निवेदन।


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मंगलवार, 24 जनवरी 2023

3648 ...बागों में क्या-क्या गुज़रा क्यों नहीं बताती हो तितलियाँ

 सादर अभिवादन

कपूर....
आजकल बाजार मे जो कपूर उपलब्ध है, भले वह टिकिया वाला हो या डल्ले वाला उसमे करीब 99% कपूर पैट्रोलियम से संश्लेषण द्वारा प्राप्त कपूर, अर्थात नकली कपूर ही होता है।
देशी कपूर, जिसे भीमसेनी कपूर भी कहते हैं, अब बड़ी कठिनाई से मिलता है।
वह एक पेड़ से निकाला जाता है, व बहुत महंगा होता है।



जिस पेड़ से यह प्राप्त होता है उसे ड्रायोबैलानॉप्स ऐरोमैटिका कहते हैं। यह डिप्टरोकार्पेसिई कुल का सदस्य है जो सुमात्रा तथा बोर्नियो आदि में स्वत: उत्पन्न होता है।

अब देखें रचनाएँ ....


उम्र भर का आशना, आईना भी निकला ग़ैर,
बेमानी है खोज, यहाँ कोई भी नहीं तलबगार,
 
पत्थरों के शहर में, इक शीशा ए मुजस्मा हूँ,
हर मोड़ पे हैं नक़ाबपोश  मुहज़्ज़ब संगसार ।




ये सच है कि मेरे सपनों में
जादू वाली परियां आती थीं बचपन में
मगर उनका चेहरा ग़ायब हो जाता था भोर से पहले
तुम्हारा होना किसी भोर के सपने का सच होना लगता है




चाँद के आने से पहले
सूरज के ठहरने तक
चिड़ियों की पुकार पर
ऋतुओं के बदलने तक
बागों में क्या-क्या गुज़रा
क्यों नहीं बताती हो तितलियाँ?




हम सच को स्वीकार नहीं करते
वरना साफ़-साफ़ कह देते
हम मंदिर आते हैं खुद के लिए
हे ईश्वर ! हम तुमसे प्रेम नहीं करते
शब्दों को एक-दूसरे के साथ बिठाकर
गढ़ लेते हैं प्रार्थनाएँ




जिन्दगी की छोटी
छोटी खुशियाँ भी
भिगो जाती हैं तन मन
सबके
कर देती हैं आत्मा तृप्त ,
नाच उठता है सम्पूर्ण मन
जन -जन के


आज बस
सादर

सोमवार, 23 जनवरी 2023

3647 / आँचल और धूप

 

नमस्कार !   आज २३ जनवरी  है .... नेता जी सुभाष चन्द्र  बोस की जयन्ती .१८९७  में उनका जन्म कटक (उड़ीसा )में हुआ था ....... इन्होने आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया था .......इनका दिया - "जय हिन्द "  का नारा हमारा राष्ट्रीय नारा है ...... आज इस मंच से हम इनको याद करते हुए नमन करते हैं . 

जय हिन्द !

अब लिंक्स की ओर .......

अब सर्दी कुछ कम हो चली है ....... इस बदलते मौसम में  आइये पढ़ें कुछ बेहतरीन रचनाएँ ..... अब सच में आपको पसंद आती हैं या नहीं ये मुझे नहीं मालूम ...... बस जो मुझे पसंद आती हैं उनको यहाँ ले आती हूँ आप सबको  पढ़वाने के लिए ...... एक समसामयिक विषय पर जागरूक करता लेख आप सबको भी  पढ़ना चाहिए और हो सके तो आवाज़ भी उठानी चाहिए ..... 

