निवेदन।


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गुरुवार, 25 जनवरी 2024

4016...जैसे उसीको कोई धोखा दिए जा रहा हो!

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय गगन शर्मा जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पढ़िए आज का संकलन-

राम 

बजरंग बली के हिय में राम

भ्राता भरत के तप में राम

शबरी की शरणागति में राम

केवट की निश्छल भक्ति में राम

राम आये हैं...

राम आये हैं,

धरती के तप का विराम लाये हैं I

राम आये हैं,

जीवन चक्र का नया आयाम लाये हैं I

अमेरिकी कवयित्री कोलीन जे. मैकलेरॉय की कविता "द लॉस्ट ब्रेथ ऑफ़ ट्रीज' का अनुवाद

नदियों में तैरते थे बांसों के बने नाव 

पक्षियां उनपर बैठ तिरती थीं बेख़ौफ़

उत्तर की तरफ जाने सड़क घिरी थी वनों से

लोग कहते थे सौ सालों तक ये वन रहेंगे मौजूद

उनदिनों सड़क के दोनों तरफ लगे थे घने वृक्ष

जिसकी छाया में सुस्ताते थे

तू रुख मोड़ बढ़ जा आगे!

जब आँख खुले तभी सवेरा समझ लेना ठीक

बेकार सोचने में वक़्त ज़ाया करने से क्या ?

जीवन की यही रीत है प्रकृति ने सिखलाई

जो भी आये सामने तू रुख मोड़ बढ़ जा आगे !

 समय चक्र पर लगती छाप

मैं समझ गया फिर कोई गुलगपाड़ा इसको परेशान किए है।

पूछा, का हुआ कुछ बताओगे?''

नहीं, का है कि हम सोच रहे थे कि कुछ लोग एकदम्मे बुड़बक होता है का? ऊ लोग को सुझाई नहीं देता है कि कोई तुम को बोका बनाए जा रहा है वर्षों से, अऊर तुम बने जा रहे हो!''

मैं समझ गया कि इसे फिर कीड़ा काटा है! बोला नहीं, सिर्फ उसे देखता रहा! वह कुछ ज्यादा ही गमगीन लग रहा था! जैसे उसीको कोई धोखा दिए जा रहा हो!

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

बुधवार, 24 जनवरी 2024

4015...निशब्द पग धर...

।।उषा स्वस्ति।।

"माघ का सुंदर सवेरा...

खिल रहा बटियों के ऊपर

तरल जलधारा लरजती, ठिठक चलती,

और तुहिनों से सजी पूरब की धरती,

शांत निर्मल सुखद किरणें उतरतीं

निःशब्द


पग धर

मंदिरों की घंटियाँ बजतीं मधुर-सी

गूँजती फिरतीं

दिशाओं में भँवर सी !"

 पूर्णिमा वर्मन 

प्रस्तुतिकरण में आज लाई हूँ चुनिंदा लिंक जिसे आप सभी पढ़ें और चंद शब्दों से अलंकृत करें.✍️


वृक्षों की खोई हुई साँसें 

कोलीन जे. मैकलेरॉय

शहरीकरण का शिकार होने से पहले यह शहर 
गायों का चारागाह सा था हरियाली से भरपूर ..
✒️

मुंबई और रजाई 

पिछले हफ्ते मैं गया था मुंबई 

वहां का मौसम था सुरमई 

दिल्ली की सर्दी थी कंपकंपाती..

✒️

जीने का जज़्बा

अरमाँ की तरह जो संग चले 

बाहों में वो कुछ यूँ भर ले 

जैसे कोई अपना होता है 

जैसे कोई सपना होता है .

✒️

राम ने कहा

सुनो वत्स

मुझे मर्यादा पुरुषोत्तम 

जानते है सब 

मुझे मर्यादा में ही रहने दो..

✒️

गुलामी गीत

अति उन्माद अराजकता को जन्म देता है

समय रख रहा है आधारशिला 

कल की, परसों की

बरसों की 

इस दौर में 

सत्य का घूँट 

हलक से उतरा नहीं करता 

तुम बोलोगे 

मारे जाओगे..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️




मंगलवार, 23 जनवरी 2024

4014....भौतिक जीवन चलता है...

