निवेदन।


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सोमवार, 3 मई 2021

3017 ....... हकीकत की शुक्रगुजार हूँ

श्रद्धांजलि देते देते 
लगने लगा है 
कि 
खुद हम भी 
किसी चिता का 
अंश बन गए हैं ।
गर इस एहसास से 
निकलना है बाहर 
तो कर्म से 
च्युत हुए बिना 
जियो हर पल 
और निर्वहन 
करते हुए 
अपनी जिम्मेदारियों का 
सोचो कि 
तुम ज़िंदा हो |


आज ऐसा वक़्त है कि न तो कुछ पढने में मन लग रहा है और न ही लिखने में ... लेकिन फिर भी हर कोई अपने हिस्से के काम को कर ही रहा है . कोई आज के समय  का चिंतन करते हुए अपने भाव अभिव्यक्त कर रहा है तो कोई प्रार्थना कर रहा है .... मैं भी अपना कर्त्तव्य समझ आप लोगों के लिए कुछ नए पुराने लिंक्स लायी हूँ  , इसी उम्मीद से कि आपको कुछ बेहतर पढने को मिलेगा ... सबसे अनुरोध है कि अपने आपको नकारात्मक भाव से बचाए रखिये .

चलते हैं आज की चर्चा पर ..... 

आज की चर्चा कुछ उम्मीदों के साथ ....

सीमा जी ऐसे कठिन दौर में बस  सबके लिए स्वस्थ रहने की प्रार्थना कर रही हैं ...




तसल्ली भरे 
शब्दों के चेहरों पर 
मातम सा 
छाया देख  . 

समीर लाल जी व्यंग्य विधा में अपनी छोटी सी रचना में बड़ी बड़ी बात कह जाते हैं . एक बानगी देखिये ... समसामयिक विषयों पर खूब पकड़ है ... 



आज मौसम बड़ा..बेईमान है बड़ा


कुछ मौसम ऐसे भी हैं जो मनुष्य ने बाजारवाद के चलते गढ़ लिये हैं. इनका आनन्द भी सक्षमतायें ही उठाने देती है. इसका सबसे कड़क उदाहरण मुहब्बत का मौसम है जिसे सक्षम एवं अमीर वर्ग वैलेन्टाईन डे के रुप में मनाता है. फिर इस डे का मौसम पूरे फरवरी महीने को गुलाबी बनाये रखता है. 

पुरुषोत्तम जी  कि भावनाओं कि गहराई नापनी है तो थोडा ऊँचाई  पर जाइए  और देखिये आपको क्या मिलता है ...




अवशेष, अरमानों के, बिखरे हैं यत्र-तत्र,
उकेरे हैं, किसी ने ये प्रपत्र!
दुर्गम सी, ये राहें...
बैरागी खुद ये, किसी को क्या दे!

प्रीति मिश्रा ... आज के हालात से हैरान परेशान ...त्रस्त हो रहे सब ...  और ऐसे में प्रभु की शरण ही याद आती है ... एक पुरजोर आह्वान है .. 


मुझमें मैं नहीं रह गया 
बस तुम ही समाये हो 
जीवन में फैली निराशा तो 
बस तुम ही याद आये हो

रश्मि प्रभा जी  एक ऐसा नाम जो संवेदनाओं से भरा हुआ ... सत्य को कह सकने की क्षमता ...  वक़्त को पहचानना  और बिना हार माने आगे बढ़ने की ललक ...  सात रंग नहीं आठवाँ रंग रंगने में माहिर ..मिलिये हकीकत से ... 




हकीकत की शुक्रगुजार हूँ


सपने देखने में
उसके बीज बोने में
उसे सींचने में
आठवें रंग से उसे अद्भुत बनाने में
मैं सिर्फ माहिर नहीं थी
माहिर हूँ भी ...
दिल खोलकर मैंने
सबको अपने हिस्से का सपना दिया

आज बस इतना ही .... अभी तो सपने हकीकत सब गड्ड - मड्ड हुए पड़े हैं ....  एक ही गुजारिश ...

 घर में रहिये सुरक्षित रहिये ... 

नमस्कार 

संगीता स्वरुप .


 

  

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