नए वर्ष के आगमन पर हर साल जो ठण्ड पड़ती है उसका अंदाज़ा दिल्ली वालों को तो बखूबी है । देश के बहुत से भागों में कम ठण्ड हो सकती है , लेकिन यदि ऐसी सर्दी में बच्चों के मन में गरीबों के लिए कुछ करने संकल्प हो तो क्या बात .... इसी को उजागर किया है अनिता सुधीर जी ने अपनी लघु कथा में ....
शीत लहर का प्रकोप चरम सीमा पर था । शासन के आदेश अनुसार सभी विद्यालय बंद हो गये थे ।बच्चों की छुट्टियाँ थी इतनी ठंड में सभी काम निबटा लेकर नीता रज़ाई में घुसी ही थी ,कि दरवाज़े की घंटी बजी ।
इतनी ठंड में कौन आया ,नीता बड़बड़ाते हुए उठी ।
ठंड में हम गर्मियों की बात करें तो खुद ही गर्मी का आभास हो जाता है ,ऊपर से ढपली की थाप और झुनझुने की आवाज़ क्या गणित प्रस्तुत करती है इसे बता रही हैं कविता रावत जी अपनी इस कहानी में ---
गर्मियों के दिन थे। सुबह-सुबह सेठ जी अपने बगीचे में घूमते-घामते ताजी-ताजी हवा का आनन्द उठा रहा थे। फल-फूलों से भरा बगीचा माली की मेहनत की रंगत बयां कर रहा था। हवा में फूलों की भीनी-भीनी खुशबू बह रही थी। सेठ जी फल-फूलों का बारीकी से निरीक्षण कर रहे थे। विभिन्न प्रकार के पौधे और उन पर लदे फूल, पत्तियों की ओर उनका ध्यान आकृष्ट हो रहा था।
इस गणित के प्रश्नों को हल करते करते बेरोज़गार से पार्टी प्रवक्ता बन जाते हैं लेकिन फिर एक प्रश्न ज़ेहन में उभरता है कि किसी के दर्द को चाहे वो प्रकृति हो या इंसान जान जाओगे तो क्या ? इसी भावना को सशक्त शब्द दिए हैं कविता भट्ट जी ने ----
बिल्कुल सही कहा आपने कविता जी , कर तो कुछ भी नहीं सकते , अब देखिए न राजीव जी ने एक सच्ची घटना को अपने शब्दों में कैसे बयाँ किया है ..... क्या कोई कुछ कर सका ? पढ़िए उनकी कविता .......
कई बार देखा है,
लोग झिड़क देते हैं उन्हें।
बच्चे, जवान, प्रौढ़-
हर उम्र का व्यक्ति -
बस झिड़कता है उन्हें।
कभी किसी के आगे
हाथ नहीं फैलाते वे
काश , सच ही कुछ मन परिवर्तित हो जाता और जिसकी तलाश में कोई घूम रहा है वो मिल जाता , सब वक़्त की बात है किस पर कैसा वक़्त आता है नहीं पता फिर भी जीवन है तो उम्मीद भी है । इस वक़्त को अपने शब्दों में परिभाषित किया है ऋता शेखर ' मधु ' ने ----
ये वक़्त भी क्या शय है
कितना कुछ समेटती
कितना कुछ बिखेरती
जाने कितने वादे किए
सपनों की टेकरी में
जाने क्या क्या इरादे दिए .
और इस वक़्त की बात जहाँ हो तो अचानक ही ख्याल आ जाता है हमारी विशेष टिप्पणीकार रेणु का जिनका अभी कुछ समय पहले ही काव्य संग्रह आया है " समय साक्षी रहना तुम "
तो आज की इस हलचल में यह कविता तो आनी ही चाहिए ----- ,
अपने अनंत प्रवाह में बहना तुम ,
पर समय साक्षी रहना तुम !!
