सी लड़की बहुत याद आई
मैं चुपके से फिर एक बार अपने बचपन में लौट आयी. .
मिली मुझे एक बार फिर वो मासूम सी परी
थोड़ी शरारती , थोड़ी नादान , पर बातों की खरी
बुनती थी सुन्दर सपने , रहती खयालों में घिरी..
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ब्लॉग लालित्यम् से
कहाँ शक्कर और कहाँ गुड़ !
एक रिफ़ाइंड, सुन्दर, खिलखिलाकर बिखर-बिखर जाती, नवयौवना , देखने में ही संभ्रान्त,
एक रिफ़ाइंड, सुन्दर, खिलखिलाकर बिखर-बिखर जाती, नवयौवना , देखने में ही संभ्रान्त,
सजीली शक्कर और कहाँ गाँठ-गठीला, पुटलिया सा भेली बना गँवार अक्खड़ ठस जैसा गुड़?
पर क्या किया जाय पहले
उन्हीं बुढ़ऊ को याद करते हैं लोग.
इस चिपकू बूढ़-पुरान के चक्कर में, चंचला ..
ब्लॉग उलूक टाइम्स से..
होता है
एक नहीं
कई बार
होता है
कुछ पर
लिखने
के लिये
कुछ भी
नहीं होता है
तो मत लिख
लिखने की
बीमारी का
इलाज सुना..
आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी की कलम से..।
समाचार आया है-
"इज़राइली राजकीय भोज में जापानी प्रधानमंत्री को
जूते में परोसी मिठाई!"
ग़ज़ब है जूते को
टेबल पर सजाने की ढिठाई !!
दम्भ और आक्रामकता में डूबा
एक अहंकारी देश
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ब्लॉग कबीरा खडा़ बाज़ार में से ..
नमस् से बना है नमाज़ जबकि वन्दे का भी वही अर्थ है जो नमस् का है। लेकिन वन्दे -मातरम कहने से हमारे माशूक को परहेज़ है ..
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मैंने देखा है,
कई बार देखा है,
उम्र को छला जाते हुए,
बुझते हुए चराग में रौशनी बढ़ते हुए,
बूढ़ी आँखों में बचपन को उगते हुए
मैंने देखा है...
कई बार देखा है,
मैंने देखा है
बूँद को बादल बनते हुए,
गाते हुए लोरी बच्चे को..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह..✍




