आप सभी स्नेहिल अभिवादन।
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एक हाथ में जीवन उसके,
दूजे हाथ विनाश का साया।
समझ न पाया कोई अब तक,
क्या है इस प्रकृति की माया!
सृजन भी उसका और प्रलय भी,
कैसा यह अद्भूत चक्र रचाया!
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गांव में घर होना जरुरी है
साल में दू बार गांव आना जरुरी है
नहीं तो हो जाते हैं देवता पितर नाराज
और कहती हैं देना है पातैर (प्रसाद)
नये अन्न के आने पर
लेकिन अभी तक खेत रोपा नहीं गया
बरखा नहीं हई आषाढ में !
रिश्तों का आँगन भूल गए।
सच की धूप से मुँह मोड़ लिया,
फ़िल्टर वाले सच कबूल गए।
शब्द बड़े, पर कर्म अधूरे,
ज्ञान बिना ही ज्ञान बाँटते।
मेहनत से जो रिश्ता टूटा,
शॉर्टकट में भविष्य छाँटते।
लेकिन…,
भीतर ही भीतर अनगिन वृत्ताकार
तरंगों के जाल में गुम्फित
मन का आँगन भी
बड़ा विचित्र है
रो लिए जाकर उसके पहलू में
और हल्का कर लिया अपना मन,
जब जी चाहा
झगड़ लिए और शांत कर लिया अपना गुस्सा,
जब जी चाहा
डाँट दिया और खुद निर्द्वंद्व हो गए,
जब जी चाहा
छेड़-छेड़ कर उसे रुला दिया
और खुद मज़े लेते रहे !





सृजन भी उसका और प्रलय भी,
जवाब देंहटाएंकैसा यह अद्भूत चक्र रचाया!
बेहतरीन अंक
आभार
वंदन
उम्दा चयन
जवाब देंहटाएंवाह
जवाब देंहटाएंसुन्दर अंक
लाज़वाब सूत्रों को समाहित के बहुत सुन्दर अंक । आज की प्रस्तुति में “संवाद “ को सम्मिलित करने के लिए हार्दिक आभार श्वेता जी ।
जवाब देंहटाएंसुप्रभात!! एक से बढ़कर एक रचनाओं की खबर देते सूत्र
जवाब देंहटाएंसादर प्रणाम, मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत बहुत आभार 🙏
जवाब देंहटाएंआज के अंक में मेरी रचना मित्रता को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी ! बाकी सूत्र भी बहुत ही बेहतरीन ! सप्रेम वन्दे !
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