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मंगलवार, 4 अगस्त 2026

4824.....मन का ऑंगन भी बड़ा विचित्र है

 मंगलवारीय अंक में
आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
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एक हाथ में जीवन उसके,

दूजे हाथ विनाश का साया।

समझ न पाया कोई अब तक,

क्या है इस प्रकृति की माया!

​सृजन भी उसका और प्रलय भी,

कैसा यह अद्भूत चक्र रचाया!

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आज की रचनाऍं- 



काकी कहती है 
गांव में घर होना जरुरी है 
साल में दू बार गांव आना जरुरी है 
नहीं तो हो जाते हैं  देवता पितर नाराज 
और कहती हैं देना है पातैर (प्रसाद) 
नये अन्न के आने पर 
लेकिन अभी तक खेत रोपा नहीं गया 
बरखा नहीं हई आषाढ में ! 

रीलों में सिमटी पीढ़ी


लाइक्स की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते,
रिश्तों का आँगन भूल गए।
सच की धूप से मुँह मोड़ लिया,
फ़िल्टर वाले सच कबूल गए।

शब्द बड़े, पर कर्म अधूरे,
ज्ञान बिना ही ज्ञान बाँटते।
मेहनत से जो रिश्ता टूटा,
शॉर्टकट में भविष्य छाँटते।

संवाद

लेकिन…,
 भीतर ही भीतर अनगिन वृत्ताकार
तरंगों के जाल में गुम्फित 

मन का आँगन भी
बड़ा  विचित्र है 


मित्रता 

जब जी चाहा 
रो लिए जाकर उसके पहलू में 
और हल्का कर लिया अपना मन,
जब जी चाहा 
झगड़ लिए और शांत कर लिया अपना गुस्सा, 
जब जी चाहा 
डाँट दिया और खुद निर्द्वंद्व हो गए,  
जब जी चाहा 
छेड़-छेड़ कर उसे रुला दिया 
और खुद मज़े लेते रहे !

धीमी ऑंच



मिट्टी के चूल्हे-सी सुलगें साँसें,
लकड़ी-सी ख़ामोशी धीरे जले।
यादों का सिल-बट्टा बोल उठे,
बातों की चटनी तब अच्छी लगे।
नमक ज़रा बस चुटकी भर हो,
गुड़-सी हँसी को जरा घुलने दो।

धीमी आँच पे रिश्तों को पकने दो।


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में
सादर।

7 टिप्‍पणियां:

  1. ​सृजन भी उसका और प्रलय भी,
    कैसा यह अद्भूत चक्र रचाया!
    बेहतरीन अंक
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. लाज़वाब सूत्रों को समाहित के बहुत सुन्दर अंक । आज की प्रस्तुति में “संवाद “ को सम्मिलित करने के लिए हार्दिक आभार श्वेता जी ।

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात!! एक से बढ़कर एक रचनाओं की खबर देते सूत्र

    जवाब देंहटाएं
  4. सादर प्रणाम, मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत बहुत आभार 🙏

    जवाब देंहटाएं
  5. आज के अंक में मेरी रचना मित्रता को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी ! बाकी सूत्र भी बहुत ही बेहतरीन ! सप्रेम वन्दे !

    जवाब देंहटाएं

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