निवेदन।


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रविवार, 15 नवंबर 2015

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, समाज को प्रगति के रास्ते ले जाओ ..120

जय मां हाटेशवरी...

कल हमने बाल दिवस पर...
बेटियों पर बहुत कुछ सुना...
बहुत कुछ कहा...
हर वर्ष ही सुनते हैं...
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, समाज को प्रगति के रास्ते ले जाओ ...
विकसित राष्ट्र की हो कल्पना, बेटियों को होगा पढ़ना ...
इस प्रकार के संदेशों ने...
बेटियों के बारे में...
समाज की सोच में अवश्य ही परिवर्तन  लाया है...
आज समाज का हर वर्ग कह रहा है...
बेटी नहीं है किसी से कम, बेटी से देश को मिल रहा है  दम ...
बेटियों को बराबरी का दर्जा दीजिये, समाज में जागरूकता फैलाइये ।
इस आवाहन के साथ...
पेश है मेरे द्वारा प्रस्तुत आज की हलचल....


कविता मंच पर..
आँगन" - डॉ. धर्मवीर भारती
कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना
फिर आकर बाँहों में खो जाना
अकस्मात् मण्डप के गीतों की लहरी
फिर गहरा सन्नाटा हो जाना
दो गाढ़ी मेंहदीवाले हाथों का जुड़ना,
कँपना, बेबस हो गिर जाना
प्रस्तुत कर्ता: संजय भास्‍कर

माही....पर
जाने क्यों
जाने तुझमे क्या बात थी
जो तुम मुझे
अपने पास
वापस ले आये।
मैं फिर आई
तुम्हारी ज़िन्दगी में।
बस तुमको सुनने के लिये
मैं तुमसे बात करने लगी
बस तुमको देखने के लिए
तुम्हारी फोटो तुमसे मांगने लगी।
प्रस्तुतकर्ताः महेश बरमटे


कविताएँ...पर
बहस के बीच में

पुत गई थी उसके चेहरे पर स्याही,
मनाही के बाद भी जो बोलना चाहता था,
क़त्ल हो गया था किसी का अपने ही घर में,
खा लिया था उसने वह जो वर्जित था,
फेंक दी थी आग किसी ने खिड़की से,
ज़िन्दा जला दिया था सोते बच्चों को,
किसी भाई ने दबा दिया था बहन का गला,
ज़िद थी उसकी कि शादी मर्ज़ी से करेगी,
एक छोटी-सी बच्ची का अपनों ने ही
कर दिया था बलात्कार.
प्रस्तुतकर्ताः ओंकार


मेरी धरोहर
फिर से बचपन दे दे जरा.............. पुष्पा परजिया
निस्तब्ध निशा कह रही मानो मुझसे ,
तू शांति के दीप जला, इंसा जूझ रहा
जीवन से हर पल उसको
तू ढांढस  बंधवा निर्मल कर्मी बनकर
इंसा के जीवन को
फिर से बचपन दे दे जरा
प्रस्तुतकर्ताः यशोदा अग्रवाल



समाधान पर
आइए जानते है एक ऐसे महान क्रांतिकारी के बारें में जिनका नाम इतिहास के पन्नों से मिटा दिया गया
वीर सावरकर ने दस साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था जबकि गाँधी ने कालापानी की उस जेल में कभी दस मिनट चरखा नही चलाया..
#24. वीर सावरकर माँ भारती के पहले सपूत थे जिन्हें जीते जी और मरने के बाद भी आगे बढ़ने से रोका गया...
पर आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी विरोधियों के घोर अँधेरे को चीरकर आज वीर सावरकर के राष्ट्रवादी विचारों का सूर्य उदय हो रहा है।
प्रस्तुतकर्ताः विवेक सुरंगे


बेटी है अनमोल...
बेटी है स्वर्ग की सीढ़ी,
वह पढ़ेगी ,
तो बढ़ेगी अगली पीढ़ी ...
धन्यवाद...