खेलने का फैसला करने से लेकर खेल के मैदान तक सफर


कुश्ती के अखाड़े में जिन शेर और शेरनियों को लड़ते हुए देखते थे उन्हें आज जंतर मंतर पर अपने स्वाभिमान,अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ना पड़ रहा है। इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा? जिनका एक एक पल बेशकीमती होता है वे आपना वक़्त अपनी प्रतिभा को देने के बजाय जंतर मंतर पर बर्बाद करने पर मजबूर हो रहें हैं

हालांकि जहाँ तक मुझे जानकारी है कि इस पर सरकार ने ध्यान दिया है शायद अब तक समस्या सुलझा भी ली होगी ..... लेकिन प्रश्न तो ये है कि ऐसी नौबत ही क्यों आई ?  खैर ..... अब रही बात  लड़कियों को खेल के मैदान में भेजने की  ,तो आज की लड़कियाँ स्वयं में सक्षम हैं कि ऐसे लोगों का सामना कैसे किया जाये ............. आज की लड़कियाँ भले बुरे को समझती हैं .......... यहाँ तक  कि वो अपने बड़ों को भी समझाती  हैं ...... इसी सन्दर्भ में पढ़ें ये  कहानी -



    सुबह के पाँच बजे हैं, सुमित्रा अभी-अभी फूल तोड़कर लौटी है, उसकी बेटी कनेरी फूलों की डलिया ले कर, फूल तोड़ने के लिए निकल रही है, आज डलिया भरकर फूल चुनकर ही लाना है, अम्मा के लिए, वह आज देवी जी का दरबार सजाने के लिए, भर -भर के माला बनाएगी, मंदिर में भंडारा भी है, कनेरी का भाई केशव कई दिनों का बाहर गया, अभी तक लौटा नहीं है, वो रहता था तो ठेला भर के फूल और कलियाँ लाता था.. क्यों न! उसे भोर में तीन बजे ही मोहल्ला-मोहल्ला, गली-गली में फूलों वाले घरों में चोरी ही करनी पड़े,

छोटी - मोटी चोरी करते करते आदतें कितनी बिगड़ जाती हैं इसका अहसास तब होता है जब पानी सर से गुज़र जाता है ..... आज कल एक और चर्चा का विषय बने हुए हैं  " धीरेन्द्र  शास्त्री " ....... क्या सच है क्या झूठ ...... नहीं पता  . लेकिन इस पर कुछ विचार तो आ ही रहे हैं ...... 


हर व्यक्ति वैज्ञानिक नहीं होताउनकी सोच भी वैज्ञानिक नहीं होतीइसलिए हम कितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएँआधिकांश आम लोगों में अंधविश्वासचमत्कार और पाखण्ड के प्रति आकर्षण बना ही रहेगा। अंधविश्वासचमत्कार और पाखण्ड का धर्म से कोई सम्बंध नहींतथापि यह बहुत से लोगों की जीवनशैली हो सकती है। मनुष्येतर प्राणियों में यह सब नहीं होताउन्हें इस सबकी आवश्यकता भी नहीं हुआ करतीतो क्या इसकी आवश्यकता केवल मनुष्यों को ही हुआ करती है?

सच तो यही है कि लोग चमत्कार के प्रति आकर्षित तो होते हैं .......अक्सर कहते सुना जाता है कि इस मंदिर की मानता  बहुत है ..... हर इच्छा पूरी होती है .......... फलाने बाबा सारी इच्छा पूरी करते ...... मैं सोचती हूँ कि यदि सच ही ऐसा है तो फिर भी लोग कष्ट क्यों पाते हैं ?  मैं किसी की आस्था पर चोट नहीं कर रही ........  आप तो आगे की रचना पढो ...... 


हम सच को स्वीकार नहीं करते 

वरना साफ़-साफ़ कह देते

 हम मंदिर आते हैं खुद के लिए 


कितनी आसानी से सहजता के साथ ये बात कह दी अनीता जी ......मंदिर भी जाते हैं तो हम स्वयं के लिए ... बहुत कम ही होता है कि लोग अपने से इतर दूसरों के लिए सोचें ....... और जो सोचते हैं वो फ़रिश्ते से कम नहीं ...... ऐसी ही एक लघु कथा आप पढ़िए .


ये दोस्त और दोस्ती !

बस एक दोस्त था और उसकी माँ थी , जिसने अपनी माँ के बचपन में ही चले जाने पर उसे दीपक की तरह ही प्यार दिया था। स्टेशन पर लेने के लिए विजय को दीपक ही आया था क्योंकि उसे विजय से मिले हुए बहुत वर्ष बीत गए थे।

       अब दोनों ही रिटायर्ड हो चुके हैं। विजय ने ट्रेन से उतरते ही दोनों हाथ फैला दिए गले लगाने के लिए |

इस कथा के साथ ही एक पौराणिक कथा भी मिल गयी पढने के लिए ..... वहाँ भी कुछ दोस्ती की बात है ..... 