 मंगलवारीय अंक में आप
सभी का स्नेहिल अभिवादन।
-------

अवध में राम जी के भव्य,दिव्य,अद्भुत
स्वरूप की स्थापना के लिए
आप सभी को शुभ मंगल बधाइयाँ...।
राम-राम जी।

 आइये अब बात करें-

राष्ट्र के अनमोल रत्न
महान स्‍वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस की। आज उनकी जयंती के अवसर पर आज कृतज्ञ राष्‍ट्र उन्‍हें याद कर रहा है। लाखों भारतीय युवाओं के आदर्श और नेताजी  सुभाष चंद्र बोस ने तुम मुझे खून दो, मैं तुम्‍हें आजादी दूंगा....! जय हिन्द! का उत्साहित करने वाला नारा दिया 

*एक सैनिक के रूप में आपको हमेशा तीन आदर्शों को संजोना और उन पर जीना होगा : सच्चाई , कर्तव्य और बलिदान। जो सिपाही हमेशा अपने देश के प्रति वफादार रहता है, जो हमेशा अपना जीवन बलिदान करने को तैयार रहता है, वो अजेय है। अगर तुम भी अजेय बनना चाहते हो तो इन तीन आदर्शों को अपने ह्रदय में समाहित कर लो।

*राष्ट्रवाद मानव जाति के उच्चतम आदर्शों सत्यम् , शिवम्, सुन्दरम् से प्रेरित है।

*इतिहास में कभी भी विचार-विमर्श से कोई वास्तविक परिवर्तन हासिल नहीं हुआ है।

*याद रखिए सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है।

*हमें केवल कार्य करने का अधिकार है। कर्म ही हमारा कर्तव्‍य है। कर्म के फल का स्‍वामी भगवान है, हम नहीं।

नेता जी के कुछ प्रेरक विचार जिन्हें आत्मसात कर
उन्हें हृदय से नमन करें।

------
आइये आज की नियमित रचनाओं का
 आस्वादन करें-

बहुत कठिन होता है 
किसी को ख़ामोशी से सुनना 
तुम्हारी आंखो को 
मुझे समझना होगा 
क्योंकि वो दिमाग़ के
अनचाहे वाकयात को 
बंया कर देती हैं 
मेरी यादें मेरी कहानी 

चिड़िया भी उड़ नहीं पाती पर पसार कर   
अदृश्य हो जाते हैं भानु,शशि और सितारे
भौतिक जीवन चलता है तकनीक के सहारे 
एक ह्रदय है 
धड़-धड़ धड़कता रहता है जीवनभर अनवरत 
जमने नहीं देता धमनियों-शिराओं में बहता रक्त
इसके भी अपने मौसम हैं 


उसके ठहर जाने से 
विस्मय नहीं
सर्दियों में हर बार
बर्फ़ में तब्दील हो जम जाती है 
न जाने क्यों?
इस बार इसे देख! ज़िंदा होने का
भ्रम मिट गया है
दर्द की कमाई जागीर
अब संभाले नहीं संभलती 




हरिया ने दरवाजा खोला ! सामने तपन खड़ा था ! उसने अभिवादन किया ! हरिया ने उसे अंदर आने को कहा ! हरिया के चेहरे की प्रश्नवाचक मुद्रा को देख तपन ने ही कहना शुरू किया ! काका, आपके लिए खाना लाया हूँ ! आपकी बहू कह रही थी कि पारबती काकी बाहर गईं हैं काका अकेले हैं उनकी तबियत भी ठीक नहीं है, सो रात को उनके पास ही रुक जाना ! सुबह ही उसने पता कर लिया था कि दोपहर का खाना और शाम की चाय रतनी बुआ पहुंचा गईं हैं ! इसीलिए मेरा अब आना हुआ ! हरिया अभिभूत था, उसने तपन और उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया और उसके आराम की व्यवस्था कर सोचने लगा प्रभु किसी को भी बेसहारा नहीं छोड़ते !


कभी भेड़ों में शामिल हो कर के देख...


पलकें ही बंद नहीं होती हैं कभी
पर्दा उठा रहता हैं हमेशा आँखों से
रात के अँधेरे में से अँधेरा भी छान लेता है
क़यामत है आज का कवि 

कौन अपनी लिखे बिवाइयां
और आंखिर लिखे भी क्यों बतानी क्यों है

सारी दुनियां के फटे में टांग अड़ा कर
और फाड़ बने एक कहानी अभी

 ------

आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
 सकारात्मक रहिए।
खुश रहिए।





सोमवार, 22 जनवरी 2024

4013 ..जीत हो गयी सत्य की, झूठ गया है हार

सादर अभिवादन

आज  राज्याभिषेक
पूरे दरबार के साथ


आज मिली - जुली रचनाएं देखिए


धोबी का लड़का रोज पूछता है,
कपड़े हैं क्या प्रैस करने के लिए।

कपड़े भी ऐसे हैं कि फटते ही नहीं,
दर्जी भी पूछे, हैं क्या सीने के लिए।




काश्तकार था यह इजहार
इश्तहार इस अजूबी दस्तकार का l

पढ़ समझ ना सका धुन्ध बूँद
लिपटी धुन इस कलमाकार का ll




राम ने कहा
सुनो वत्स मुझे
मर्यादा पुरुषोत्तम जानते है
सब मुझे
मर्यादा में ही रहने दो
वाल्मीकि और तुलसी की
भावनाओं के साथ ही
मुझे जन जन के जीवन में बहने दो