शनिवार, 14 नवंबर 2015

बाल दिवस



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष



काश हम कभी बड़े नहीं हुए होते 
अपनों से गिले शिकवे नहीं हुए होते




आओ चाचा नेहरु आओ,
           सारे जहाँ को तुम बतलाओ ,
   खेल-खिलोने साथ छीन कर,
    क्यों सब हमे रुलाते है ,
भारी बस्तों और किताबो ,
में हमे उलझाते है ,




बचपन कितना सरल और भोला होता है..झूठ सच नहीं जानता || 
जिसने जैसा बताया मानता है  | 
विस्मित होता है किन्तु विश्वास करता है  
क्यूंकि उसके लिए दुनिया की हर चीज
 नयी और विस्मय से भरी होती है |




सुबह हुई नहीं कि दिमाग़ मे
शरारत का मीटर भागना शुरू!
शरारत मे मैं अपने
मोहल्ले का था गुरु!

कॉलेज तक मुझे भी चंडाल चौकड़ी का लिडिर कह देते थे शिक्षक 




आज जरूरत है कि बालश्रम और बाल उत्पीड़न की स्थिति से राष्ट्र को उबारा जाये। ये बच्चे भले ही आज वोट बैंक नहीं हैं पर आने वाले कल के नेतृत्वकर्ता हैं। उन अभिभावकों को जो कि तात्कालिक लालच में आकर अपने बच्चों को बालश्रम में झोंक देते हैं, भी इस सम्बन्ध में समझदारी का निर्वाह करना पड़ेगा कि बच्चों को शिक्षा रूपी उनके मूलाधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिये।




पर वो माँग रहा रेडलाइट पे सिक्का
जिसके लिए होगा लाखों का खर्चा।
जिसके खातिर भर दिये अखबारों के पन्ने
बाँट रहा वो बेख़बर चौराहों पे पर्चा॥




इस  बाल-दिवस पर  मंचो से।
 लफ़्फाजी    होगी   बार - बार। 
जयकारों  से  घिर ,  नेतागण, 
भाषण     उगलेंगे    लगातार।। 



शायद कुछ के जवाब ही मिल जायेंगे  ? 
हम बाल दिवस को बच्चो के दिन के रूप में मानते है , 
तो क्या आज हमने बच्चों को बच्चा रहने दिया है ?

कल भी किसी के पास जबाब नहीं था 
कल भी किसी के पास कोई जबाब नहीं होगा


फिर मिलेंगे
तब तक के लिए 

आखरी सलाम


विभा रानी श्रीवास्तव


शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

118........इक बार मुस्करा दो

सादर अभिवादन...
आज की प्रस्तुति
तसल्ली से....

सुनो ,
रूको, ठहरो दो पल और,
क्या करू? ये आँखें ना जाने
कब तृप्त होंगीं, कब छूटेगी
उस मोह से जो बँधा हैं तुमसे,
यकीन हैं, मर कर भी इस रूह में
प्यास रहेंगी बाकि, तेरे दीदार की; 

ये रही आज की चुनिन्दा रचनाओं की कड़ियाँ...


मन के - मनके में...
बदरंग हो रहे हैं हम-क्या हम जीवन को जीते हैं???
बहुत ही बे-तुका प्रश्न हो सकता है—लेकिन थोडा ठहर कर देखिये उस आइने में जिसे हम जीवन कहते हैं?


डॉ. हीरालाल प्रजापति में
नगीने सा मेरे दिल की 
अँगूठी में जड़ा था वो ॥ 
मेरे माथे की बिंदी था , 
कलाई का कड़ा था वो ॥ 


आकांक्षा में
आये अकेले इस जग में
जाना कब है पता नहीं है
पर अपनाए गए रिश्तों को
बिना विचारे ढोते ही जाना है


गिरीश पंकज में
दीपक उदास है क्यों, इक बार मुस्करा दो 
''ये जल उठेंगे तुम जो, इक बार मुस्करा दो'' 
खुशिया जो बांटते हैं धरती के हैं मसीहा
यह बात थोड़ी समझो, इक बार मुस्करा दो 


दिव्याश में
द्वेष कलुष की कालिख पोंछो
मंगल ध्वनि बजाओ
आँगन गलियों चौबारों संग
दिल में दीप जलाओ