अश्वत्थामा हतो.......! जैसा वाकया पहले भी एक बार घटित हो चुका था


अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा ! महाभारत युद्ध की इस बहुचर्चित घटना की तरह का एक वाकया इसके बहुत पहले भी एक बार घटित हो चुका था ! संयोग से उसके केंद्र में भी श्रीकृष्ण ही थे ! बात उस समय की है जब श्रीकृष्ण के हाथों कंस वध हुआ था ! इस बात से क्रोधित हो कंस के ससुर व मित्र जरासंध ने प्रतिशोध लेने के लिए मथुरा पर हमला कर दिया था ! जरासंध की सेना में दो अपार शक्तिशाली सेनानायक हंस और डिम्भक थे ! 


एक तरफ दोस्ती में लोग न जाने क्या क्या कर जाते हैं ...... दूसरी ओर लोग रिश्ते भी नहीं निभा पाते हैं ....... खैर यहाँ मैं रिश्तों के न निभाने की बात नहीं कर रही , बात कर रही हूँ तो ज़िन्दगी निभाने की ....... जी हाँ ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी ही निभाई जाती है और उसको निबाहने के अलग अलग तरीके खोज लिए जाते हैं ....एक ऐसी ही कहानी जो गहराई तक सोचने पर मजबूर कर दे कि आखिर क्या है ज़िन्दगी ? 


हँसी पसंद माँ की बेटीएक मेरी माँ,सोच-समझकर हँसती और इसी बिना पर डाँटते हुए मुझ से कहती थीं,"नानी की तरह सारा दिन हँसती हो,ज़रा तमीज़ सीखो कृपा। ज्यादा हँसना उस दुःख को मौन पीना है जो अपने हिस्से का होता ही नहीं।” ऐसा मेरी माँ को लगता था। जबकि हर छोटी-बड़ी बात पर मैंने नानी को हँसते हुए ही देखा थासो हँसना मुझे अच्छा लगने लगा था। हालाँकि धीरे-धीरे जब मेरा अनुभव पका तो ज्यादा हँसनेबेबात के हँसनेफ़ालतू में हँसने और अति-हँसने में अंतर समझ आया। और ये भी कि नानी को कोई भी दुखदुःखी नहीं कर सकता और सुखहँसी से ज्यादा कुछ दे नहीं सकता। इसीलिए शायद उन्होंने सुख-दुःख को हँसी के भाव तौल लिया था।


इस हँसी में कितनी पीड़ा रही होगी ये तो  आप कहानी पढ़ कर समझ ही गए होंगे ....  माँ का ज़िक्र हुआ है तो एक रचना माँ को समर्पित  और पढ़िए ....... आज भी माँ के आँचल की  छाँव की चाह बनी हुई है ..... 


पवन प्रकंपित थम जाता माँं!

लट में तेरे अलकों के।

और दहकती अग्नि ठंडी,

तेरी शीतल पलकों में।

माँ को याद करते हुए  ले चलती हूँ  आपको सुबह की सैर पर ....... पढ़ कर एक बार तो सर्दी महसूस कर झुरझुरी आ ही जाएगी ....... मुझे तो आई .......

जनवरी की एक सर्द सुबह


जनवरी मास की एक सर्द सुबह। ठंड अपने शबाब पर है। मेरी घड़ी में 5 बजकर 20मिनट हो रहे हैं। मैं यहां पार्क की एक बेंच पर बैठी सामने के वृक्षों के पत्तों से टपकती ओस की बूंदों को निहार रही हूं।इतनी जबरदस्त ठंड में भी ओस की बूंदें मुस्कुरा रही हैं और पत्तों से टपककर अपनी जिंदगी कुर्बान कर दे रही हैं। चूंकि सर्दी का सितम बहुत है, इसलिए पार्क में इक्का-दुक्का ही टहलने वाले लोग हैं |

पढ़ कर आँखों देखा वर्णन लगा न आपको ?  और इसके बाद की  सुनहरी  सी  धूप कितना आनंद देती है इसका अंदाज़ा तो होगा आपको ...... 