"तेरे मन में राम, तन में राम,
तेरे मन में राम, तन में राम, रोम रोम में राम रे
राम सुमीर ले, ध्यान लगा ले, छोड़ जगत के काम रे
बोलो राम राम राम, बोलो राम राम राम
बोलो राम राम राम, बोलो राम राम राम .. "






राम शताधिक वर्ष से,
घर को थे मुहताज।
अब आये निज सदन में,
रामलला-रघुराज।।

जीत हो गयी सत्य की,
झूठ गया है हार।
राम नाम की विश्व में,
होती जय-जयकार।।




आज बस
कल सखी आ सकती है
सादर

रविवार, 21 जनवरी 2024

4012 ..देश की गलियों के कुत्ते-बिल्लियों को भी पता थी कि ये लोग मंदिर नहीं जाएंगे !

सादर अभिवादन

आज से उत्सव प्रारंभ
कल विराजेंगे राम लला
पूरे दरबार के साथ
******
छोटा सा किस्सा
यदि आप शराब पीकर
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च
नहीं जाते हो तो
घर कैसे जाते हैं
जहाँ आपको जन्म देने वाली
माँ रहती है,
प्यार करने वाली बहन रहती है,
सम्मान देने वाली पत्नी रहती है,
साथ निभाने वाला भाई रहता है
और सहारा देने वाला पिता रहता है
घर भी तो एक मंदिर है|

अब रचनाएं देखें...



आस का सूर्य जब निकला
मिटा है क्लेश भी गहरा....
सिया रघुवर भवन आये
परम पावन चरण लाये
गुणों के धाम राघव नाम
मनोरम मंत्र है प्यारा....





अयोध्या जाने से इंकार करने वालों की फोटो, उनके ब्यान मीडिया रोज ऐसे दिखा-बता रहा है जैसे कोई बहुत बड़ी घटना हो गई हो, यह बात तो देश की गलियों के कुत्ते-बिल्लियों को भी पता थी कि ये लोग मंदिर नहीं जाएंगे ! सारा देश जानता है कि ऐसे लोगों का ना कोई धर्म है, ना ईमान, ना नैतिकता है ना कोई विवेक ! इनका एक ही ध्येय है कुर्सी ! है तो बचाए रखो नहीं है तो उसको पाने के लिए देश तक की परवाह ना करो !

अविवेक, अहम्, घमंड, सत्तामद जब सर पर सवार होते हैं, तो मनुष्य अधमावस्था को प्राप्त हो जाता है ! मदांधता में  पतन अवश्यंभावी है चाहे वह कोई सम्राट हो, ऋषि हो, ज्ञानी हो, रावण हो या फिर शंकराचार्य ही क्यों ना हो ! आदि शंकराचार्य जी को यह कल्पना जरूर रही होगी कि भविष्य में मेरी धरोहर अयोग्य हाथों में भी जा सकती है पर उस वक्त पीठों का निर्माण भी अति आवश्यक था !




उमड़ते हर्ष के बादल
झड़ी आँसू की लगती है
पधारे राम फिर कोशल
दीवाली देख मनती है
सभी भूले हैं सुध-बुध आज
अवध को जो सजाना है।
स्वप्न जो था कभी मुश्किल
हुआ अब वो पुराना है




श्रीराम का त्रेतायुग में दिया गया भावी शासकों के प्रति सन्देश आज भी कितना सार्थक है-
"भूयो भूयो भाविनो भूमिपाला: नत्वान्नत्वा याच्तेरारामचंद्र
सामान्योग्य्म धर्म सेतुर्नराणा काले-काले पालनियों भवदभि:"





जिस दुनिया में औरतों को इंसान होने भर की इजाज़त नहीं मिलती। उसे उसी दुनिया में ईश्वर होना था। ऐसा ईश्वर जिसे पाप का भय नहीं था। कृष्ण की तरह। ‘तुम सब छोड़ कर मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हारे सारे पाप क्षमा करता हूँ।’

सारे इकट्ठा हुए पाप जाते कहाँ थे? क्या उसकी दुनिया का चित्रगुप्त दारू पी कर हिसाब में गड़बड़ कर रहा था?


