आप सभी का स्नेहिल अभिवादन।
“तुम जो भी हो, तुम जो भी करते हो, तुम अद्भुत और अद्वितीय हो. इस बात पर कभी शक मत करो।”
“यदि तुम्हें लगता है कि तुम यह कर सकते हो, तो तुम कर सकते हो. और यदि तुम्हें लगता है कि तुम यह नहीं कर सकते हो, तो तुम सही हो।”
“खुशी वह यात्रा है, मंजिल नहीं।”
“सफलता वह नहीं है जो आप हासिल करते हैं, बल्कि वह है जो आप बन जाते हैं जब आप उसे हासिल करते हैं।”
“सफलता अंतिम गंतव्य नहीं है, बल्कि यात्रा का आनंद लेने की प्रक्रिया है।"
आज की रचनाऍं-
मौन बदलता है दृष्टिकोण।
देखने देता है दूसरा पक्ष ।
यज्ञ की समिधा है मौन ।
मौन गहरे पैठ पा जाता है मर्म।
मौन है गहरे कूप का जल ।
मन प्रांत कर देता शीतल ।
मौन का आकाश है स्वतंत्र।
मौन की व्याख्या है मौन ।
के किनारे, यूँ तो आज नहीं ज़ेब
में एक भी ढेला, शून्य में थमा
हुआ सा लगे है सांसों का
हिंडोला । छोटी छोटी
खुशियों में रहते हैं
शामिल लंबे
उम्र के
राज़,





वाह
जवाब देंहटाएंसुन्दर अंक
सिपाही हाजिर है
जवाब देंहटाएंएक दिन पहुंच ही जाएंगे आकाशगंगा
के किनारे,
सादर
हम शनिवार से आएंगे
जवाब देंहटाएंआपका सविनय स्वागत है, आदरणीय । जान कर अच्छा लगा। नमस्ते।
हटाएंश्वेता जी का आभार ..शानदार रचनाओ के बीच मेरी भी..🙂खूबसूरत प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचनाओं से सजा बहुत ही नायाब अंक ।
जवाब देंहटाएंलम्हों पर साँकल क्यूँ लगायें ? सवाल के बाद फूल और झरने जैसी रचनाएं । मुन्नू जी बस्ता लादे.. पत्थर को भी पिघल दे ,वो रवा .. आकाशगंगा और उम्मीद की ऐनक .. दिल में बस गए , माहौल हुआ खुशहाल ! ज़िंदगी अच्छी निभेगी, श्वेता जी ! आपने किनके कथन उद्धृत किए हैं ?
जवाब देंहटाएंभले-भले से इस अंक के लिए धन्यवाद और मौन को भी जगह देने के लिए हार्दिक आभार !