माघ की मरमरी ठंड को ओढ़कर,

धूप निकली सुबह ही सुबह सैर पर,

छूट सूरज की बाँहों से भागी, मगर

टूटे दर्पण-सी बिखरी इधर, कुछ उधर !

इस गुनगुनी धूप में अक्सर देखा है कि बच्चे पार्क में खेलते हुए पकड़ते हैं तितलियाँ ....... और जब कोई तितली आ जाती है हाथ तो कितना प्रसन्न  होते हैं ये वो ही अनुमान कर सकते हैं जिन्होंने बचपन में तितलियाँ पकड़ी होंगी ........ मैंने तो बहुत पकड़ी हैं ..... लेकिन कुछ लोगों की अजब गजब ख्वाहिश होती है ..... कभी सुना नहीं कि तितलियों का अलग से कोई टापू  भी होता है ........ खैर आप तो पढ़िए  ये कविता ..... 

तितलियों के टापू पर...


बेफ्रिक्र झूमती पत्तियों को
चिकोटी काटकर,
खिले-अधखुले फूलों के 
चटकीले रंग चाटकर
बताओ न गीत कौन-सा
गुनगुनाती हो तितलियाँ?

 अब आप तितलियों से प्रश्न पूछिये या धूप का आनंद लीजिये , .....  लेकिन  सब जगह यानि की लिंक्स पर  अपनी  छाप  छोड़ते जाइये  .......मतलब टिप्पणी दीजिये ...... यहाँ भी प्रतिक्रिया देनी न भूलें ..... मिलते हैं अगले सोमवार को ..... 

नमस्कार 
संगीता स्वरुप 




रविवार, 22 जनवरी 2023

3646....गंगा सा पावन मन लेकर भारत का परचम लहराते।

जय मां हाटेशवरी.....
एक बहुत लंबे अंत्राल के बाद.....
पुनः उपस्थित हूं.....
प्रयास रहेगा नियमित रहूं......
बिना देर किये पढ़ते हैं आप सब की बहुत खूबसूरत रचनाएं.....

मशाल जलते रहे - -
औराक़ ए ज़िन्दगी की थी अपनी ही अलग मज़बूरी,
कागज़ी फूल की तरह, इश्क़ का सिलसिला निकला,
बहुत दूर बियाबां पहाड़ियों पे हैं, कुछ बादलों के साए,
हद ए नज़र के उस पार, सदियों का फ़ासला निकला,
जलते आग पे हाथ रख कर ली थी अहद ए इन्क़लाब,
मशाल जलते रहे, लेकिन मीर ए कारवां बुझा निकला,



क्यों हो उसका उपहास -
तभी मैंने तुमसे अनुरोध किया
वह कोई खिलोना नहीं जिससे
खेला और फैक दिया ज़रा समझो |
मन को बड़ी ठेस लगती है
इस प्रकार के व्यबहार से
तुम्ही उसे समझा सकते हो
मुझे यही कहना है तुमसे |


मौनी अमावस्या
 स्नान दान कर हुए प्रफुल्लित
खुशियां जग फैलाएं
खुशी हुए परिवेश में
जाके, धारा विकास की लाएं।
रोग दोष ईर्ष्या विद्वेष से
मुक्त , भजन सब गाते
गंगा सा पावन मन लेकर
भारत का परचम लहराते।

माया के जो पार हुआ है
अहंकार का कोई स्थान ही नहीं है। अहंकार सदा अभाव का अनुभव करता है, जो है, उसे न देखकर जो नहीं है। उसकी कल्पना में मन को लगाता है। किंतु यदि उसे सारे संसार का वैभव भी प्राप्त हो जाए तो भी वह अभाव का अनुभव ही करेगा, क्यंकि वह कुछ है ही नहीं। आत्मा के साथ जुड़ने से मैं पूर्णता का अनुभव करता है। हर अभाव एक माया है और हर पूर्णता एक सत्य !  