सुबोध सृजन में..
रखना एक दिया
इस दिवाली पर
अंधे मन के आले में
कि हो कुछ उजाला
देख सकें
मसली-रौंदी कलियों की लाशें


चलते-चलते..... 
उल्लूक टाईम्स में नाक कथा
नाक बहुत काम 
की चीज होती है 
सभी जानते है 
पहचानते हैं 
नाक के बिना 
बनाया हुआ पुतला 
भी एक नकटा 
कहलाया करता है 


आज्ञा दें यशोदा को..
फिर मिलेंगे












गुरुवार, 12 नवंबर 2015

117...खील खिलाना है दीवाली का अनिवार्य अंग

दीप पर्व की शुभकामनाएँ
रात्रि के छठे प्रहर में
पूजा का महूर्त था
पूजा निर्विघ्न सम्पन्न हुई

कहते हैं न..
लालच बुरी बला होती है
सो कम्प्यूटर चालू किया
देखा  संजय भाई
पटाखे चलाने में व्यस्त हैं
रात के 3.45 हुए हैं अभी
फटाफट प्रस्तुति हाजिर है....



खोये हम जाने कब से रहे भटक तन्हा तन्हा हम
दिल की लगी को
दिल लगा कर
तुमसे
अब समझे हम 


इस बार दीपक वे जगें ,फैले उजाला प्यार का , 
अंत हो इस मुल्क में मज़हबी तकरार का ! 

हो मिठाई से भी मीठा , मुंह से निकले बोल जो , 
ये ही मौका है मोहब्बत के खुले इक़रार का !  


दिल कहां सीने में जैसे दुश्मने-जां हो गया 
आईने में देख कर सच को पशेमां हो गया 
हार कर भी तो सबक़ सीखा नहीं कमज़र्फ़ ने 
ठोकरों की मार से मुंहज़ोर नादां हो गया 


राम 
मन मन्दिर विराजें, 
मन के आँगन से 
रावण निर्वासित हो जाये... 
दीपों के 
झिलमिल प्रताप से 
दृष्ट-अदृष्ट हर कोना 
सुवासित हो पाये... !! 


रूठी ख़ुशियों को फिर आज़ मनाते हैं 
झिलमिल उम्मीदों के दीप जलाते हैं 

जिनके घर से दूर अभी उजियारा है
उनके चौखट पर इक दीप जलाते हैं 


खील खिलाना अलग है
खिलखिलाना अलग है
खील खिलाना है दीवाली का अनिवार्य अंग
मुस्कुराना मानवता का मज़हब है


आज्ञा दें यशोदा को
सोने जा रही हूँ














बुधवार, 11 नवंबर 2015

116..दीप जल उठे... दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ...

जय मां हाटेशवरी...

आज भारत में ही नहीं...
सारे विश्व में...दीवाली या दीपावली अर्थात "रोशनी का त्योहार"...
हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है...आज से कई वर्षों पहले...
धरती से पापियों तथा अासुरी वृत्तियों  का सकल नाश करके...
चौदह वर्षों के घोर अँधेरे के बाद...सकल अयोध्या  में...
श्री राम के आगमन से...अलौकिक प्रकाश फैला था...

सागर मंथन से धन-धान्य की देवी, माँ लक्ष्मी...
आज के ही दिन अवतरित हुई थी...















ये भी सत्य है कि आज के ही दिन...
भगवान विष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था....











जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण आज के दिन ही हुआ था....

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के अनुयायियों ने 2500 वर्ष पूर्व
गौतम बुद्ध के स्वागत में लाखों दीप जला कर दीपावली मनाई थी...

इसी दिन 1577 में अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था...

और 1619 में   सिक्खों के छठवें गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को कारागार से रिहा भी  किया गया था...

कार्तिक अमावस्या से  पितरों की रात आरम्भ होती है...
कहीं वे मार्ग भटक न जाएं, इसलिए उनके लिए...
हर तरफ प्रकाश किया जाता है...

आर्य समाज की स्‍थापना के रूप में- इस दिन आर्य समाज के संस्‍थापक महर्षि दयानन्द ने...
भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया था...

