दिन रविवार
सादर अभिवादन
सादर अभिवादन
क्या आपको पता है
रविवार की छुट्टी का काला सच
रविवार की छुट्टी का काला सच
चलिए चलते हैं आज की रचनाओँ की ओर...

मैं तो चिरइया बाबुल तोरे आँगन की,
नान्हीं उमर खुरच खुरच दाना निकालू ,
भुखिया सतावे बापू ,होठवा पे संतोष मुस्काये,
अंगना में टुकुर - टुकुर देखे पाखी-
थाली क चउरा ,मनवा विकल होई जाये,
हर शाम सूरज की
बोझिल फीकी बाहें
स्याह क्षितिज में
समाने के पहले
छूकर मेरी आँखों को
उदास कर जाती है
एहसानफ़रमोश होते हैं लोग,
धोखेबाज़ भी,
ज़रूरत पड़े,
तो किसी की भी पीठ में
छुरा भोंक सकते हैं.
बेहुनर हाथ किसी काबिल बना दूँ तो चलूँ
आस की डोर हथेली में थमा दूँ तो चलूँ
मोड़ दर मोड़ मिलेंगे राह भूले चेहरे
एक मुस्कान निगाहों में बसा लूँ तो चलूँ

जिंदगी के हालात कुछ ऐसे हुए
शीशे के महल बनाए हमने
दिल नाजुक मोम सा है हमारा
तेज़ रोशनी से छिपाया हमने

मैं बार-बार मुस्कुरा उठता हूँ
तुम्हारे होंठो के बीच,
बेवज़ह निकल जाता हूँ तुम्हारी आह में,
जब भी उठाती हो कलम
लिख जाता हूँ तुम्हारे हर हर्फ़ में,
कहती हो दूर रहो मुझसे....

अब आप कहेंगे
नदी में किसने
आग लगाई
मछलियाँ पेड़ पर
किसने चढ़ाई
अरे इतना भी नहीं
अगर जानते हो
तो इधर उधर
लिखे लिखाये को
छलनी हाथ में
लेकर क्यों छानते हो
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बताइएगा हमें...
क्या है रविवार की छुट्टी का काला सच
आज्ञा दें
दिग्विजय
क्या है रविवार की छुट्टी का काला सच
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दिग्विजय