आज के पाँच लिंकों के आनंद पर आप सभी का स्वागत है ...... यूँ तिथि के अनुसार आज 19 जुलाई को भी इस ब्लॉग का जन्मदिन है , तो इस ब्लॉग को मेरी शुभकामनाएँ .... जन्मदिन यूँ ही हर साल मनता रहे ... ये सिलसिला यूँ ही चलता रहे .....
आज अपने प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष एक प्रश्न ले कर हाज़िर हूँ .......... आशा करती हूँ कि मुझे उचित उत्तर मिल पायेगा .....पहले ऐसे कई ब्लॉग्स काम करते थे जहाँ विभिन्न ब्लॉग्स की चर्चा हुआ करती थी ...... अभी मेरी जानकारी के अनुसार ऐसे दो ही मंच हैं जहाँ पाठकों के लिए लिंक्स लगाये जाते हैं .....प्रश्न केवल ये है कि ऐसे मंचों का क्या औचित्य है ? .... चर्चाकार ब्लॉग जगत में घूम कर आपके लिए लिंक्स लगाते हैं तो उनका मकसद क्या होता है ? ..... इस विषय पर आप सभी पाठकों के विचार आमंत्रित हैं .... आपके विचारों के माध्यम से शायद हमें भी कोई नयी राह मिले .......
मन में कुछ असमंजस सा है जिसे आपसे साझा कर रही हूँ ..... ( पुरानी रचना )
द्रोण ,
जो आधुनिक युग के
गुरुओं के
पथ - प्रदर्शक थे
उन्होंने सिखाया कि
पहले लक्ष्य साधो
फिर शर चलाओ
अर्थात
पहले मंजिल को देखो
फिर मंजिल पाने के लिए
कर्म करो,
कृष्ण ने कहा कि -
कर्म करो ,
फल की इच्छा मत रखो
मैं , अकिंचन
क्या करुँ ?
एक ईश्वर और एक गुरु
कबीर ने कहा -----
गुरु की महिमा अपरम्पार
जिसने बताया ईश्वर का द्वार
गुरु की मानूं तो फल - भोगी
हरि को जानूं तो कर्म - योगी
क्या बनना है क्या करना है
निर्णय नही लिया जाता है
पर लक्ष्य बिना साधे तो
कर्म नही किया जाता है .
चलिए चलते हैं आज की चर्चा पर ....
यूँ तो लिंक्स लगा चुकी थी और ये शेड्यूल भी हो चुकी थी लेकिन एक बहुत प्यारी कविता में एक माँ के हृदय के उद्द्गार अपनी प्यारी बिटिया के जन्मदिन पर पढ़ने को मिले ....आप लोग भी बेटी मनस्वी को स्नेह और आशीर्वाद से नवाज़िये ..... श्वेता सिन्हा के शब्द रूपी आशीर्वचन आप भी पढ़ें ---
नन्ही बुलबुल
आज हर क्षेत्र में आपको राजनीति दिखाई देगी ....... राजनीति , राजनीति में तो है ही ...... घर हो , कार्यस्थल हो , फेसबुक हो या ब्लॉग हो ...... हर जगह राजनीति के दांव - पेंच दिखते हैं ..... इसी तरह विशुद्ध राजनीति में श्री गजेन्द्र भट्ट " हृदयेश " ने लिखा है ...
मेरे प्यारे दोस्तों, मैं अपने एक सहयोगी राजनैतिक मित्र के साथ मिल कर पिछले एक माह से एक नई राजनैतिक पार्टी बनाने की क़वायद कर रहा था। आपको जान कर खुशी होगी कि हम अपने इस अभियान में सफल हो गए हैं, खुशी होनी भी चाहिए😊। न केवल पार्टी की संरचना को मूर्त रूप दिया जा चुका है, अपितु इसका नामकरण भी किया जा चुका है।
कोई तो हर पल और हर दल राजनीति के मोह में फंसा है तो कोई न जाने कौन से स्वर्णिम पिंजरे के मोह में ध्यान लगाये बैठा है .....
मोह लगा है .....
स्तब्ध हूँ कि कैसे मैं अबतक हूँ यहाँ
जो दिखता था जीवन , यहाँ है कहाँ
छल करता हर एक सुख है , पर अब
आँखों को दिखता साक्षात स्वर्ग वहाँ.
लोग कहते हैं कि पर्यावरण का ध्यान रख कर पेड़ों को बचाइए ....... छायादार वृक्ष हमें सुकून देते हैं ..... और एक नजरिया ये भी देखिये कि छाया दार पेड़ होने की किसी को सजा भी मिल जाती है ..... अजीत गुप्ता जी हमेशा ही अद्भुत शैली में ,नए बिम्ब ले अपनी बात कहती हैं कि आनन्द आ जाता है ....
छायादार पेड़ की सजा
मेरे घर के बाहर दो पेड़ लगे हैं, खूब छायादार। घर के बगीचे में भी इन पेड़ों की कहीं-कहीं छाया बनी रहती है। कुछ पौधे इस कारण पनप नहीं पाते और कुछ सूरज की रोशनी लेने के लिये अनावश्यक रूप से लम्बे हो गये हैं।
अभी हम छायादार वृक्षों की बात कर ही रहे थे कि न जाने कहाँ से ये पतझर आ गया .... जी एक कहानी वंदना गुप्ता जी की कलम से---
पत्ते झड़ने का मौसम
आज की अंतिम पेशकश ..... एक पिता के उद्दगार ........ बेटा बड़ा हो गया लेकिन बचपन से लेकर बड़े होने की प्रक्रिया आँखों में तैर रही है ..... प्रवीण पाण्डे जी कह रहे हैं ...
याद बहुत ही आते पृथु तुम
सभी खिलौने चुप रहते हैं, भोभो भी बैठा है गुमसुम ।
बस सूनापन छाया घर में, याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।
पौ फटने की आहट पाकर, रात्रि स्वप्न से पूर्ण बिताकर,
चिड़ियों की चीं चीं सुनते ही, अलसाये कुनमुन जगते ही,
आँखे खुलती और उतरकर, तुरत रसोई जाते पृथु तुम ।
याद बहुत ही आते पृथु तुम ।।१।।