इसी दिन  उज्जैन के सम्राट  विक्रमादित्य का राजतिलक भी  हुआ था...
विक्रम संवत का आरम्भ भी इसी दिन से माना जाता है...

यह नए वर्ष का प्रथम दिन भी है....
अतः हम कह सकते हैं कि...
दीपावली उत्सव ही केवल  सर्वधर्म सम्भाव का प्रतीक है...
ये पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाा रहा है...

आज हमारे समाज में
आतंकवाद, भ्रष्टाचार, जाति-प्रथा, धार्मिक विवाद,
नारी शोषण, भय, हिंसा, प्रदूषण, अनैतिकता,
आदि  विकराल रूप धारण कर रहे हैं...

अगर सही मायने में हम महसूस करें तो ये सब अंधकार ही तो है...
इन पर विजय पाने के बाद ही हम...
आदर्श राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं...
प्रकाश का पर्व दिवाली हर बार यही कहता है...
सभी प्रकार के अंधकार को दूर करने के लिये...
मानव मन में धर्म का दीप जलाना होगा।
आप सभी को पांच लिंकों का आनंद परिवार की ओर से...
महा पर्व दिवाली की असंख्य शुभकामनाएं...
अब चलते हैं...आज की प्रस्तुति की ओर...
देखिये आप के प्यारे-प्यारे लिंक...

यदि आप स्वयं या अपने बच्चों को शतरंज के गुर सिखाना चाहते है और एक अच्छी वेबसाइट खोज रहे है, तो ...
जी हाँ, महाभारत कालीन भारत का मानचित्र अमेरिका की कांग्रेस के पुस्तकालय में आज भी सुरक्षित है| ...
अंतरिक्ष के नित नए दृश्य देखें नासा की इस वेबसाइट पर
पसंदीदा रेडियो स्टेशन इन्टरनेट से यहाँ सुने ऑनलाइन
अपने मरने के बाद ई-मेल भेजना है, यहाँ लिख कर रखें
आगे पढ़ें...यहां ये सब कुछ है...



संज्ञा देते लोग ,किसान की मौत पर
अपनी मौत से भयानक मौत बयानों के फंदे में उलझ कर मर रहे हैं किसान
सरकार कहती है चिन्ता न करें किसान |वह उसके साथ है | जितनी बड़ी हो सकेगी, उतनी बड़ी सहायता देगी सरकार | मगर कब ? यह सरकार को खुद पता नहीं | आदेशों की लाइने रोजाना छप रही हैं कागजों पर, आदेश दौड़ रहे हैं पूरी गति से राजधानी से होते हुए कलेक्टर, तहसीलदार से होते हुए पटवारी तक, फसल के नुकसान का आंकलन करवा रही है सरकार |पटवारी के जिम्मे है फसल आकलन का काम पटवारी है कि चतुर प्राणी है राजस्व तंत्र का |गाँव की राजस्व सत्ता उसके हाथ में, जमीन-जायदाद गाँव में उसकी चलती है। वह कब किसके बाप को भूमि के पट्टे में दूसरे का बाप बना दे, और असली बाप का बेटा हाथ मलता रह जाए



दीप जलाते श्रवण ने प्रतिमा को कहा देखा प्रतिमा तुमने अपने अहं को छोड़कर माँ के अहं की रक्षा करके पूरे घर के वातावरण को सुखमय कर दिया।इसी अहं के कारण ही तो घर -घर में झगड़े हो रहे हैं जो परिवार को तोड़ने की कगार पर पहुंचा देते हैं ।"
"आप ठीक कह रहे हैं, पर इसका सारा श्रेय तो आपको ही जाता है।"
घर की मुंडेर पर दीप रखते हुए प्रतिमा बोली।
" ईश्वर से प्रार्थना है कि हमेशा इसी तरह खुशी के दीप जलते रहें" .....
 कहकर श्रवण ने प्रतिमा को गले लगा लिया। दोनों की आंखें खुशी से चमक उठी।




