निवेदन।


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बुधवार, 24 सितंबर 2025

4521..दिन अभी ढला नहीं,..


।।प्रातःवंदन।।।

"चाँदनी बनाई, धूप रची,

भूतल पर व्योम विशाल रचा,

कहते हैं, ऊपर स्वर्ग कहीं,

नीचे कोई पाताल रचा।

दिल - जले देहियों को केवल

लीला कहकर सन्तोष नहीं;

ओ रचनेवाले! बता, हाय!

आखिर क्यों यह जंजाल रचा...?"

रामधारीसिंह 'दिनकर'

बढते है नए चुनिंदा लिंकों के साथ..

दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी 


                                                           

बादलों का गर्जन, नभ विशाल गूँजा है

दिन ने ओढ़ा तमस, मन जा कहीं उलझा है  

खुल रही गांठें अंतस की, एक पूरी एक आधी है  

दिन अभी ढला नहीं, जिंदगी की शाम बाकी है



 एक वही तो डोल रहा है 



गा-गा कर थक गये सयाने

बुद्धि से तेज गति है जिसकी, 

जीवन एक सुगंध की खानि 

कानों में आ बोल रहा है

✨️

फटने को तत्पर, प्रकृति के मंजर।


अभी तक मैं इसी मुगालते में जी रहा था

सांसों को पिरोकर जिंदगी मे सीं रहा था,

जो हो रहा पहाड़ो पर, इंद्रदेव का तांडव है,

✨️

हमें तो लूट लिया फोन बनाने वालों ने 

 टेली कॉल वालों के जी के जंजालों ने 

 अजब मोबाइल है

गजब सी उस की उल्फ़त है 

नजदीकिया है दूरी 

दूरियां में क़ुर्बत है

कोई दुखड़ा सुना रहा  

अपना व्हाट्सएप पे..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '...✍️

मंगलवार, 23 सितंबर 2025

थोड़ा सा कुछ बिकना.सीख

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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देवी का आह्वान करने से तात्पर्य  मात्र विधि-विधान से मंत्रोच्चार पूजन करना नहीं, अपितु अपने अंतस के विकारों को प्रक्षालित करके दैवीय गुणों के अंश को दैनिक आचरण में जागृत करना है।
व्रत का अर्थ अपनी वृत्तियों को संतुलित करना और उपवास का अर्थ है अपने इष्ट का सामीप्य।
अपने व्यक्तित्व की वृत्तियों अर्थात् रजो, तमो, सतो गुण को संतुलित करने की प्रक्रिया ही दैवीय उपासना है।
देवी के द्वारा वध किये दानव कु-वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे-
महिषासुर शारीरिक विकार का द्योतक है
चंड-मुंड मानसिक विकार,
रक्तबीज वाहिनियों में घुले विकार,
ध्रूमलोचन दृश्यात्मक वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करता है,
शुम्भ-निशुम्भ भावनात्मक एवं आध्यात्मिक।
प्रकृति के कण-कण की महत्ता को आत्मसात करते हुए
ऋतु परिवर्तन से सृष्टि में उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा का संचयन करना और शारीरिक मानसिक एवं अध्यात्मिक विकारों का नाश करना नवरात्रि का मूल संदेश है।




पुचकारो, सहलाओ, फेरो अपनी स्नेहसिक्त हथेली,

किसी निज प्रिय की आँखों की तरह ही कभी-कभी,

फ़ुर्सत निकाल झाँको कभी तो इनकी आँखों में भी।

भैरव के हो उपासक तो मानो इन्हें निज संतान-सी।





और
जब इन सब वृत्तों से
थोड़ी सी बचती हूँ
तो चली जाती हूँ
उस वृत्त में
जो सबसे भीतर है
सबसे शांत
सबसे गूढ़
जहाँ मैं
अपने आप में समाई हूँ।



ऐसा माना जाता है कि यह समुद्री साँप तनाह लोट’  की तलहटी में रहता है और मंदिर को घुसपैठियों और दुष्ट लोगों से बचाता है। द्वैपायन ने बताया कि मन्दिर वरुणदेव को समर्पित है । हम देर तक मन्दिर से टकराती लहरों को  देखते रहे मानो वे वरुणदेव का अभिनन्दन कर रही हों ।




इस सुबह जागने में भी एक आत्मीयता होती है। इतराता हुआ आलस घेर लेता है और आप अचानक नहीं उठते, बल्कि आराम से कुछ सोचते हुए उठते हैं। कुछ क्षण बिस्तर पर यूँ ही बैठे रहते हैं जैसे कोई पत्ता शांत पानी की सतह पर तैर रहा हो। शरीर हल्का महसूस करता है, आत्मा ज़्यादा स्वतंत्र महसूस करती है क्योंकि उसे पता है कि आगे आने वाले घंटे किसी ज़िम्मेदारी के बंधन में अटके हुए नहीं हैं। यह आज़ादी सूक्ष्म होते हुए भी गहन लगती है और इसे हम धीरे-धीरे चाय की चुस्कियाँ लेते हुए, केतली से दोबारा कप भरते हुए एक  उत्सव की तरह जीते हैं।


साधक हो जाएगा सधेगा खुद भी
बाधाओं के बाजार लगेंगे
बस तू थोड़ा सा कुछ बिकना सीख
सधी हुई लेखनी से सधा हुआ कुछ लिखा हुआ
सामने कागज पर उतर आएगा
भीड़ होगी मधुमक्खियों की तरह
जहर के पानदानों के विज्ञापनों में निखरना सीख