उस पल के , जो सत्य सा अटल ,
ठहर गया है भीतर गहरे ;
रूठे सपनों से मिलवा जिसने
भरे पलकों में रंग सुनहरे ;
उन यादों के हार पिरोना तुम
वक़्त साक्षी है कि उम्र बढाती है तो और यौवन ढलता है , रूप कुछ कम होने लगता है लेकिन कुसुम जी की ये रचना पढ़ रूप और यौवन दोनो ही महसूस होने लगते हैं ज़रा आप भी गौर फरमायें
खन खनन कंगन खनकते, पांव पायल बोलती हैं।
झन झनन झांझर झनककर रस मधुर सा घोलती हैं।।
और लीजिये बात रूपसी की हो रही थी और मेरी मुलाकात हो गयी योगेश शर्मा जी से ........ वो किससे बतिया रहे हैं ज़रा ब्लॉग पर पहुंच कर ही पढ़िए -----
मैं तुमसे क्या कहूँ
मैं तुम पे क्या लिखूँ
तुम्हें देख के पहली बार
कि जीवन अब तक जिया ही नहीं
रौशनी पायी, देखे मौसम, महसूस की थी हवा
पर रूह तक ऐसा असर हुआ ही नहीं
इतनी श्रृंगार रस की कविता के बाद मन तो नहीं होता कि यथार्थ से रु ब रु कराया जाय , लेकिन समाज के हर चेहरे को देखना ज़रूरी है और आइना तो चौथा खम्बा ही दिखा सकता है ........
हमारे आस पास कैसी मानसिकता के लोग हैं यह जानना सबके लिए महत्त्वपूर्ण है ..
कर्नाटक विधानसभा में कांग्रेस विधायक ने जब बलात्कार रोक नहीं सकती तो उसका आनंद लो जैसे घृणास्पद और नीचतापूर्ण बात कही तो यह पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता का जयघोष ही था। यदि ऐसा नहीं होता तो उस विधानसभा के माननीय अध्यक्ष के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं होती। और उसी विधानसभा में बैठे सभी माननीयों के ठहाके नहीं गूंजते।
और इन सियासी लोगों के क्या दाँव पेंच होते हैं जानिए आकिब जावेद की इस ग़ज़ल में .....
नाम लब पे यूँ उसका जारी है,
ज़िन्दगी साथ में गुज़ारी है।
نام لب پہ یوں اس کا جاری ہے,
زندگی ساتھ میں گزاری ہے!
वक़्त बे-वक़्त जब सियासत हो,
ये सियासत की चाटुकारी है।
और अंत में आज की विशेष प्रस्तुति ........
आडम्बरों पर , अंधविश्वासों पर शोध कर लोग पुरस्कार पा जाते हैं , नाम होता है , न जाने कहाँ कहाँ गोष्ठियों का आयोजन होता है लेकिन क्या सच ही कोई सुधार करने की नीयत से कोई काम किया जाता है या बस सब दिखावा है ...... पढ़िए एक आक्रोशित मन की भावना से निकले शब्द जो बहुत कुछ कहना चाह रहे हैं ....
हाशिये पर पड़े
उपेक्षितों को
अंधविश्वास से मुक्त कर
स्वस्थ वातावरण प्रदान करने की
मुहिम में जुटे हुए अनगिनत लोग
संकरी,दुरूह
पगडंडियों से उतरकर
खोह में बसे
जड़ों को जकड़े अंधविश्वास के कीड़़े को
विश्वास के चिमटे से खींचकर
निकालने का उपक्रम करते हैं...।
आज बस इतना ही ....... वैसे थोड़ी ओवर डोज़ हो गयी है ........बहुत समय से हलचल प्रस्तुत नहीं की थी शायद इसलिए .....कुछ और लिंक्स सहेजे थे पुरानी पोस्ट्स के ......वो फिर कभी सही .......
अब इजाज़त दें ....... फिर मिलते हैं पंद्रह दिन बाद ..... सोमवार को .... पाक्षिक रूप से हलचल ले कर आपके समक्ष उपस्थित होऊँगी ........
आपकी ही
संगीता स्वरुप