अब भी बची है
गंध व्यतीत की
शब्द-शब्द बोले हैं
रंग-रस घोले हैं
पृष्ठ-पृष्ठ जिंदा है
पृष्ठ अतीत की
फड़फड़ा उठे पन्ने
झांकने लगे चित्र
यादों के गलियारों से
पलकें हुईं भींगी
मत खोलो
पृष्ठ अतीत की


अपना स्वत्व भूल स्वयं जलती है
पर जग जगमग करती है
उसी भाव को अपनाओ
स्नेह के दीपक जलाओ
मेल मिलाप भाईचारा
हैं इस पर्व की विशेषता
मन से इनको अपनाओ

आज के पांच लिंक पूरे हुए...
विशेष पर्वों पर  हलचल तैयार करना...
थोड़ा कठिन होता है...
विशेष पर्वों पर...
प्रस्तुति भी विशेष होनी चाहिये...
मैंने भी हलचल को विशेष बनाने का...
प्रयास तो किया है...
अब अंत में...
हमे  विश्वास है
तुम्हारे वचन पर
होती है  जब-जब
धर्म की हानी
आते हो तुम
मानव बनकर
इस विश्वास से ही
मनाते हैं हम दिवाली...
धन्यवाद...

दो रचनाओँ  की कड़ियाँ मेरी ओर से भी
दीप पर्व की शुभकामानाओं के साथ...

आशा मौसी की प्यारी सी रचना..
हो मुदित  दीपक जलाओ
प्यार से उपहार लाओ
प्यार बांटो प्यार पाओ
इस क्षण भंगुर जीवन में
यही पल मधुर लगते हैं
इन्हें जियो जितना चाहो


मेरी नजर से में..रश्मि दीदी
कहा था तुमने
तुम अब तक हो
धरातल प्रेम का
और वहीं के होकर
चाहते हो रहना
मैंने कहा था प्रिय
तुम मुझ से ही हो
और
प्यार हो गया
......
भाई कुलदीप जी का अथक प्रयास
सराहनीय है
यशोदा..


मंगलवार, 10 नवंबर 2015

115...मगर हाँ भूल के नाली को तो नदिया न कहो

सादर अभिवादन..









आज काली चौदस है
सब इसे.. 

नरक चतुर्दशी 
के नाम से भी जानते है
पश्चिम बंगाल में आज
काली पूजा की धूम रहती है


चलिए ये रही आज की पसंदीदा रचनाओं की कड़ियां...


तीखी कलम से
चल  नकाबो  में  जमाने  की नज़र  पाक  नहीं ।
कीमती  हुश्न  ये  हो  जाए  कही  ख़ाक  नहीं ।।

अजनबी  बनके  गली  से  यूँ  गुजरना उसका ।
दिल जलाने की थी साजिश ये इत्तिफ़ाक नहीं ।। 


मगध सत्ता में
एक छोटी पर अर्थयुक्त कहानी
"बंटू आज सुबह उसे यह बतलाने आया था कि वह अब भी उससे शादी करना चाहता है लेकिन घर में तूफ़ान खड़ा हो गया है। वह उससे मैत्री रखेगा लेकिन शादी किसी और से करेगा। हालाँकि उसकी निमी से मैत्री को लेकर भी उसके घर में अब सबों को आपत्ति है।"


अभिव्यक्ति में
कभी नहीं तू घबराना 
आंधी हो या बारिश हो 
क़दमों को मजबूती से 
आगे आगे रखता चल 
ऐ मेरे दीपक जलता चल 
अंधियारे से लड़ता चल


मनोरमा में
गीत गाते रहे गुनगुनाते रहे
याद करके तुम्हें मुस्कुराते रहे
तेरे सपने सभी मेरे अपने हुए
जिन्हें आँखों में अपनी सजाते रहे


डॉ. हीरालाल प्रजापति में..
ज़रा सी बाढ़ को तुम यों ही ज़लज़ला न कहो ॥
दिये की लौ है इसको सूर्य - चंद्रमा न कहो ॥ 
कहो जो आए जी में आपके ख़ुशामद में 
मगर हाँ भूल के नाली को तो नदिया न कहो ॥


