नमस्कार ! स्वागत है आज के पाँच लिंक्स के आनन्द में ।
यूँ तो आपने एक उक्ति सुनी या पढ़ी ही होगी कि जहाँ न पहुँचे रवि , वहाँ पहुँचे कवि । यानि कि जहाँ सूर्य का प्रकाश भी न पहुँचे वहाँ की बातें कवि अपनी कल्पना में ले आता है । मैं तो कहती हूँ कवि ही क्यों हर लेखक की कल्पना शक्ति विस्तृत होती है । कोई भी लेखक अपनी कल्पना शक्ति द्वारा ही कहानी , कविता , लेख , उपन्यास लिख कर कुबेर का खज़ाना पा लेते हैं ( वैसे ये कवियों के लिए थोड़ी गलत बयानबाज़ी है ) । अमृता तन्मय जी का बड़ा मासूम सा सवाल कि यदि आपके सामने कुबेर का खज़ाना और कल्पना का खज़ाना हो तो आप कौन सा चुनेंगे ? बाकियों का तो पता नहीं लेकिन जब केवल मान लेना है कि ये दो ख़ज़ाने सामने हैं तो कल्पना का ही चुनेंगे और कल्पना में ही सोच लेंगे की कुबेर का खज़ाना हमारे हाथ लग गया है ..... खैर आप इनके द्वारा दिये तथ्यों पर गौर फरमाएँ और इनकी कल्पना का आनंद उठाएँ ---–
कल्पना करें यदि आपके सामने एक तरफ कुबेर का खजाना हो और दूसरी तरफ कल्पना का खजाना हो तो आप किसे चुनेंगे ? गोया व्यावहारिक तो यही है कि कुबेर का खजाना ही चुना जाए और बुद्धिमत्ता भी यही है । तिसपर महापुरुषों की मोह-माया-मिथ्या वाले जन्मघुट्टी से इतर बच्चा-बच्चा जानता है कि इस अर्थयुग में परमात्मा को पाने से ज्यादा कठिन है अर्थ को पाना ।
कल्पना से निकल अब कदम बढ़ाते है सत्य की ओर .......उस ओर बढ़ने से पहले एक बात अपनी कहना चाहूँगी , कुछ लोगों की पोस्ट का कथानक बहुत अच्छा होता है , उसे लोगों को पढ़ना भी चाहिए , लोगों तक पहुँचाने का मेरा मन भी करता है लेकिन वर्तनी की त्रुटियाँ होने के कारण अक्सर मैं छोड़ देती हूँ । विशेषकर अभी हिन्दी दिवस के उपलक्ष में आई बहुत सी कविताओं में त्रुटियाँ देख मन थोड़ा क्षुब्ध हुआ । खैर ...... हिन्दी भाषा को हम उसका स्थान दिलाने में जो असमर्थ हो रहे हैं उसकी जो टीस मन की गहराई में उभरती है उसकी एक सटीक बानगी संदीप कुमार शर्मा जी की यह कविता कह रही है -----
हिंदी पर
लिखता हूं तो
अपने आप को अपराधी पाता हूं।
बच्चे जिन्हें
जीने के लिए
अंग्रेजी का मुखौटा चाहिए था
मैंने दे दिया।
सच कहने पर आएँ तो बहुतों को कष्ट हो जाता है । क्योंकि सच तो होता ही कड़वा है , लेकिन बहुत बार एक लेखक सच को हास्य व्यंग्य में लपेट कर परोस देता है .... ऐसे ही आनंद पाठक जी ले आये हैं अल्लम गल्लम पर एक व्यंग्य रचना .. पढ़ें और आनंदित हों ---
चाय का एक घूँट जैसे ही मिश्रा जी के हलक के अन्दर गया कि एक शे’र बाहर निकला।
चाय की प्याली नहीं है , ज़िन्दगी का स्वाद है,
मेरे जैसे शायरों को आब-ओ-गिल है, खाद है ।
[आब-ओ-गिल है खाद है = यानी खाद-पानी है ]
मिश्रा जी ने अपनी समझ से शे’र ही पढ़ा था कि पास खड़े एक आदमी ने कहा--
-जी ! आप कौन ?
