।।प्रातःवंदन।।
"हमें चाहिए
हलचल ऐसी
धधके जो
दावानल जैसी
आँखें
उसे तलाश
रही हैं!"
नचिकेता
चलिए इसी को मद्देनजर रखतें हुए नज़र डालें आज की प्रस्तुति पर..
गणपति उत्सव
श्रीगणेश कारण हैं सबके
मिट्टी, गोबर से भी रच लो,
दूर्वा का तिनका कर अर्पण
छोटा सा मोदक ही धर दो !
✨️
खो गया ना जाने कहॉं मेरे गांव का मनोहारी परिदृश्य
ना पहले सी मिट्टी में ख़ुशबू रही ना वो पहले सी रीति ।
जिस मिट्टी के ज़र्रे ज़र्रे में कुदरत का भरा खजाना था
पीपल की ठंडी छांव तले बचपन का बीता जमाना था
नैनों में तिरता अभी तलक हर मौसम का मोहित रूप
✨️
आदरणीय जिज्ञासा जी की तीन पुस्तकें मिलीं। नक्षत्रों ने दीप जलाए (कविता संग्रह), माटी तेरा मोह न छूटा ( गीत संग्रह) और फूलों वाली मेरी पुस्तक (बाल गीत संग्रह)। तीनों पुस्तक अपने आप में अनूठी हैं। उन्हें हार्दिक बधाई। इन पुस्तकों की अर्गला खोलने का एक छोटा प्रयास।
नक्षत्रों ने दीप जलाए
(कविता संग्रह)
(प्रकाशक – भारतीय साहित्य संग्रह, १०९/१०८, नेहरू नगर, कानपुर)
संग्रह का श्री गणेश ‘सरस्वती वन्दना’ से होता है। ज़िन्दगी की धूप-छाँह से लुका-छिपी खेलती कवयित्री जिज्ञासा की भाव-यात्रा का अवलोकन करता पाठक स्वयं अपने अन्दर जीवन दर्शन की जिज्ञासा भर लेता है। कहीं निराशा का तिमिर छा जाता है। इसे पोंछ कर जिज्ञासा आशा की अमृत बूँदों को छींटती है। कभी कोई अपना अचानक बिछूड़कर विरह के प्रभूत ताप में जलने को छोड़ जाता है। कविताएँ..
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बेहतरीन अंक
जवाब देंहटाएंआभार
वंदन
हार्दिक आभार इस संकलन का।
जवाब देंहटाएंसुप्रभात! आज की इस सुंदर प्रस्तुति में 'मन पाये विश्राम जहाँ' को स्थान देने हेतु बहुत बहुत आभार पम्मी जी!
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