कविता रावत में
वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने।
अक्रोधिने देवपरे कृतज्ञे जितेन्द्रिये निम्यपुदीर्णसत्तवे।।
स्वधर्मशीलेषु च धर्मावित्सु, वृद्धोपसवतानिरते च दांते।
कृतात्मनि क्षान्तिपरे समर्थे क्षान्तासु तथा अबलासु।।
वसामि वारीषु प्रतिब्रतासु कल्याणशीलासु विभूषितासु।
सत्यासु नित्यं प्रियदर्शनासु सौभाग्ययुक्तासु गुणान्वितासु।।


अन्दाज़े ग़ाफ़िल में
फ़र्क़ क्या है के रात काली है
याद तेरी है तो दीवाली है

मद भरे चश्म का तसव्वुर कर
मैंने भी तिश्नगी मिटा ली है



इज़ाजत दें यशोदा को...
माँ काली की आरती गाते चलें


















सोमवार, 9 नवंबर 2015

114....आओ ऐसे मनायें दीवाली इस बार..

आज धनतेरस है














आयुर्वेद के महारथी
भगवान धन्वन्तरी जी की जयन्ती

आइए प्रणाम करें उनको..
और मांगे उनसे...
अपने कुल-परिवार की
आरोग्यता...
हम नीरोग हैं तो धनागमन
स्वयमेव हो जाएगा

मैं भी आज कुछ मांगती हूँ
भगवान धन्वन्तरी से
बड़े व स्थापित ब्लॉगर के पास
बुद्धि तो है ही..उन्हें सद्बुद्धि भी प्रदान करें
ताकि वे उभरते साहित्यकारों की

उपेक्षा न करें....वरन् सराहना करें
हम ब्लॉग एग्रीकेटर 
उन्हें सामने लाते हैं
ताकि वे भी साहित्य-जगत में
सही स्थान पा सकें


चलिए आज के सूत्रों की और....



आज रात चाँद इक महफ़िल में छा गया
धुन तो नहीं थी कोई मगर गीत गा गया

रोशनी में रोशनी दिखती नहीं मगर
दीपक जले अनेक तो रामराज्य आ गया


किसी के पढ़ने या 
समझने के लिये नहीं होता है 
लक्ष्मण के प्रश्न का 
जवाब होता है 
बस राम ही 
कहीं नहीं होता है
क्या जवाब दूँ 
मैं तुझे लक्ष्मण 
मैं राम होना भी 
नहीं चाहता हूँ 


खुशियों में सभी रंग जाये ,
आओ ऐसे मनायें दीवाली |
चंदा भी धरा पर आ जाये ,
आओ ऐसे मनायें दीवाली ||


मैं चाँद हूँ 
दागदार हूँ 
अनिश्चितता मेरी पहचान है 
कभी घटता कभी बढ़ता 
कभी गुम कभी हाज़िर 
मैं सूरज की तरह 
चमकता नहीं 


आधी रात के बीत जाने पर 
सुबह से कुछ दूर
एक पहर ठिठका खड़ा था...
टप टप बूंदों की झड़ी लगी थी...
वो उसमें भींग रहा था...


खुद को पहचानते नहीं जब 
पहचान माँगते है...... 
हम वक़त से कुछ ना सीखी 
वो ये बात जानते है ...... 
जो लोग रफ़्तार में है, जो 
उनकी नब्ज़ तो टटोलो 
वो छोटों के दोस्ती नहीं 
पर दुश्मनों को वो अपना 
मददगार मानते है....... 


शौक़ीन हूँ मैं 
तुम्हारे दिए संबोधनों 
वैश्या , कुल्टा और छिनाल की 

तुम्हारे उद्बोधनों का 
जलता कोयला रखकर जीभ पर 
बजाते हुए ताली 
मुस्कुराती हूँ जब खिलखिलाकर
खुल जाते हैं सारे पत्ते 




आज बस इतना ही
उत्सव का समय है
सबके पास काम भरपूर है
पर... साहित्यकार
उसके पास समय ही समय है

दीपोत्सव की अग्रिम शुभकामनाएँ
आज्ञा दें यशोदा को















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