सच ही है कि जब से ज़ूम पर प्रबुद्ध रचनाकार आने लगे हैं और विभिन्न प्रतियोगिता में उनकी हिस्सेदारी हुई है तो प्रतियोगिता जीतने की होड़ भी लगी हुई है . वैसे तो सभी कुछ न कुछ कमाने में लगे रहते हैं । कोई नाम कमा रहे है तो कोई पैसा । पैसा कमाने के लोगों ने बड़े शातिर तरीके अपनाये हुए हैं। अब जब उन शातिरों पर सरकार की गाज गिरती है तो तिलमिला जाते हैं । आँख खोल कर जानिए कि आखिर देश में हो क्या रहा है ? कैसी विचारधारा को विकसित किया जा रहा है ? अब छोडो भी ..... अरे मतलब इस ब्लॉग पर अलक नंदा जी प्रस्तुत कर रही हैं एक सार्थक लेख ..........
ठीक इसी तर्ज़ पर हमारे देश की सुरक्षा व समृद्धि पर घात कर रहे ब्यूरोक्रेट और कथित सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर सरीखे भेड़ियों की अब पोल खुल रही है मगर कठघरे में अकेले हर्ष मंदर ही नहीं, उनकी पूरी लॉबी आती जा रही है क्योंकि इसमें शामिल 25 से ज्यादा “बुद्धिजीवियों” ने मंदर को “शांति और सौहार्द्र” के लिए काम करने वाला बताकर सरकार (ईडी) के खिलाफ एक संयुक्त बयान जारी किया है।
और इस आँख खोलू ( Eye opener ) लेख के बाद बहुत खूबसूरत सीख देती एक रचना लायी हूँ जिसे पढ़ आप सभी का मन ऊर्जा से भर जाएगा । कवि ने निरंतर जीवन में उत्साह बनाये रखने की सलाह दी है भले ही जो बनना चाहते थे न बन पाए हों लेकिन उत्साह नहीं खोना चाहिए ..... प्रवीण पाण्डे जी की कविता पेश है ---
बाहर तीखे तीर चल रहे,
सीना ताने वीर चल रहे,
प्यादे हो, हद में ही रहना,
दोनों ओर वजीर चल रहे।
मन अतरंगी ख्वाब न पालो,
पहले अपने होश सम्हालो,
क्यों समझो शतरंजी चौखट,
बचपन है, आनन्द मना लो।
ज़िन्दगी में एक तरफ उत्साह बनाये रखने का आग्रह और दूसरी तरफ बहुत बार कुछ ऐसा घटित होता है कि जीवन ही कोई दाँव पर लगाने को प्रस्तुत हो जाता है । लेकिन फिर कहीं से अचानक कोई प्रेरणा पा अपने मन को दृढ़ करता है । सच ज़िन्दगी भी कैसा ताना - बाना है !!!!! और ताना बाना पर पढ़िए उषा किरण जी की एक लघुकथा --
रेल की पटरियों पर बदहवास रोती चली जा रही दीप्ति के पीछे एक भिखारिन लग गई।
- ए सिठानी तेरे कूँ मरनाईच न तो अपुन को ये शॉल, स्वेटर और चप्पल दे न…ए सिठानी …!
दीप्ति ने शॉल, स्वेटर और चप्पल उसकी तरफ उछाल दिए। भिखारिन और तेजी से पीछा करने लगी।
- ऐ सिठानी ये चेन और कंगन भी दे न…भगवान भला करेंगे…!
इस कथा को पढ़ मुझे लगता है कि हमारे बुद्धिजीवी वर्ग का नेतृत्व करने वाली कुछ महिलाएँ क्या सच ही स्त्री सशक्तिकरण पर कुछ सार्थक कर पाएँगी ....... या बस गोष्ठी और नारे ही रह जायेंगे ---- मन में ऐसी ही कुछ शंका लिए श्वेता सिन्हा एक सशक्त रचना ले कर आई हैं और जानना चाह रही हैं कि क्या सच ही कुछ बदलाव होगा ? पढ़िए उनकी रचना और थोड़ा विचारिये .....क्या सच ही स्त्रियों के लिए कहीं कुछ हो रहा है ?????
नामचीन औरतों की
लुभावनी कहानियाँ
क्या सचमुच
बदल सकती हैं
हाशिये में पड़ी
स्त्री का भविष्य...?
उंगलियों पर
गिनी जा सकने वाली
प्रसिद्ध स्त्रियों को
नहीं जानती
पड़ोस की भाभी,चाची,ताई,
इस विचारणीय कविता के साथ ही आज की हलचल का समापन कर रही हूँ । फिर मुलाकात होगी ..... इसी जगह ........ इसी दिन ..... इसी समय .......एक ब्रेक के बाद ।
धन्यवाद
संगीता स्वरूप ।