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आज के लिए इतना ही 
मिलते हैं अगले अंक में।

सोमवार, 22 सितंबर 2025

4519 ...बाऊजी, मैंने आपकी किताब्बें पढ़ी हैं। आप तो सब कुछ मेरेई बारे में लिखते हैं

रविवार, 21 सितंबर 2025

4518 ..शाम से रात होने को आई थी सड़क पर केवल बारिश झर रही थी

 सादर अभिवादन

शनिवार, 20 सितंबर 2025

4517 ..ख्वाहिशें बहुत रही, उसमें कुछ पूरा हुआ। जो रह गया अधूरा

 सादर अभिवादन

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

4516...ज़िंदगी अब झर रही है...

शुक्रवारीय अंक में 
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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मौन, वार्तालाप से ज्यादा प्रभावी हो शायद
दुःःख समझना,दर्द सुनने पर हावी हो शायद...
पर,बनावटी बाज़ार में भावनाएँ आश्रयहीन 
न निभाना औपचारिकता, अशिष्टता है,
संवेदनशीलता का दिखावा, विशिष्टता है।
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अपने आस-पास की कराह को अनसुना करना,

परिचित,अनजानी दर्द भरी सिसकियों भर निर्विकार रहना

मरघट में बदलती बस्तियों के मध्य अपने किले की सुरक्षा के लिए रात-दिन प्रार्थना करना सामयिक दौर में मृत्यु औपचारिक समाचार है,जीवन की जटिलता समझने का प्रयास व्यर्थ है तटस्थ रहकर,अगर जीना है   बस सकारात्मकता के मंत्र का जाप करना होगा...

सकारात्मक रहो, सकारात्मकता जरूरी है,जीने के लिए आस चाहिए,उम्मीद पर दुनिया कायम है,समय है रूकेगा थोड़ी गुज़र जायेगा।

क्या सचमुच सकारात्मकता की ओर अग्रसर है हम या असंवेदनशीलता के नये युग की ओर बढ़ चुके हैं?



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आइये पढ़ते हैं आज की रचनाएँ-



इक दूजे के पूरक हम बिन तेरे क्या है अस्तित्व मेरा 
रह-रह टीस उठे हिय,कंठ रूद्ध,अश्रु करें श्रृंगार मेरा
अनुराग से सना पढ़ मौन वेदना मेरी छवि बना लेना
नेह से ना करना निर्वासित इस मधुमास में आ जाना ।



अंतरतम का सौंदर्य ही रहता है
शाश्वत, सुंदरता उभरती है
तभी जब हृदय बने
उन्मुक्त देवालय,
मृत्पिंडों से
निर्मित है
देह का
संग्रहालय । 







जो भी साथी हँस रहे हैं
वो भी उतना झर गये हैं
कितने चश्में उनके बदले
याद कुछ ना रह गये हैं
 

करते रहे ठिठोली 
भोर - सांझ ये आते जाते 
होठों पर खुशियाँ दे जाते 
दिन ढलते ही झम - झम करके 
खूब बरसते है ये बादल 
गड़ - गड़ करके झड़ - झड़ करके 
धाराएँ बहती जाती है 



जाना तो है लेकिन वापस छोड़ना यही होगा।" उसकी पहेली जैसी बातों को पत्नी समझ पाती उससे पहले ही सड़क के उस पार पार्किंग एरिया में गाड़ी संग इंतजार करते ड्राइवर को एक हाथ हिला थोड़ा और इंतजार करने का इशारा कर वह पत्नी का हाथ थामें रिक्शे की पिछली सीट पर जा बैठा।"
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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 18 सितंबर 2025

4515...अपने रास्ते पर आने जाने का नाम और निशाना नहीं मिलता...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ. सुशील कुमार जोशी जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

राम को लिखते हैं खत बस एक डाकखाना नहीं मिलता

रोज आते हैं अपने अपने रास्ते से यहां आदतन सभी

अपने रास्ते पर आने जाने का नाम और निशाना नहीं मिलता

वो खुदा में मसरूफ़ हैं इन्हें अल्लाह नहीं मिलता

ये राम को लिखते हैं खत बस एक डाकखाना नहीं मिलता

*****

एक गीत -सारा जंगल सुनता है

कभी कभी

तो सपने मन के

इंद्र धनुष हो जाते हैं,

कभी स्वनिर्मित

महासुरंगो में

जाकर खो जाते हैं,

बूढ़ी आँखों

से बुनकर मन

जाने क्या क्या बुनता है.

*****

1218 ग्राम्य जीवन की संवेदनाओं का रंगमंच: 'कुछ रंग' चोका-संग्रह 

पैरों में पैरी

धूसर सी पत्तियां

हरा फुँदना

सिर पर बाँधके

दूल्हे के जैसा

खड़ा खेत में गन्ना

*****

योगा संग दोहा

कर्म संधान लक्ष्य पहुँचे, फिर बजे विजय शंख।
सार्थक हो काज तेरे, सकल लगाए अंक।।

*****

Sharadakshara: पुस्तक समीक्षा | शब्द-शब्द संवाद करती कविताओं का इ...

'आचरण' में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा  पुस्तक समीक्षा शब्द-शब्द संवाद करती कविताओं का इन्द्रधनुष

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

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