छब्बीस दोहे "मुखरित है शृंगार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मिल जाती हैं आँख जब, तब आ जाता चैन।
गैरों को अपना करें, चंचल चितवन नैन।
--
मोती जैसी सुमन से, टपक रही है ओस।
सौरभ और पराग-कण, कलियाँ रहीं परोस.।


यादें उन दिनों की
 अब
इन दिनों
न तो वह शर्मीलापन है
धूप में ,
और न ही तुम्हारे आने की
आहट।
है तो बस
 शेष एकांकी
जीवन और प्रतीक्षा
भर।


फिर मिलेंगे।
धन्यवाद।

शनिवार, 21 जनवरी 2023

3645.. मौन

 
हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

ज्‍योतिषाचार्य का कहना है कि सिर्फ मुँह से न बोलना मौन नहीं होता। मौन वास्‍तव में आपके मन के शुद्धिकरण की प्रक्रिया का हिस्‍सा है। मौन का मतलब आपके अंतर्मन की शांत, स्थिर और निर्मल बनाने से होता है। इस दिन मौन रहकर व्‍यक्ति को अपने मन में भी किसी तरह के गलत विचारों को नहीं लाना चाहिए। शांत रहकर खुद के अंतर्मन में झांकना चाहिए और मन की अशुद्धियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए और एकाग्र होकर प्रभु के नाम का स्‍मरण करना चाहिए। यह एक तरह का तप जैसा है। अगर कोई व्‍यक्ति पूरे दिन मौन नहीं रह सकता तो कम से कम स्‍नान और दान पुण्‍य से पहले मौन व्रत जरूर रखे। इससे आपके अंदर की नकारात्‍मकता दूर होती है और आध्यात्मिकता का विकास होता है।

मौन

मौन भी आनंद है

मौन भी प्रकृति है

मौन भी अनंत है

मौन भी आयाम है

मौन भी आगाज़ है

मौन भी आवाज़ है

मौन

‘फैलेगा-फैलेगा हमारा मौन… समुद्र के पानी में नमक की तरह… नसों में दौड़ते रक्त में घुलता हुआ पहुंचेगा दिल की धड़कनों के बहुत समीप….और बोरी से रिसते आटे सा, देगा हमारा पता… हमारे मौन के धमाके से बड़ा उस वक्त कोई धमाका नहीं होगा. (मशहूर कश्मीरी कवि डॉ शशि शेखर तोशखानी की कविता की चंद लाइनें)!

मौन

धर्म रक्षा के लिए हथियार ना उठाओगे !!

आने वाली पीढियों को क्या मुंह दिखाओगे !!

विधर्मी के रक्त से ये धरा अब शुद्ध हो

कि अब जिहाद के खिलाफ एक धर्मयुद्ध हो !!

मौन

आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए ?

हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन :

बिना निशान की क़ब्रें

हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएँ

जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास

अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी

अठभुजवा

उनके पास कविता का कारखाना नहीं है। खेत है और बीज हैं। सिंचाई के लिए नदी का पानी है। लोहे के बन्द और लकड़ी से बना हाथा है, जिसके लिए उन्हें पहले बढ़ई के पास जाना पड़ा और फिर लोहार के पास भी। कुल मिलाकर वह 'हाथा मारने वाले' लेखक हैं। 

"काग़ज़ पर मैं उतना अच्छा नहीं लिख पाता

इसलिए खेत में लिख रहा था

अर्थात हाथा मार रहा था।"


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पुनः भेंट होगी...
>>>>>><<<<<<

शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

3644...उम्मीद की एक किरण

 शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।

-------
हम जीवन में अपने लक्ष्य को हासिल कर पाते हैं या नहीं यह पूरी तरह से हमारी सोच पर ही निर्भर करती है। असल में हमारी सोच ही हमारा असली व्यक्तित्व और व्यवहार है जो भौतिक रूप में बाहर निकल कर प्रतिबिंबित होती है।  वास्तव में हमारी सोच हमारे व्यक्तित्व का प्रतिबिंब है।

