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शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

4862.... चिड़िया की ऑंख छलकती रही

शुक्रवारवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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तुलसीदास जी की लिखी पंक्तियॉं- 

​"भादों नदीं जल जाहिं सुहाई।

खल बल पाइ करहिं प्रभुताई॥

भूमि परत भा ढाबर पानी।

जनु जीवहि माया लपटानी॥"


अर्थात्: भादों के महीने में नदियाँ उमड़कर चलती हैं, जैसे नीच व्यक्ति थोड़ा-सा बल (धन-दौलत) पाकर अपनी प्रभुता दिखाने लगता है। और जैसे वर्षा का जल पृथ्वी पर गिरते ही मटमैला हो जाता है, ठीक वैसे ही जीव पृथ्वी पर जन्म लेते ही माया से लिपट जाता है।

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आज की रचनाऍं-

रवींद्र जी

​आप ने दृश्य और भाव बिंबों का ऐसा सूक्ष्म ताना-बाना बुना है कि  पाठक न केवल उस हादसे को अपनी आँखों से घटते हुए देख रहे है, बल्कि उस 'बीमार दिन' की तड़प को अपने भीतर महसूस भी कर रहे है।



लँगड़ाती हुई सुबह   
अंधी होकर ढली धूप
कोलाहल से बहरी हुई रात 
निष्ठुर हो गुज़रती रही
लाश पर लाश गुज़रती रही 
दिन की तबियत बिगड़ती रही 
चिड़िया की आँख छलकती रही

 

हरीश कुमार जी आपकी रचना में जीवन के शाश्वत सत्य, वक़्त के परिवर्तनशील स्वभाव और मानवीय गरिमा को आपने एक बेहद खूबसूरत और विचारोत्तेजक काव्य में पिरोया है।


जो आज झुककर तुम्हारे सामने खड़े हैं,
कल वही आसमानों के ख़्वाब भी हो सकते हैं।
जिन्हें तुमने समझा है कमज़ोर और नाकारा,
कल वही किसी रियासत के नवाब भी हो सकते हैं।

हर शख़्स की कहानी कहाँ चेहरे से पढ़ोगे,
यहाँ हर चेहरे के पीछे कई नक़ाब भी हो सकते हैं।
जिन आँखों में आज नमी दिखाई देती है,
कल उन्हीं आँखों में ख़ुशियों के सैलाब भी हो सकते हैं।


डॉ. सुनील के. "ज़फ़र" आपकी यह रचना बिछोह, अपनी यादों के स्थायित्व और अतीत के प्रति अनसुलझे लगाव की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है। रिश्ते टूट जाने और जीवन में बदलाव आ जाने के बावजूद, हृदय की गहराई में पुराने प्रेम की महक और मिठास आज भी रची-बसी है।

तुम मुझसे क्यों इतनी नज़दीकियाँ दिखाते हो 
किसी शहर में मेरा हक़दार बाक़ी है,

डर लगता है इन नई हवाओं में
उस पुराने सज़र का दिल तलबगार बाक़ी है ,

अनिता जी आपकी डायरी के पन्नों  में लिखी गई एक अत्यंत आत्मीय और चिंतनशील अभिव्यक्ति है, जिसमें  आपने दैनिक जीवन के अनुभवों, कला, साहित्य और मानवीय संबंधों के गहरे पक्षों को उजागर किया है।


वरिष्ठ साहित्यकार व कलाकार अपने में इतने सघन होते जाते हैं कि सारे जग का दर्द मिटाने की भावना उन्हें चैन से बैठने नहीं देती। उनका अपना स्वार्थ नहीं होता फिर भी कुछ लोग समाज के लिए दिन-रात प्रयत्न करते हैं। ऐसे ही लोगों के बल पर यह दुनिया और खूबसूरत बन जाती है। वे थके हारे लोगों के दर्द भी महसूस करते हैं और महिलाओं की पीड़ा को भी शब्द देते हैं।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. सुप्रभात! अत्यंत श्रमसाध्य व सुंदर प्रस्तुति श्वेता जी, रचना के मर्म को समझ कर उसे प्रस्तुत करने के लिए ह्रदय से आभार!

    जवाब देंहटाएं
  2. आभार श्वेता जी आपका अंदाज़ ही अलग है सभी लिंक्स अच्छे है तथा उनकी प्रस्तावना परिचय भी अपने बखूबी दिया वो अतुलनीय है 🙏

    जवाब देंहटाएं

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