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मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

4726 ..जिसने आसमान को ही अपनी छत मान लिया है।

 सादर अभिवादन


सरेआम
सत्य का कत्ल हुआ
मक्कार मकड़ी, तुरन्त,
सिर से पैर तक जाला बुन गई

नूतन रचनाएँ



सबके बीच लंबी बहस के बाद तय हुआ कि यूनियन की साक्ष्य केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि 'टेक्निकल और डेटा-ड्रिवन' होगी. तय हुआ कि यूनियन की ओर से 
प्रशांत बाबू एक 'एक्सपर्ट विटनेस' (Expert Witness) के रूप में अपना विश्लेषण पेश करेंगे. दूसरे गवाह सचिव शिंदे होंगे. ये दोनों केवल अपनी बातें नहीं कहेंगे, 
बल्कि उन दस्तावेजों को साक्ष्य में लाएंगे जो साबित करेंगे कि प्रबंधन ने रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ की है.

चव्हाण साहब ने फाइल बंद करते हुए कहा, "प्रबंधन ने अपना जाल बिछाया था, लेकिन अब हम उनके ही दस्तावेजों को उनके खिलाफ हथियार बनाएंगे. 
30 अप्रैल को इजलास में हमारे गवाह 'सर्जिकल स्ट्राइक' के मोर्चे पर होंगे."





काश—
इस गणना से पहले
हो पाती
बेमकानों की गिनती।

तुम गिन लोगे
छत, दीवार, खिड़कियाँ, पर्दे—
पर छूट जाएगा
वो “घर”,
जिसने आसमान को ही
अपनी छत मान लिया है।





सारे महानगर में है एक अजीब सा रंग मशालों का उद्घाटन,
राजपथ के दोनों तरफ हैं
खड़े मंत्रमुग्ध से सहस्त्र
जनगण, गुजरेगा
कुछ ही देर
में राजन
का
स्वर्णिम रथ पुनः बिखर जाएंगे





द्वार प्रेम के खुले हुए हों, 
बंद झरोखे संशय के हों,
मिटते साये छल के दिल में, 
बीते कल के भय के हों।

साफ़ नज़र आती है मंज़िल, 
साफ़ नज़र है राहों की,
मिटने हैं वे सभी निशाँ जो, 
रंजो-ग़म, विस्मय के हों।





इरा—प्राचीन इतिहास की शोधकर्ता—खोई हुई अनुभूतियों की खोज में है, 
आज उसे तहखाने में एक जर्जर डायरी मिली। 
पन्नों पर बार-बार एक शब्द उभर रहा था— ‘माहवारी’ और नीचे काँपते अक्षरों में लिखा था— 
“यह सृजन की प्रतीक्षा का लाल रंग है।”

इरा ठिठक गई।

“प्रतीक्षा…?” उसने फुसफुसाया, “जब सब कुछ निर्धारित है, तो प्रतीक्षा कैसी?”
उसी क्षण उसके पेट के निचले हिस्से में एक अनजाना कसाव उठा—
धीरे-धीरे बढ़ता हुआ। यह कोई दर्ज पीड़ा नहीं थी, 
कोई प्रोग्राम्ड संकेत नहीं था। कुछ ही पलों में उसके सफेद वस्त्र पर लाल रंग फैलने 
लगा—गर्म, जीवित, अनियोजित। उसकी उँगलियाँ काँप उठीं।


सादर समर्पित
सादर वंदन


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