सदियों से दशकों का
दशकों से वर्षो का
वर्षों से महीनों का
महीनों से दिनों का 
इंतजारआखिरकार 
खत्म होने को है।
अब बस कुछ घंटे शेष,
भगवान राम आने को हैं।

आज बस
कल फिर
सादर

शनिवार, 20 जनवरी 2024

4011 ..राममय हुई धरती सारी

 सादर अभिवादन

बस दो दिन और
फिर अयोध्या में मौज ही मौज
मिली - जुली रचनाएं देखिए



दरवाजा खुला।
"इतनी रात कहां कर दी।" अब्बू गुस्से से आगबबूला थे।
"कार्यक्रम ही लंबा खिंचा। क्या करती ?"

"क्या था कार्यक्रम? "
"राम भजन संध्या।" तसल्ली से बैठते हुए बेटी बोली।
"अरे! तुमने गया राम भजन?

"हां हां...फिर पर्स से नोट निकालते हुए वह गिनने लगी, एक दो तीन.....नोटों की चमक से,
अब्बू की आंखें चुधिंया गईं, "तू तो नात-ए-पाक कव्वाली गाती थी, फिर राम भजन....?"




विधना के भी खेल निराले
राम लला का घर छूटा।
देख पीर श्री राम लला की
जन-मन का हृदय टूटा।
विराम हुआ संघर्ष देख अब
राम नाम का कीर्तन हो।




आज के इस ज़माने में
हर आदमी का
अपना एक मकान होना चाहिए
मुक़ाम मिले ना मिले
मकान मिलना चाहिए
ज़िन्दगी दर बदर की ठोकरों से
गुलज़ार है
दिन में ख़ामोशी तो
रात में आँसुओ की दूकान है



सर्पगंधा एक पौधा है जिसकी जड़ों का रंग पीले या भूरे रंग का होता है। वहीं, इसकी पत्तियों का रंग चमकीला हरा होता है और ये हमेशा तीन-तीन के जोड़े में होती हैं। इसके फूल का रंग सफेद और वायलेट होता है। ऐसा माना जाता है कि इस पौधे को घर में लगाने से सांप नहीं आते हैं। साथ ही इसे सांप के काटने पर दवा की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका वैज्ञानिक नाम रावोल्फिया सर्पेंटिना 
(Rauvolfia serpentina) है। इसे इंडियन स्नेकरूट के नाम से भी जाना जाता है। 
सर्पगंधा की जड़ को पीसकर इसके पाउडर को खाने के लिए भी उपयोग किया जा सकता है।




राममय हुई धरती सारी
हर्षित हैं खग, मृग, नर- नारी
महा उत्सव की करो तैयारी
आरती थाल करो तैयार
श्री राम आयेगें हमारे द्वार
मिष्ठानों के भोग बनाओ
दीप जलाओ घर - द्वार


आज बस
कल फिर
सादर

शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

4010...साफ़ पानी के अक्स की तरह चमकना सीख...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.सुशील कुमार जोशी सर की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

शुक्रवारीय अंक में पढ़िए आज की पसंदीदा रचनाएँ- 

1.  

कितना बहकेगा तू खुद उल्लू थोड़ा कभी बहकाना सीख

कदम दिल दिमाग और जुबां लडखडाती हैं कई बिना पिए

थोड़ा कुछ कभी महकना सीख

दिल का चोर आदत उठाईगीर की जैसी बताना मत कभी

साफ़ पानी के अक्स की तरह चमकना सीख

 आखें बंद रख जुबां सिल दे

उधड़ते पल्लुओं की ओर से मुंह फेर कर

फट पलटना सीख

2. 

तस्वीर की विशेषता

तस्वीर बनी बेहद  सुन्दर

उसकी कोई सानी न थी

रंगों का अदभुद ताल मेल

किसी अन्य से न था।

3. 

यही होता आ रहा है

मुझे पता  था

घूम फिर कर मुझ पर ही आएगा

रिश्तें के टूटने का दोष

4. 

दुख का रुमाल 

इस सर्दी में कंबल ज़रा-सा सरका

तो सुन्न पड़ गया अंगूठा

हवा के साथ सुर्र से घुस आई

तुम्हारी याद दुख बनकर

कोई सुख ओढ़ाने नहीं आया।

5. 

हमरा नहि भेटल भगवान

 
कतेक बेर ई सुनल दुबारा, छथि सभहक भगवान सहारा।

घर - घर मे पूजन भगवन के, तैयो दुख मे लोक बेचारा।

परमपिता ई कोना देखय छी, पिता-धर्म के नित अपमान??

आन लोक केँ-----

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

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