आज की रचनाओं की कड़ी----
संसार की खूबसूरती प्रकृति है और मनुष्य जीवन भी प्रकृति से ही संभव है। हम जितने प्रकृति के निकट होंगे, उतने सकारात्मक होते जाएंगे।प्रकृति से जुडाव होने पर विचारों में सकारात्मक आती है, सकारात्मक विचारों से दिमाग के सीखने की क्षमता पर असर डालते हैं ।
 सकारात्मक होना यानी अप्रिय नहीं सोचना।
प्रकृति से प्रेम का अर्थ जीवन की विपरीत
परिस्थितियों पर भी सकारात्मक दृष्टिकोण

लेकिन उम्मीद की एक किरण
भीतर रखता है 
और इसी उम्मीद पर
एक नया यौवन नये श्रृंगार....
बल्कि अद्भुत श्रृंगार के साथ
पदार्पण करता है
ऊर्जा की एक धधकती लौ फूटती है 

भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका
 मानी गई है। गुरु की सन्निधि, प्रवचन, आशीर्वाद और अनुग्रह जिसे भी भाग्य से मिल जाए उसका तो जीवन 
उजाले से भर उठता है। क्योंकि गुरु बिना न 
आत्म-दर्शन होता और न परमात्म-दर्शन।परंतु 
यह भी विचारणीय है कि ज्ञानहीन, आंडबरयुक्त
 गुरु से थोथा ज्ञान ग्रहण करने से अच्छा है
स्वयं के आंतरिक शक्ति को जागृत करना।


उन्होंने महसूस किया कि इंसान को जीवित रहने के लिए शुद्ध हवा में साँस लेना सबसे आवश्यक है , उन्हें दिन में चार पाँच बार प्यास लगती और भूख सिर्फ़ एक बार, खाने में जो फल, मूल, पत्ता, जीभ को कड़वा लगता उसे थूकना पड़ता था उन्होंने उसे हमेशा त्याज्य माना और जो मीठा लगा उसे खाने योग्य !
 


व्यस्ताओं की चहलकदमी में
सोंधी ख़ुशबुएँ जाग रही थीं 
किसी की स्मृति में 
शब्द बौराए हुए उड़े जा रहे थे 
ठंडी हो रही साँझ के लिए
गर्माहट की ललक में 
धूप की कतरन चुनती हुई
अंधेरों में खो जाती हूँ...।

भोर की भाग-दौड़

और व्यस्त सी दिनचर्या से

चुरा के फ़ुर्सत के दो पल

मैं जब तक..,

पहुँचती हूँ खिड़की के पास

 तब तक ..,



हर साँस के साथ उनको/महसूस करते है
जैसे महसूस होती है हवा/अदृश्य प्राणवायु की तरह
जैसे महसूस करते है/अपने रब्ब के वजूद को
खुली बंद पलकों में/जैसे महसूस करते है
धड़कते हुए सीने को/वैसे ही चलती साँसों के
साथ उनको महसूस/कर सकते है...।
इतनी शिद्दत से एहसास महसूसने के बाद तो
हर सवाल व्यर्थ है...

रोज़ बनता है सबब उम्मीद का,
ज़िन्दगी फिर बे-सबब कैसे लगी.

दिल तो पहले दिन से था टूटा हुआ,
ये बताओ चोट अब कैसे लगी।


और चलते-चलते
किसी ने सही कहा है कि हिमालय से ऊंची और सागर से गहरी होती है माँ की ममता। माँ जैसे पवित्र शब्द में संपूर्ण ब्रह्मांड समाया है। माँ के वात्सल्य भरे आँचल के सामने आकाश भी छोटा नजर आता है। एक विशाल मंदिर के समान होता है माँ का निर्मल हृदय जो विषम परिस्थितियों की परछाईं में भी कलुषित नहीं होती...।

उनकी जब डोर कटी होगी तो उन्हें किसी छत का सहारा नहीं मिला होगा। गर्भनाल कटाते मुझे किसी को सौंप दिया या कुछ महीने अपने पास भी रखा, यह तो मैं नहीं जानता लेकिन इतना जानता हूँ कि मुझसे मिलने के लिए वो भी अवश्य तड़पती होंगी।"
"कैसे इतना विश्वास करते हो?"
"मुझे जिसने पाला उसने अपनी अंतिम सांस लेते हुए कहा!"
"क्या उसने यह नहीं बताया कि तुम्हारी माँ कहाँ रहती है?"


