सोमवार शुभ हो
सीधे चलते हैं रचनाओं की ओर..
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
यथायोग्य सभी को प्रणामाशीष
दुनिया कहती है...
जिसका 'उदय'होता है,
उसका 'अस्त' होना तय है!
लेकिन
"छठ पर्व" सिखाता है़,,
जो 'अस्त' होता है..
उसका 'उदय' तय है।
विश्व को सन्देश बिहारियों की ओर से...

कहते हैं ढ़ाई दिन के लिए धरा आँगन बेटी मायके आती हैं ... छठ के पारण के प्रसाद के संग
मैंने देखा था उसे
खिड़की से बाहर तांकते हुए
शून्य में
आखिर उसे शून्य से ही
शुरुआत करनी होंगी
रिश्ते-नाते
घर-परिवार
यहाँ तक कि जिन्दगी भी
तन और मन मैंने साथ लिया है, बचपन सारा यहीं छोड़ दिया है,
नही चाहिए कोई भी हिस्सा, पर खत्म भी न मेरा किस्सा।
आए जब कोई तीज त्यौहार, मुझे याद कर लेना एक बार,
मन में उठे जब कोई हिलोर, हम आ रहें बस कह देना एक बार।
वह अपने को संयत रखने की भरसक कोशिश कर रहा था
पर उसके आँख की कोरें बार बार भीग जाती थीं
वह रूमाल को चश्मे के कोनों के पास लाकर
चुपके से उन्हें पोंछ लेता था
वह घर के सामने बैठे तीनों दोस्तों की ओर
देखने से बच रहा था
विकास -'यार अविनाश... सबसे पहले घर पहुंचते ही होटल अमृतबाग चलकर बढ़िया खाना खाएंगे...
यहाँ तेरी ससुराल में खाने का मज़ा नहीं आया।' तभी पास में खड़ा अविनाश का छोटा भाई राकेश बोला -'हा यार..पनीर कुछ ठीक नहीं था...और रस मलाई में रस ही नहीं था।' और वह ही ही ही कर जोर जोर से हंसने लगा। अविनाश भी पीछे नही रहा -'अरे हम लोग अमृतबाग चलेंगे, जो खाना है खा लेना... मुझे भी यहाँ खाने में मज़ा नहीं आया..रोटियां भी गर्म नहीं थी...।'
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अमृता तन्मय जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
दुनिया से मिलकर चलना
सिखा देता है व्यापार,
मुनाफ़ा प्रलोभन वक़्त
बनते कारोबार का सार।
-रवीन्द्र
आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-
बीती बातों को बारम्बार याद करना
उन्हें विस्मृत न होने देना स्मृतिपटल से
दिमाग को व्यस्त रखने के लिए
यह तरीका भी काफी है
कवि के स्वर पन्नों पर.... कुसुम कोठारी
कविता जो रुक जाये तो फिर
कल्पक कब जीवित रहता
रुकी लेखनी द्वंद हृदय में
फिर कल्पना कौन कहता
मौन गूँजते मन आँगन में
कंपित से भयभीत हुये।।
रात बीत गई तब पिया जी घर आए.... अमृता तन्मय
उधर पिया जी बैठे मुँह लटकाए , गाल फुलाये
रह- रह कर बस हमें ही जलाये , और अपनी चलाये
संझावती की इस बेला में थकान ले रही कमरतोड़ अँगराई
इसी आपाधापी में तो हमने सारी उमरिया गँवाई
विचारों का क्रम.... अरुण चंद्र रॉय
प्रेम, घृणा
अन्धकार, प्रकाश
स्वतंत्रता परतंत्रता
भी कुछ और नहीं बल्कि है
विचारों की अभिव्यक्ति।
मेरी आन
बान
शान
है
तू
मेरे
तिरंगे
की
पहचान
है
तू
दुनिया सैनिक कहती है तुझे
पर मेरे दिल में तो तू
मेरे हर धरकन का एहसास है तू।
ख़ूब मेहनत करती हूँ
कि पिता-पति के लिए ख़रीद सकूँ
मान-सम्मान और स्वाभिमान।
परंतु फिर अगले ही पल
स्वयं से यही पूछती हूँ
कौन हूँ मैं ?
आज बस यहीं तक।
कल अपनी प्रस्तुति के साथ होंगीं आदरणीया श्वेता सिन्हा जी।
रवीन्द्र सिंह यादव