_____////_____

आज के लिए इतना ही
कल का विशेष अंक लेकर
आ रही है प्रिय विभा दी।

---------








गुरुवार, 19 जनवरी 2023

3643...लावारिस बच्चे जब देखे ख़ैर मनाना सीख लिया...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ (सुश्री) शरद सिंह जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

नए गुरुवारीय अंक में पाँच चयनित रचनाओं के लिंक्स के साथ हाज़िर हूँ।

आइए अब पसंदीदा रचनाओं का रसास्वादन कीजिए-

सच्चा मोती

कुछ ही ऐसे मोती  होते

जिन में आव स्थाई रहती

यही स्थाईत्व बहुत कम

जिन मोतियों में रहता वे ही सच्चे होते .

६९२. बूढ़ी सड़क

अब यह सड़क जगह-जगह से

टूट-फूट गई है,

किसी काम की नहीं रही,

पर अच्छा नहीं लगता

कि कोई सड़क इस हाल में रहे.

शायरी | ग़ज़ल | सीख लिया | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अपने  ही  ख़्वाबों  से  मैंने

अब  कतराना सीख लिया।

लावारिस  बच्चे  जब देखे

ख़ैर  मनाना  सीख  लिया।

काँटों का घेरा - -

रिश्तों की तर्जुमानी है बस लफ़्ज़ों का

हेर फेर, गुलाब के दामन में रहता
है काँटों का घेरा, हृदय पिंजर
में कहाँ रुकता है सुख -
पाखी, आँखें खुली
शून्य हुआ
रैन-
बसेरा।

एक बरस बीत गया

एक बरस बीत गया

जीवन-घट जल अधिकांश बीत, रीत गया 

पहुँचे सभी को प्रणाम और जुहार विनत

बोले-अनवोले मीत,पांथ-पथिक संग-नित,

*****

फिर मिलेंगे।

 रवीन्द्र सिंह यादव


बुधवार, 18 जनवरी 2023

3642.. कटघरे में शमा है..

 ।।उषा स्वस्ति।।

"रवि-मोर सुनहरा निकला,

पर खोल सबेरा नाचा,

भू-भार कनक-गिरी पिघला,
भूगोल मही का बदला ।
नवजात उजेला दौड़ा,
कन-कन बन गया रूपहला !"
केदारनाथ अग्रवाल
बदलते मौसमों के मिज़ाज चमकीली धूप, बर्फीली हवाओं संग संवाद की अलग अंदाज से रूबरू होइए..✍️
🔶
ये बूढ़ा मन काँपने सा लगता है......। 

खुशियों के चमन के फूलों की पाँखेँ 
काँटों से सजी सेज हो जाती है......
🔶

गंगा को सागर होना है।

 काल चक्र के महा नृत्य में,

नहीं चला है किसी का जोर।

जितना नाचें उतना जाने,

जहां ओर थी, वहीं है छोर।

🔶

                   कुछ शेर 


मेरे सुकून भरे लमहों में क्यों आते हैं ख़याल तेरे 
मेरी सोई हुई तड़प को क्यों जगा जाते हैं याद तेरे
जैसे सारी रात परेशाँ रहती मैं,रहतीं पलकें बोझल 
वैसे तेरे भी ख़्वाबों में शब भर करें तफ़रीह याद मेरे ।
🔶
आज चिरागों पे मुकदमा है ।

फैसला सुनने की खातिर
उजालों की भीड़ जमा है ।

परवानों के कत्ल का इल्जाम 
और कटघरे में शमा है ।
🔶

बहुत ही कठिन है प्रणयी हृदय होना, - -
लोग आकाश की तरह अपने
वक्षस्थल में समेटना
चाहते हैं सितारों
का समारोह,
चाहते हैं
अदृश्य
मालिकाना हक़, कौन समझाए उन्हें - -
रूह होती है आजन्म उन्मुक्त,
चाँदनी रात की तरह ढल
जाता है चार दिन में..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह'तृप्ति'..✍️
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